बालासाहब देवरस जन्मशताब्दी वर्ष- राष्ट्र ही जिनके लिए देव था
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बालासाहब देवरस जन्मशताब्दी वर्ष- राष्ट्र ही जिनके लिए देव था

Written byArchiveArchive
Dec 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Dec 2016 15:45:14

यदि छुआछूत पाप नहीं है, तो दुनिया में कुछ भी पाप नहीं है।'' राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस के ये शब्द रूढि़ग्रस्त मन पर तगड़ी चोट करते हैं। झकझोरते हैं। ये शब्द आज भी मशाल बने हुए है। बालासाहब व्यावहारिकता के कठोर धरातल पर मजबूती से कदम जमाकर चलने वाले व्यक्ति थे। द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी स्वयंसेवकों से कहते थे कि आपमें से अनेक लोग हैं जिन्होंने संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार को नहीं देखा है। आप बालासाहब को देखिए। आपको डॉ. हेडगेवार दिखेंगे।
श्री गुरुजी डॉ. हेडगेवार की खोज थे, तो बालासाहब डॉ. हेडगेवार द्वारा गढ़ा हुआ व्यक्तित्व। गुरुजी और बालासाहब का जोड़ अनोखा था। दोनों एक दूसरे के प्रति अत्यंत सम्मान का भाव रखते थे। एकबार गुरुजी ने बालासाहब का परिचय करवाते हुए कहा था ''जिनके कारण मैं सरसंघचालक कहलाता हूं ऐसे ये बालासाहब देवरस।''11 दिसंबर, 1915 को उनका जन्म हुआ था। 11 दिसंबर 2016 को उनका जन्मशताब्दी वर्ष पूरा    हुआ है।
पूजा-पाठ और कर्मकांड उनके स्वभाव को रुचते नहीं थे, लेकिन कर्मयोगी थे, गीता कंठस्थ थी। मेघदूत तो उलटे क्रम में शब्दश: दुहरा देते थे। उन्होंने संघ में आज व्यवहार में आने वाली अनेक पद्धतियों का प्रारंभ किया था। 1925 में संघ का प्रारंभ हुआ। 1927 में वे संघ से जुड़े और अगले पांच दशकों तक संघ वृक्ष को सींचते रहे। डॉ हेडगेवार, गुरुजी और बालासाहब संघ के विकास के तीन चरण हैं- पहला चरण था संगठन का निर्माण और विकास, दूसरा चरण हुआ अलग-अलग क्षेत्रों में इसके प्रभाव का विस्तार, बालासाहब ने इस विस्तार को सामाजिक निहितार्थ प्रदान किया। संघ के स्वयंसेवकों को निर्देशित करते हुए उन्होंने कहा था,- ''संघ की शाखा खेल खेलने अथवा कवायद (परेड) करने का स्थान मात्र नहीं है, अपितु सज्जनों की रक्षा का बिन बोले अभिवचन है। तरुणों को अनिष्ट व्यसनों से मुक्त रखने वाला संस्कार पीठ है। समाज पर अकस्मात् आने वाली विपत्तियों अथवा संकटों में त्वरित, निरपेक्ष सहायता मिलने का आशा केंद्र है। महिलाओं को निर्भयता तथा सभ्य आचरण का आश्वासन है। दुष्ट तथा देशद्रोही शक्तियों पर अपनी धाक स्थापित करने वाली शक्ति है, और सबसे प्रमुख बात यह है कि समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सुयोग्य कार्यकर्ता उपलब्ध कराने हेतु योग्य प्रशिक्षण देने वाला विद्यापीठ है।''
1973 से 1994 तक उन्होंने  सरसंघचालक के नाते संघ का मार्गदर्शन किया। इस दौरान अनेक ऐसी घटनाएं घटीं जिन्होंने देश के इतिहास को गहरे प्रभावित किया, फिर वह चाहे सारे देश को जेल में बदल देने वाला कुख्यात आपातकाल हो, देश में सामाजिक-राजनैतिक परिवर्तन लाने वाला राम जन्मभूमि मुक्ति आंदोलन हो, या मंडल कमीशन के बाद बना वातावरण। इन सभी मौकों पर बालासाहब के सकारात्मक सामाजिक नेतृत्व को देश ने देखा।
आपातकाल विरोधी आंदोलन देश में  परिवर्तन का प्रतीक बना। यह प्रतीक प्रतिक्रियावाद में न बदलने पाए, इस ओर से उन्होंने बड़ी सावधानी रखी, और 'भूल जाओ, माफ करो' कहकर आगे बढ़ने का इशारा किया। श्री राममंदिर आंदोलन हिन्दू स्वाभिमान का मुद्दा बना तो बालासाहब ने इसकी भूमिका को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि हिंदू शब्द किसी विशेष पूजा पद्धति या संप्रदाय तक सीमित नहीं है। जो भी भारत और भारत की संस्कृति में आस्था रखता है, वह हिंदू है। हिंदू शब्द बहुत व्यापक है। मंडल कमीशन के समय देश में गरमाते वातावरण पर उन्होंने सद्भावना के ठंडे छींटे मारे और संघ ने जाति आधारित आरक्षण के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया। 'आरक्षण कब समाप्त होगा' इस प्रश्न पर उन्होंने कहा कि जब जातिगत भेदभाव के शिकार लोगों को लगने लगे कि आरक्षण की आवश्यकता नहीं रह गई है। उन्हें ही फैसला करना है।  संघ के जन्मकाल से ही स्वयंसेवक सेवा और राहत के कायार्ें में लगे रहे , परंतु समय के साथ इन सेवा कायार्ें को सांगठनिक रूप देने की आवश्यकता अनुभव की गई। बालासाहब की ही प्रेरणा से 1979 में सेवाभारती का सूत्रपात हुआ। आज देशभर में संघ के स्वयंसेवक 1 लाख 55 हजार से ज्यादा सेवा कार्य संचालित कर रहे हैं। उन्होंने अनेक नई परंपराओं का सूत्रपात भी किया। श्रीगुरुजी डॉ. हेडगेवार के देहांत के बाद, स्वयं बालासाहब गुरुजी के देहत्याग के बाद सरसंघचालक बने। लेकिन उन्होंने अपने जीवित रहते हुए नूतन सरसंघचालक नियुक्त करने की प्रथा प्रारंभ की। संघ के कार्यक्रमों में भारतमाता के साथ प्रथम और द्वितीय सरसंघचालक का चित्र रखा जाता रहा है, बालासाहब ने स्पष्ट निर्देशित किया कि उनके बाद उनका चित्र न रखा जाए। प्रथम और द्वितीय सरसंघचालकों का दाहसंस्कार स्वयंसेवकों ने नागपुर के रेशिमबाग संघ कार्यालय में किया था। बालासाहब ने निर्देश दिया कि उनका अंतिम संस्कार  सामान्य व्यक्ति की भांति श्मशान में किया जाए और उनकी समाधि न बनाई जाए। अंतिम दिनों में वे देह से अत्यंत अशक्त हो गए थे, फिर भी कार्यकर्ताओं से मिलने और उनकी चिंता-पूछताछ करने का उनका क्रम टूटा नहीं। 1993 में चेन्नई के संघ कार्यालय में जिहादी आतंकियों ने बम धमाका किया। अनेक स्वयंसेवकों समेत 11 लोगों ने प्राण गंवाए। बालासाहब को डॉक्टरों ने छोटी यात्रा करने के लिए भी सख्त मनाही कर रखी थी। व्हील चेयर के बिना एक पग नहीं रख सकते थे। लेकिन वे आग्रह करके नागपुर से चेन्नई गए , और शोकसंतप्त परिवारों से 'देर से आने के लिए' भरे गले से क्षमा मांगी। 17 जून, 1996 को उन्होंने देहत्याग किया।
 उनका जन्म नागपुर में हुआ था, लेकिन मध्यप्रदेश के बालाघाट जिले का कारंजा उनका पैतृक गांव है। यहां पर बालासाहब तथा उनके छोटे भाई भाऊराव देवरस ( वे भी बालासाहब की तरह संघ के अत्यंत वरिष्ठ प्रचारक थे ) के नाम पर न्यास बनाया गया है —बालासाहब और भाऊराव देवरस सेवा न्यास, कारंजा। न्यास द्वारा साल 2015-16 को बालासाहब देवरस जन्मशताब्दी वर्ष के रूप में मनाया गया। साल भर पूजा-अर्चन के कार्यक्रम, खेलकूद-कबड्डी प्रतियोगिता, रक्तदान शिविर संपन्न हुए। जबलपुर से बालाघाट तक समरसता साइकिल यात्रा निकाली गई। 29 मार्च को लगाए गए चिकित्सा शिविर में 8900 लोगों का इलाज हुआ। 14 जून, 2016 को मध्यप्रदेश शासन ने क्षेत्र के लिए अनेक योजनाओं का लोकार्पण और शिलान्यास किया। इसी दिन कारंजा को प्रथम डिजिटल पंचायत घोषित किया गया।
जन्मशताब्दी वर्ष  का समापन गत दिनों जबलपुर के मानस भवन में आयोजित किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि सरकार्यवाह श्री भैयाजी जी जोशी ने प्रबुद्धजनों और नागरिकों से भरे सभागार को संबोधित करते हुए कहा कि ''बालासाहब देवरस के लिए राष्ट्र ही देव है और संघकार्य के अलावा अन्य किसी काम में उन्हें रस नहीं है। बालासाहब देवरस डॉ. हेडगेवार द्वारा गढ़े गए उन प्रथम मनीषियों में से एक हैं जिन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को गढ़ा। समाज की नब्ज पर उनकी उंगली सदैव बनी रहती थी।'' कार्यक्रम के अध्यक्ष श्रीनाथ पीठाधीश्वर स्वामी जितेन्द्रनाथ ने अपने बाल्यकाल के बालासाहब से जुड़े अनेक प्रसंग बतलाते हुए कहा कि उनकी प्रेरणा ने मेरे जैसे कितने ही लोगों का मानस गढ़ा है। समारोह में श्री जियालाल राहंगडाले को अलंकरण एवं डॉ. अखिलेश गुमाश्ता को सेवा अलंकरण प्रदान किया गया। ब्राह्मोस मिसाइल के विकास से जुड़े वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुधीर मिश्र को महानगर गौरव सम्मान दिया गया। कार्यक्रम के अंत में न्यास के अध्यक्ष और प्रांत संघचालक एडवोकेट प्रशांत सिंह ने शताब्दी वर्ष के समापन की घोषणा की।  -प्रतिनिधि

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