आतंक का नया चेहरा 'लोन वुल्फ'
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आतंक का नया चेहरा 'लोन वुल्फ'

Written byArchiveArchive
Jan 9, 2017, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 09 Jan 2017 15:49:43

'कुख्यात आतंकी संगठन आईएसआईएस ने रणनीति बदलकर कुछ ऐसे गुर्गे तैयार कर लिए हैं, जो अकेले दम पर किसी आतंकी वारदात को अंजाम देते हैं। इन्हें लोन वुल्फ या अकेला भेडि़या कहा जाता है। इन भेडि़यों ने यूरोप में कई स्थानों पर इस तरह की आतंकी वारदातों को अंजाम दिया हैं 

सतीश पेडणेकर

इस्तांबुल के एक नाइट क्लब में नया साल मौत का पैगाम लेकर आया। सांताक्लाज बना आदमी आतंकी निकला। उसने अपनी बंदूक से 40 लोगों को हत्या कर दी। इनमें से दो भारतीय भी थे। वहीं जर्मनी की राजधानी बर्लिन के क्रिसमस मार्केट में हुए ट्रक हमले की जिम्मेदारी आईएसआईएस ने ली है। उससे जुड़ी एक एजेंसी अमाक ने इसकी दूसरे दिन बयान जारी करके हमले की जिम्मेदारी ली। बयान में कहा गया है कि गठबंधन देशों को निशाना बनाने की अपील के बाद आईएस के एक लड़ाके ने हमला किया। इस हमले में करीब 12 लोगों की मौत हो गई और 50 से ज्यादा घायल हो गए। यह आतंकी वारदात करने के बाद बचकर भाग निकलने में सफल रहा। इसलिए जर्मनी में इस बात का खौफ था कि वह दूसरा हमला कर सकता है, लेकिन वह दो दिन बाद इटली पुलिस के साथ मुठभेड़ में मारा गया। इसे 'लोन वुल्फ' या अकेले भेडि़ए का हमला माना जा रहा है।
 मौजूदा दौर में 'लोन वुल्फ' हमले का अर्थ है बिना किसी नेतृत्व के अपनी मजहबी, सांप्रदायिक और कट्टर विचारधारा के नाम पर अकेले हथियार लेकर आम लोगों और सुरक्षाबल पर हिंसक हमले करना। आईएसआईएस की 'लोन वुल्फ' आतंकी हमले की सोच काफी पुरानी है। सितंबर, 2014 में उसने अपने एक सरगना का ऑडियोटेप जारी किया था। इस टेप में इराक पर हवाई हमला करने वाले अमेरिका और उसके सहयोगियों पर 'लोन वुल्फ' के ढंग के हमले करने का आह्वान किया गया था। प्राय: अकेले आतंकी हमला करने वालों को पश्चिमी देशों में 'लोन वुल्फ' कहा जाता है। पहले ये हमले छोटे स्तर पर ही होते थे। मगर अब ये बड़ा रूप लेते जा रहे हैं। इस हमले का यूरोप में नतीजा यह हुआ है कि सभी मुसलमान और मध्य-पूर्व से आए मुस्लिम शरणार्थी संभावित आतंकवादी के कठघरे में कर दिए गए हैं।
इससे पहले फ्रांस में भी बिल्कुल ऐसा ही वाकया हो चुका है, जिसमें केवल ट्रक के जरिए आतंकी हमला किया गया। वह सिर्फ 30 साल का नौजवान था और ट्यूनीशिया से आकर फ्रांस में बसा था। पुलिस उसे शातिर अपराधी के तौर पर जानती थी, वह अकसर हथियारों का इस्तेमाल किया करता था। पुलिस की उस पर नजर रहती थी, लेकिन उसके बारे में कभी भी यह शुबहा तक नहीं हुआ कि वह किसी कट्टरवादी इस्लामी संगठन से जुड़ा हुआ है। जब वह फ्रांस के राष्ट्रीय दिवस का उत्सव मना रहे लोगों की भीड़ में ट्रक लेकर उन्हें कुचलता हुआ बढ़ा तो उसके पास एक पिस्टल और एक बंदूक थी। उसने इसी बंदूक से गोलीबारी भी की। उसके ट्रक से कुछ हथगोले और अन्य हथियार मिले, लेकिन जांच में पता चला कि वे नकली थे। इस हमले में 77 लोगों की मौत हो गई, जबकि 50 से ज्यादा लोग जख्मी हुए। पर उसे इतना क्रूर कदम उठाने की उसे प्रेरणा या ट्रेनिंग कहां से मिली, यह पता नहीं चल पाया।
फ्रांस में पिछले आठ महीनों में यह दूसरा बड़ा हमला था। हमले के तुरंत बाद पुलिस ने ट्रक के चालक को मार गिराया। फ्रांस 2015 में 13 नवंबर को हुए हमले से उबर ही रहा था, जिसमें करीब 130 लोग मारे गए थे। हालांकि इस मुल्क में आतंकी हमलों की सूची लंबी रही है।
  अमेरिका में 'लोन वुल्फ' हमलों की कई वारदातें हुई हैं। अमेरिका के ओरलैंडो के गे क्लब में उस रात ऐसा ही खौफनाक वाकया हुआ था। अंधाधुंध गोलीबारी करके 50 से ज्यादा लोगों की जान लेने वाले उमर मतीन के बारे में अभी तक इतना ही पता चल सका है कि वह आईएस से प्रभावित था, लेकिन यह हत्याकांड उसने उसके किसी निर्देश पर नहीं किया था। लेकिन कई अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार मतीन ने हमले से पहले और हमले के दौरान आपातकालीन सेवा को फोन करके यह स्वीकार किया था कि वह इस्लामिक स्टेट यानी आईएस के लिए प्रतिबद्ध है।
इस घटना से 2015 में कैलिफोर्निया के सैन ब्रैंडिनो में हुई शूटिंग याद आती है, जहां हमलावर ने एक क्लिनिक में गोलीबारी करके 14 लोगों की जान ले ली थी और हमले से पहले सोशल मीडिया में स्वीकार किया था कि वह आईएसआईएस के प्रति आस्था रखता है। इसके बाद आईएस ने भी न सिर्फ उसकी प्रतिबद्धता को स्वीकार किया, बल्कि हमले की जिम्मेदारी भी ली।  यह भी एक तरह से आईएस की रणनीति का ही हिस्सा है। वह लगातार ऐसे समर्थक तैयार करने की कोशिश करता रहता है, जो जहां कहीं भी हैं, जैसे भी हैं, अपनी तरह से उसके लिए कुछ करते रहें। खासतौर से अगर वे खिलाफत वाले क्षेत्र में जा बसने की हिज्रत की अपनी जिम्मेदारी निभाने की स्थिति में नहीं हैं। पिछले कुछ समय से इस्लामिक स्टेट अपने दुश्मनों से घिर गया है। रूस, पश्चिमी सैन्य गठबंधन और अरब देशों के आसमान से बरसती हजारों मिसाइलों के कारण इराक और सीरिया में अपनी जमीन पर उसकी हालत खस्ता है। वह इराक में 45 प्रतिशत और सीरिया की 20प्रतिशत जमीन खो चुका है मगर इसका बदला चुकाने के लिए वह दुनियाभर में आतंकवादी वारदातों को अंजाम देकर कई देशों को दहला रहा है।
आईएस ने ओरलैंडो के हमले की जिम्मेदारी ली, और कहा कि इस काम को 'इस्लामिक स्टेट के एक लड़ाके' ने अंजाम दिया। लेकिन यह  बयान जिस तरह संक्षिप्त है, उससे यही लगता है कि संगठन को इस हमले की पहले से कोई जानकारी नहीं थी, और यह किसी अकेले सिरफिरे की हरकत है। इसके विपरीत पेरिस हमले के दौरान जो जिम्मेदारी ली गई थी, उसमें जिस तरह का ब्योरा दिया गया था, वह बता रहा था कि बयान देने वाला हमले की साजिश में शामिल था।
ये तो थे 'लोन वुल्फ' के बड़े हमले। मगर कभी उनके हमले बहुत छोटे स्तर के भी होते हैं। दक्षिण जर्मनी में एक सिरफिरे शख्स ने ट्रेन में कुल्हाड़ी मार कर चार लोगों को जख्मी कर दिया। यह घटना बवेरिया में वुर्जबर्ग और ट्रेचलिंगन के बीच एक लोकल ट्रेन में हुई। हमलावर को पुलिस ने ढेर कर दिया। चाकू और कुल्हाड़ी से लैस इस हमलावर की पहचान 17 साल के अफगानी युवक के रूप में हुई।
ये सभी ऐसे आतंकी थे, जिन्हें आज की भाषा में  'लोन वुल्फ' यानी अकेला भेडि़या या अकेला हमलावर कहा जाता है। यह आईएसआईएस की रणनीति थी कि जो जहां है वहीं रहे और हमले का मौका तलाशता रहे, जब मौका मिले अपने निशाने पर हमला बोल दे। पहली बार किसी आतंकवादी संगठन ने 'लोन वुल्फ' का फंडा अपनाया है। यह बेहद खतरनाक है, क्योंकि इसके लिए किसी खास प्रशिक्षण या पैसे की जरूरत नहीं पड़ती, सिर्फ व्यक्ति के दिमाग को बदलने की जरूरत होती है। ये लोन वुल्फ की आतंकी घटनाएं इस तथ्य की ओर संकेत करती हैं कि इस्लामिक स्टेट एक स्थायी मानसिक अवस्था बन चुका है। दरअसल, इस मामले में आईएस अलकायदा से बहुत आगे है। अलकायदा महज आतंक फैलाने का काम कर रहा था तो आईएस वैचारिक आतंकवाद का एक ऐसा विचार है, जो आम से दिखने वाले साधारण लोगों को हिंसक तरीके अपनाने के लिए उकसाता है। 

जस तरह देसी उत्पाद ग्लोबल ब्रांड का ठप्पा लगते ही आकर्षण का केंद्र बन जाता है, वैसा ही किसी भी तरह की हिंसा में आईएस का ठप्पा लगते ही वह वैश्विक घटना में बदल जाता है। उनके पीछे बड़ी संगठित ताकत सक्रिय होती थी। लेकिन अब आतंकवाद के नए रूप में किसी संगठन को लंबे अरसे तक योजना बनाकर करोड़ों रुपए खर्च कर हमले करवाने की जरूरत नहीं, बल्कि कोई भी अकेला इंसान इन्हें अंजाम देकर दुनियाभर में दहशत फैला सकता है। लेकिन अब दुनियाभर में ऐसी ही दहशत पैदा करने के लिए एक या दो लोग ही काफी होंगे। वह किसी एक जीप या कार पर सवार हो किसी भीड़ को कुचलता हुआ निकल सकता है या फिर रसोई में काम आने वाले चाकू की मदद से ही किसी भीड़ वाले इलाके में एक साथ दसियों लोगों का कत्ल कर सकता है। ऐसी हरकत चीन के सिक्यिांग में देखी गई है। ऐसे इंसान के लिए कोई आतंकवादी या अलगाववादी संगठन प्रेरणा का स्रोत बनता है। उसे संगठन से मदद लेने की कोई जरूरत नहीं होती और न ही उसके निर्देशों की जरूरत होती है। ऐसे लोग कई देशों के लिए एक बड़ी परेशानी बने हुए हैं। बहरहाल, ऐसे अकेला भेडि़या या आवारा कुत्ता जिस तरह पनप रहे हैं, उनसे निबटने के लिए सैन्य या पुलिस ताकत से काम नहीं चलेगा। ऐसे तत्व अब हर हर जगह पैठ बना रहे हैं।
जब आतंक का रूप ऐसा हो जाए तो चुनौती यही है कि इससे निबटा कैसे जाए। तमाम देशों की सुरक्षा एजेंसिया कैसे रोकें इस तरह के हमलों को, जहां न तो कोई गुट काम कर रहा है, न कोई ट्रेनिंग या उकसावे के शिविर चल रहे हैं, न कोई बड़ा हथियारों का जखीरा जमा किया जा रहा है। अलकायदा के जमाने में तो यही होता रहा था कि एजेंसिया ऐसे लोगों पर नजर रखती थीं जो अपने देश से बाहर जाते थे।
फ्रांस के आतंकी और मतीन में काफी समानताएं हैं। फ्रांस का हमलावर भी पुलिस की नजर में था, मतीन भी। दोनों के ही बारे में पुलिस को लगता था कि वे नाराज युवक हैं, और हिंसा की इस पराकाष्ठा तक नहीं पहुंच सकते। लेकिन दोनों ही मामलों में पुलिस और एजेंसियां गलत साबित हुईं।
'लोन वुल्फ टेररिज्म :अंडरस्टैडिंग द ग्रोविंग थ्रीट' पुस्तक  के लेखक जेफ्री सिमोन आतंकवाद की इस नई प्रवृत्ति के बारे में कहते हैं कि यह समस्या संगठित आतंकवाद से अलग तरह की है, जिसके हम सातवें ,आठवें और नवें दशक और इक्कीसवीं सदी के पहले पांच साल में आदी रहे हैं। बुनियादी तौर पर लोन वुल्फ एक व्यक्ति होता है। दो व्यक्ति भी हो सकते हैं। वे बाहरी लॉजिस्टिक और आर्थिक सहायता के बिना काम करते हैं। दरअसल वे अपने लिए काम कर रहे होते हैं। उनकी पहचान कर पाना या उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है, क्योंकि उनकी किसी से बातचीत नहीं होती,न ग्रुप के कोर सदस्य पकडे़ जाते हैं।
इंटरनेट ने इस खेल को बदल दिया है। उसने इन आतंकवादियों को यह अवसर दिया है कि वे आतंकवादी संगठन के वेब पेजेज, ट्वीट्स और ब्लॉग पढ़कर स्वयंमेव उग्रवादी बन सकते हैं। लेकिन इससे अधिकारियों को लोन वुल्फ के बारे में जानने का मौका मिल सकता है, क्योंकि कई वुल्फ हमले से पहले ब्लॉग या संदेश भेजते हैं। लोन वुल्फ की संख्या भी बढ़ती जा रही है, और उनके द्वारा की जाने वाली तबाही भी।
परंपरागत आतंकवादी और लोन वुल्फ आतंकवादियों में एक फर्क यह है कि लोन वुल्फ आतंकवादी नए-नए तरीके अपनाते हैं। बुनियादी तौर पर लोन वुल्फ बहुत खतरनाक होते हैं और बहुत रचनात्मक भी। चूंकि उनके पीछे कोई सामूहिक निर्णय प्रक्रिया नहीं होती इसलिए वे अपनी पसंद का तरीका या रणनीति चुन सकते हैं। इस कारण लोन वुल्फ की संख्या बढ़ती जा रही है। यह एक ट्रेंड बन सकता है।
आईएसआईएस आतंकवाद के इतिहास में सबसे ज्यादा तकनीक और मीडिया पसंद गुट है। इसके आतंकवादियों ने इंटरनेट के इस्तेमाल में महारत हासिल की हुई है। अलकायदा ने भी इसका इस्तेमाल किया मगर आईएसआईएस और ऊंचे स्तर तक ले गया। इसलिए यह कह पाना मुश्किल है कि आने वाले दिनों में क्या नई बात निकल कर आएगी?
हमें यह जानना चाहिए कि आईएसआईएस इराक और सीरिया में घिर चुका है। हो सकता है, निकट भविष्य में हम देखें कि वह हार चुका है। मगर वह विकेंद्रित वैश्विक ताकत के रूप में बना रहेगा और इंटरनेट और सोशल मीडिया का उपयोग कर लोगों को आत्मघाती हमले करने के लिए प्रेरित करता रहेगा।
इंटरनेट युग की खासियत यह है कि पढ़े-लिखे लोग भी आतंकी बन रहे हैं। कारण यह है कि पहले मुल्ला-मौलवियों के प्रवचन लोगों को इस्लाम के रास्ते पर चलना सिखाते थे, अब लोग गूगल गुरु के जरिए खुद वेबसाइटों पर जाकर इस्लाम के बारे में पढ़ते हैं। इस्लाम उन्हें जिहाद के लिए प्रेरित करता है। गालिब भले ही कह गए हों, 'ऐसी जन्नत का क्या करे कोई जिसमें लाखों बरस की हूरे हों।' लेकिन कट्टरवादी मुस्लिम नौजवान इन लाखों बरस की हूरों को पाने के लिए जन्नत जाने को उतावले हो रहे हैं। इस्लाम उनसे कहता है जन्नत का सीधा रास्ता है जिहाद। इस लालच में लोग जिहादी बन जाते हैं। कुछ लोग इस्लामी आतंकवाद का कारण, मुसलमानों पर किए गए अन्याय , अत्याचार, भेदभाव और उपेक्षा को बताते हैं, लेकिन कट्टरवादी तत्व आतंकवाद को इस्लाम का शुद्ध रूप मान उसमें आनंद प्राप्त करते हैं। जैसा कि ईरान के मुल्ला आयातुल्लाह खुमैनी ने कहा है कि ़इस्लाम का असली आनंद लोगों की हत्या करने और अल्लाह के लिए मर जाने में है।
ओसामा बिन लादेन ने भी एक बार कहा था कि इस्लाम जीतेगा, क्योंकि पश्चिम में लोग जीना चाहते हैं, जीने का आनंद लेना चाहते हैं और हम मरने के लिए तैयार रहते हैं।
ऐसे लोगों ने इस्लाम को जीवन के बजाए मौत के दर्शन में बदल दिया है। इस दर्शन को पढ़कर युवा खुद ब खुद आतंकवादी बन जाते हैं और जिहाद या आतंकवाद को जन्नत का शॉर्टकट समझकर अपना लेते हैं। 

 

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