वीरता के पुजारी, होला-महल्ला के खिलाड़ी
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वीरता के पुजारी, होला-महल्ला के खिलाड़ी

Written byArchiveArchive
Dec 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Dec 2016 14:48:50

 

 

एफ.सी. भाटिया

होली पर पंजाब में होला-महल्ला की परंपरा है, जो युद्ध के अभ्यास को समर्पित है। दसवें गुरु श्री गोबिंद सिंह जी का एक कथन बड़ा प्रसिद्ध है, ''चिडि़यन ते मैं बाज लड़ाऊं, तबै गोविंद सिंह नाम कहलाऊं।''  अर्थात् मैं चिडि़यों को इतना शक्तिशाली बना दूंगा कि वे बाज को मार सकें। एक-एक को इतना बहादुर बना दूंगा कि वे सवा लाख से टक्कर ले सकें, तभी मैं अपना नाम गोविंद सिंह कहलाऊंगा। इसीलिए उन्होंने दलित-शोषित मानवता को प्रबल सैन्यशक्ति में परिवर्तित करना शुरू कर दिया था। इसी सिलसिले में गुरु साहिब ने आनंदपुर साहिब में होला-महल्ला  मनाने की परंपरा शुरू की। तब पंजाब में फाल्गुन मास की पूर्णिमा को रंगों से भरी होली मनाई जाती थी। गुरुजी ने होली के स्थान पर पूर्णिमा से अगले दिन वीर रसात्मक करतबों से भरपूर होला- महल्ला मनाने का निर्देश दिया।
होला-महल्ला में 'होला' शब्द होली का खालसाई बोली में बोला जाने वाला रूप है, जबकि महल्ला अरबी के शब्द 'मयहल्ला' यानी आक्रमण का क्षेत्रीय तद्भव रूप है। अर्थात् होला-महल्ला का अर्थ हुआ  होली के अवसर पर आक्रमण या युद्ध कौशल का अभ्यास। अब भी आनंदपुर साहिब में चैत्र प्रतिपदा वाले दिन विशेष रूप से होला-महल्ला पर्व मनाया जाता है।
दसवें गुरु गोबिंद सिंह जी एक ऐसे महापुरुष थे, जो जीवन-पर्यंत हिंदू धर्म की रक्षा के लिए संघर्षरत रहे। इसके लिए उन्होंने पहले अपने पिता गुरु तेगबहादुर जी की शहादत दी, फिर चारों पुत्रों की और अंत में धर्म और संस्कृति की रक्षा करते हुए स्वयं भी शहीद हुए।
गुरु गोबिंद सिंह जी ने दो उद्देश्यों से खालसा पंथ की स्थापना की—एक, बिखरे हिंदू मिलकर एक हो जाएं और दूसरा, भारत में विदेशी राज्य की समाप्ति हो। एक बार उनसे पूछा गया कि आप खालसा पंथ की स्थापना क्यों कर रहे हैं? उन्होंने तुरंत उत्तर दिया- यह खालसा पंथ आर्य धर्म, गऊ, ब्राह्मण, साधु और दीन-दु:खियों की रक्षा के लिए है। इस प्रकार खालसा पंथ के तत्व भारतीय संस्कृति में वहीं से विद्यमान हैं, जहां से भारतीय संस्कृति शुरू होती है। धर्म रक्षक गुरु गोविंद सिंह जी ने त्याग, शौर्य, करुणा और भक्ति जैसी पूर्व संचित प्रवृत्तियों का संयोजन कर एक व्यावहारिक महाकाव्य सिरजा। इस मायने में भारतीय संस्कृति की तलाश परशुराम के बाद सिख गुरुओं पर ही जा ठहरती है, जिनके हाथ में आयुध है और होठों पर लोकमंगल की ऋचाएं। देश, हिंदू धर्म-संस्कृति और गो की रक्षा के लिए गुरुओं के बलिदान की यशोगाथा युगो-युगों तक हमें बलिदान की दिव्य प्रेरणा देती रहेगी। गुरु गोविंद सिंह जी ने रामायण, महाभारत को जनता की भाषा में लिखा और भारतीय संस्कृति को उजागर करने वाले ढेर सारे साहित्य का सृजन किया। श्रीगुरु ग्रंथ साहिब में वेदों, उपनिषदों, दर्शन ग्रंथों तथा ब्राह्मण ग्रंथों आदि के दार्शनिक तत्व हमें स्वत: ही मिल जाते हैं।
 श्री गुरुग्रंथ साहिब में रामभक्ति का वर्णन है। इस पवित्र ग्रंथ में 2,433 बार राम शब्द का प्रयोग हुआ है, जो रामभक्ति के स्वरूप का ज्वलंत उदाहरण है। चौथे गुरु रामदास जी का कहना है कि रामभक्ति से भक्त भगवान को भी अपने वश में कर सकता है।
राम रतन पदार्थ बटु सागर भरिय राम
वाणी गुरु वाणी लगे बिनि हाथ चढि़या राम।
गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि देह नश्वर है, इसका ख्याल रखते हुए हरि का ध्यान करना चाहिए।
उनका कहना था अकाल ही सत्य है, वही शिव है और वही सुंदर।  निस्संदेह देश, हिंदू समाज, भारतीय संस्कृति युगदृष्टा गुरु गोविंद सिंह जी की महानता की सदैव ऋणी रहेगी। ऐसे महान पुरुषों के योगदान ने ही भारतीय अस्मिता को बनाए रखा है।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में अंग्रेजी के प्राध्यापक रहे हैं)

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