क्रांति-गाथा-26 - मेरी गिरफ्तारी
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क्रांति-गाथा-26 – मेरी गिरफ्तारी

Written byArchiveArchive
Dec 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Dec 2016 13:56:42

पाञ्चजन्य ने सन् 1968 में क्रांतिकारियों पर केन्द्रित चार विशेषांकों की शंृखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहा है। प्रस्तुत है 22 जनवरी,1968 के अंक में प्रकाशित शहीद क्रांतिकारियों के साथी रहे शिव वर्मा का आलेख:-
ल्ल शिव वर्मा
मई,1929 का बारहवां दिन। मैंने आखिरी बम में मसाला भरा और दिन का काम समाप्त कर छत पर पड़ी टूटी खाट पर जाकर लेट गया। सूरज डूब चला था लेकिन हवा में अभी दिन वाली तपन बाकी थी। मकान के कमरों-कोनों में अंधेरा इस तरह दुबका था जैसे चोर छिपकर अपने मौके का इंतजार कर रहा हो। वह दोनों के फाके का दूसरा दिन था। पैसों के नाते हमारे पास कुल दस आने बचे थे जिन्हें हम डॉ. गया प्रसाद के आने तक सुरक्षित रखना चाहते थे— कौन जाने कब क्या आवश्यकता आ पड़े।
तलाशियों का बाजार गर्म था। मई की उस तपती शाम को छत पर लेटे-लेटे मैं आकाश में टिमटिमाते दो-चार तारों को देखता रहा। भगतसिंह और दत्त जेल में थे। क्या जेल में भी तारे जगते होंगे? मैंने सोचा। हाल ही में झांसी में आजाद से इन दोनों साथियों को छुड़ाने की योजना पर बात करके लौटा था। लाहौर में सुखदेव, किशोरीलाल आदि भी पकड़े जा चुके थे और यह निश्चित था कि दिल्ली के केस में सजा हो जाने के बाद भगतसिंह और दत्त को भी लाहौर ले जाया जाएगा। हम उसी अवसर पर रास्ते में उन्हें छुड़ाने का प्रयास करना चाहते थे। लेकिन सुखदेव की गिरफ्तारी के बाद समाचारपत्रों में लाहौर से जो समाचार आ रहे थे, वे उत्साहवर्धक न थे। चारों ओर तलाशियां हो रही थीं, एक के बाद दूसरा साथी पकड़ा जा रहा था और हम सबने मिलकर इतनी मेहनत से जिस संगठन का ताना-बाना खड़ा किया था उसका एक-एक तार टूट रहा था। काकोरी के बाद हमने जहां से मंजिल आरंभ की थीं परिस्थितयां ठेल कर हमें ठीक उसी जगह वापस लिए जा रही थीं।
मेरे सामने आजाद की सूरत भी आई। झांसी की अंतिम मुलाकात में मैंने उन्हें जिस रूप में देखा था वह उनका एक नया ही परिचय था।
आजाद ने कहा था
मैं अपने साथ भगतसिंह और दत्त के चित्र ले गया था, उन्हें देखकर उनकी आंखों में आंसू छलक आये थे और रुंधे कण्ठ से उन्होंने कहा कि— क्या सेनापति के नाते मेरा यही काम है कि नये-नये साथी जमा करूं, उनसे परिचय, स्नेह और घनिष्ठता बढ़ाऊं और फिर उन्हें मौत के हवाले कर मैं ज्यों का त्यों बैठा रहूं? मैंने उन्हें उतना भावुक और विह्वल कभी नहीं देखा था। प्रभात, क्या सो गये? जयदेव ने पुकारा, मेरा जी कहता है कि अब यहां और अधिक रहना खतरे से खली नहीं है। हमें जल्द से जल्द सहारनपुर से चल देना चाहिए, चारपाई पर बैठते हुए उसने कहा।
भूल की बात
हम लोग सारा सामान बांध चुके थे। बस डाक्टर के आने भर की देर थी। यूं खाली हाथ हम वहां से किसी भी समय चल सकते थे। लेकिन मेहनत से जमा किया बम फैक्ट्री का सारा सामान हमें बांधे था। उसका मोह हम छोड़ नहीं पा रहे थे। पैसे के अभाव में वह सारा सामान कहीं ले जाना संभव न था और पैसा हमारे पास था नहीं। मैं समझता हूं कि सामान के लोभ में अपने को खतरे में डालना हमारी गलती थी। जब एक बार शक हो गया तो डाक्टर साहब का इंतजार किये वगैर अपने बम और पिस्तौल लेकर हमें वहां से चल देना चाहिए था। हमने वैसा नहीं किया यह हमारी भूल थी।
यदि कल शाम तक डाक्टर साहब न लौटे तो रात में हम लोग यहां से निकल पड़ेंगे, मैंने कहा।
दल के नियमों के अनुसार हम लोग जहां भी रहते थे, वहां रात में बारी-बारी सब लोगों को ड्यूटी देनी पड़ती थी। साथियों की संख्या अधिक रहने पर ड्यूटी के घंटे कम हो जाते थे। लेकिन डाक्टर के चले जाने के बाद से हम दोनों ही को पांच-पांच घंटे निबाहने पड़ रहे थे।
उपवास के 48 घंटे पूरे हो चले थे
उस रोज बेहद गर्म दिन था। उस पर दिन की समाप्ति के साथ-साथ उपवास के अड़तालिस घंटे भी पूरे हो चले थे, फिर मानसिक चिंता और खटका भी कम न था। पहले पहर मुझे जागना था। लेकिन मैं भी करवटें ही बदलता रहा। हम दोनों की सारी रात मौसम की गर्मी, पेट की जलन और दिमाग की चिंताओं को समर्पित हो गयी।
आमतौर पर क्रांतिकारियों के मकानों पर रात रहते अंधेरे में ही पुलिस छापा मारती थी। और तेरह को प्रात: जब रात की चौकसी के बाद सूरज को चार्ज देकर तारे सोने चले गये तो हमने भी समझा कि उस दिन की आपदा टल गयी। सूरज की पहली किरन ने जब हमें गुदगुदाया तो हम दोनों छत से नीचे आ गये। कुछ तो सबेरे की ठंडक और कुछ राहत की बयार, नीचे आकर हमें नींद आ गयी। अब हम दिन भरी के लिए बेफिक्र थे।
पुलिस का धावा
मैंने स्वप्न देखा कि डाक्टर गया प्रसाद आ गये हैं और बाहर खड़े दरवाजा खोलने के लिए आवाज लगा रहे हैं। गहरी नींद से मैं आंख मलता उठा और जाकर दरवाजा खोल दिया। यह मेरी दूसरी भूल थी।
दरवाजा खोलते ही मेरी खुमारी हवा हो गयी। सारा मकान सशस्त्र पुलिस ने घेर लिया था और वर्दीधारी सिपाहियों की एक अच्छी खासी भीड़ दरवाजा खुलने के इंतजार में सामने खड़ी थी। उन्होंने अंदर आकर मुझे चारों ओर से घेर लिया।
क्या नाम है? एक अधिकारी ने पास आकर पूछा—
हरनारायण
क्या करते हो?
पढ़ता हूं
कहां?
हिंदू यूनिवर्सिटी बनारस
यहां कैसे आये?
मेरे बड़े भाई का यहां पर डाक्टरी शुरू करने का विचार है। यूनिवर्सिटी में आज कल छुट्टियां हैं इसीलिए यहां भाई के पास चला आया था।
डाक्टर साहब कहां हैं?
भाभी को लेने गये हैं।
अंदर और कौन है?
मेरा दोस्त। वह देहरादून मंसूरी आदि घूमने आया था। मैंने रोक लिया है। भैया के आ जाने पर हम दोनों साथ-साथ घूमने जाएंगे।
हम लोग दवाखाना देखना चाहते हैं यह कहकर वह दवाखाने में घुसा। मैं भी उसके साथ हो लिया। उन्होंने मुझे अच्छी तरह घेर लिया था लेकिन गिरफ्तार नहीं किया था। उनके एक दल ने मकान में जाकर जयदेव को भी उठाकर हिरासत में ले लिया।
तलाशी शुरू हुई
अब तलाशी शुरू हुई। दवाखाने में डाक्टरी के मामूली सामान के अलावा हिंदी कविता की दो पुस्तकें भी मिली। इनमें से एक थी एकतारा और दूसरी थी जयशंकर प्रसाद की आंसू। पुलिस पार्टी के नायक ने जो सहारनपुर का डिप्टी सुपरिंटेंडेंट था, उन्हें देखते ही कहा, यह तो बड़ी आपत्तिजनक पुस्तकें हैं। उन्होंने दोनों पुस्तकें उठाकर लीं फिर कहा लाइये इनकी रसीद लिख दूं। इतने में अंदर के कमरे से एक सब इंसपेक्टर ने पुकार कर कहा, यहां और भी किताबें हैं इन्हें भी देख लीजिये।
अंदर के कमरे की तलाशी के मतलब था सर्वनाश। वह हमारा गोदाम, शस्त्रागार, फैक्ट्री और पुस्तकालय सब कुछ था। कमरे का अधिकतर सामान पैक किया जा चुका था सिर्फ कुछ पुस्तकें बाहर थीं। मुझे लेकर सारी पुलिस पार्टी उस कमरे में घुसी और एक ओर से हर सामान को खुलवा कर देखना शुरू किया। पहला संदूक दवाइयों का था। ठीक है, अब दूसरा बाक्स खोलिए। डिप्टी सुपरिटेंडेंट ने कहा। उसमें बम बनाने के रसायन थे— गंधक का तेजाब, शोरे का तेजाब आदि। यदि चीजें तो डाक्टरी में काम नहीं आती। वह बड़बड़ाया।
तीसरे में कपड़े आदि थे और चौथे में आरी, छेनी, रेती, हथौड़ी, तार आदि। यह किस काम आता है? उसने पूछा— मैं नहीं जानता, डाक्टर साहब बता सकेंगे। मैंने उत्तर दिया।
मामला खतरनाक है। वह फिर बड़बड़ाया। इस अलमारी में क्या है? देख लीजिये। खोलो। दस्ती बम बनाने की किताब भी
मैंने अलमारी खोल दी। उसमें किताबें थीं—दस्ती बम बनाने की किताब, मिलेट्री मैनुअल आदि। अधिकारी ने गौर से मेरी ओर देखा अच्छा, इस दूसरी अलमारी को भी खोलो। आप क्यों नहीं खोलते? तुम्हें ही खोलना पड़ेगा। उसने आग्रह किया। मैंने उसे भी खोल दिया। उसमें एक छोटा चमड़े का अैटची था। इसमें क्या है? उसने पूछा। यह सब डाक्टर साहब का सामान है। मुझसे पूछने के बजाय आप स्वयं ही खोलकर देख सकते हैं। जितना ही मैं उस अटैची को खोलने से इंकार करता गया उतना ही वह इस बात पर जिद्द पकड़ता गया कि अटैची खोलनी होगी और मुझे ही खोलनी पड़ेगी।
यह अटैची मेरा अंतिम सहारा था इसलिए मैं दिल से यही चाहता था कि मैं ही उसे खोलूं। इंकार तो मात्र ड्रामा था। अधिकारी के बार-बार आग्रह करने पर मैंने आगे बढ़कर उसे खोल दिया और एक बम बाहर निकालते अंग्रेजी में कहा आप लोग तैयार हो जाइये, यह बम है। यह कहकर जैसे ही मैंने हाथ ऊपर उठाया वैसे ही डिप्टी सुपरिटेंडेंट के मुंह से निकला भागो। पकड़े! लेकिन चूंकि डिप्टी सुपरिटेंडेंट महोदय ने स्वयं अपने पकड़ो वाले आदेश पर अमल न कर भागो वाले आदेश पर ही अमल किया था, इसलिए बाकी पुलिस वालों ने भी भागो वाला आदेश ही पकड़ा और देखते-देखते वह सभी भीड़ मकान से बाहर हो गयी।                     …गतांक में जारी

 

प्रभात की युग संध्या…
अनेक भ्रांतियों के कुहासे में भी-एक नवीन संध्या का प्रकाश दिखलाई पड़ रहा है, प्रदोष की संध्या नहीं- प्रभात की ही युग-संध्या। युग-युगांत का भारत मरा नहीं है। उसकी सृष्टि की शेष कथा भी अभी नहीं कही गई है, वह जीवित है, अपने लिए, समूची मानव जाति के लिए अभी भी उसे बहुत कुछ करना बाकी है और इस समय जो जागृत होना चाहता है, वह अंग्रेजी भावापन्न प्राच्य जाति नहीं है, पाश्चात्य का अनुगत शिष्य होना एवं पाश्चात्य सभ्यता के फलाफल का फिर अभिनय करना ही उसकी नियति नहीं है, बल्कि वह इस समय भी उस प्राचीन स्मरणातीत काल की ही शक्ति से फिर अपनी गंभीर आत्मा का संधान कर पा रहा है। समग्र ज्योति और शक्ति के परम उत्पत्ति स्थान की ओर उसने अपना सिर और भी ऊंचा कर लिया है और वह अपने धर्म का पूरा-पूरा अर्थ और विशाल रूप आविष्कृत करने में प्रवृत्त हो रहा है।
भगत सिंह! मेरा बेटा…
भगत सिंह! मेरा बेटा! वह लड़कपन से ही देश की आजादी के लिए चिंता में डूबा रहता था और जब भी मौका मिलता, घर से चला जाता। उसने अपने कई नाम रखे थे—अपने देश की आजादी के लिए उसे घर की कोई फिक्र न थी। जिस दिन लाला लाजपत राय को लाठियों से मारा गया था, उस रोज से उसके दिल में अंग्रेजों से लाला जी का बदला लेने की इच्छा बहुत तेज हो गई और इसके खातिर वह जाने कहां-कहां, हिन्दुस्थान के कोने-कोने में घूमता रहा। उसे किताबें बहुत प्यारी थीं— इसलिए मैं चाहती हूं कि उसके नाम पर पुस्तकालय और स्कूल खोले जाएं—और कोई एक ऐसा कमरा भी हो जिसमें कि वे सब चीजें रखी जा सकें, जिनका उससे ताल्लुक रहा है।
—श्रीमती विद्यावती (भगतसिंह की माता जी)

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