लाल दमन का शमन कब?
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लाल दमन का शमन कब?

Written byArchiveArchive
Aug 16, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 16 Aug 2016 14:28:14

ना,राजधानी दिल्ली में बैठकर अंदाजा तक नहीं लगाया जा सकता कि 'गॉड्स ओन कंट्री' (देवों की धरती) को मार्क्सवादियों ने किस कदर रक्त से लाल कर दिया है। सेकुलर मीडिया खुद को 'प्रगतिशील, दलित-आका, महिलाओं के हमदर्द, मार्क्स और माओ का भक्त' बताने वाले (यह अलग बात है कि आज उनका दोनों से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है) लाल कामरेडों की बर्बरता सेकुलर मीडिया न छापता है, न दिखाता है। मार्क्सवादियों का हिंसाचार लोकतांत्रिक मूल्यों को तो कब का ठेंगा दिखा चुका था, लेकिन बीते कुछ साल में उन्होंने इंसानियत की सारी हदें पार करते हुए, खासकर रा.स्व. संघ और भाजपा कार्यकर्ताओं को शारीरिक यातनाएं दीं, निर्मम हत्या की है। मार्क्सवादियों के इन वीभत्स कारनामों के बारे में केरल से बाहर दिल्ली जैसे महानगरों के लोग जान ही नहीं पाते। और केरल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के पोलित ब्यूरो सदस्य तक अपने हिंंसक जत्थों को राष्ट्रवादी विचारधारा से जुडे़ कार्यकर्ताओं को 'सबक' सिखाने की खुलेआम हिदायतें देते पाए जाते हैं, वहां के पुलिस अफसर नजरें फिराए रहते हैं, कोई शिकायत करता है तो उसे दुत्कार दिया जाता है। केरल में लगभग1960 से चले आ रहे इस कम्युनिस्ट हिंसाचार में अब तक  संघ और भाजपा के 500 से ज्यादा कार्यकर्ताओं की मौत हो चुकी है, हजारों का अंग-भंग हुआ है। इनमें से ज्यादातर गरीब परिवारों के बेटे थे और अपने परिवारों का पेट पाल रहे थे।   
2016 में ये बातें जान-सुनकर कुछ अटपटा लग सकता है आपको, पर यह सच है। पूछ देखिए जरा संघ के स्वयंसेवक रहे स्व. सुजित की गरीब कृशकाय मां से, जिनकी आंखों के सामने उनके बेटे को तलवारों से काट डाला गया! पूछ देखिए उस दलित छात्रा श्रुतिमोल से कि आखिर उसने आत्महत्या की कोशिश क्यों की थी? एर्नाकुलम के आर.एल.वी. कॉलेज ऑफ फाइन आर्ट्स में बीए (मोहिनीअट्टम) द्वितीय वर्ष की छात्रा श्रुति कॉलेज के जिस हॉस्टल में रह रही है, उसकी दीवारों पर एसएफआई वालों ने अपने गुट के नेता और उसके बीच प्रेम संबंध होने के झूठे पोस्टर चिपकाकर उसके चरित्र पर हमला किया। श्रुति का क्या कसूर था? बस इतना कि पिछले साल वह एसएफआई में थी, जिसे छोड़कर इस साल वह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद में शामिल हुई थी। एक लड़की के लिए मानसिक वेदना की इससे बड़ी वजह और कुछ हो सकती है भला? पर उसने हार नहीं मानी। पुलिस में रपट ही दर्ज नहीं कराई बल्कि अदालत में मामला दाखिल करने की हिम्मत दिखाई।     
मार्क्सवादी हिंसाचार के शिकार हुए श्रुति और उसके जैसे कुछ और लोग 6 अगस्त को नई दिल्ली के कांस्टीट्यूशन क्लब में नवोदयम के 'रेडट्रोसिटी' सेमिनार में आए थे। मकसद था मार्क्सवादियों के कारनामों और हिंसक राजनीति की कलई खोलना, राजधानी के नीति-निर्धारकों को झकझोरना, सेकुलर मुलम्मा चढ़ाए मीडिया की आंखों से चश्मा हटाना। सेमिनार को जीआईए संस्था का सहयोग प्राप्त था। चार सत्रों में चले इस सेमिनार का उद्घाटन करते हुए केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने कहा कि केरल में जारी दमन देश के सामने आना चाहिए, लेकिन मीडिया में इसे उतनी प्रमुखता नहीं दी जा रही है जितनी दी जानी चाहिए। यही वजह है कि लोगों को पता ही नहीं  है कि केरल में चल क्या रहा है। संघ और भाजपा कार्यकर्ता जिस तरह वहां वामपंथी गुटों की असहिष्णुता का लोकतांत्रिक और अहिंसक तरीके से प्रतिकार कर रहे हैं, वह अभिनंदनीय है। केरल भाजपा के पूर्व अध्यक्ष वी. मुरलीधरन ने कहा कि लोग केरल को विकसित प्रदेश के नाते तो जानते हैं पर उसका दूसरा चेहरा देश के सामने नहीं आता। दूसरे राजनीतिक दलों की तो छोडि़ए, माकपा अपनी ही पार्टी में विरोध के स्वर बर्दाश्त नही करती। उन्होंने बताया कि यूं तो माकपा खुद को 'दलितों का मसीहा' और भाजपा को 'दलित विरोधी' बताती है पर आजादी के बाद प्रदेश में इतने वर्ष राज करने के बावजूद उसने दलितों के पूज्य समाज सुधारक आयंकली का समारोह नहीं मनाया था, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार नई दिल्ली में संपन्न आयंकली स्मृति समारोह में भाग लिया था। इतना ही नहीं, माकपा के लिए अब, माओवादी हो या लेनिनवादी, विचारधारा के कोई मायने नहीं रह गए हैं।     सत्र में मौजूद प्रदेश माकपा के महासचिव रहे सी.पी. जॉन ने बताया कि प्रदेश में 2,500 मतदान केन्द्रों पर माकपा की मनमानी   चलती है। राज्य के दर्जनों संस्थान पार्टी के कब्जे में हैं।
इस अवसर पर मार्च में संपन्न हुए प्रदेश विधानसभा चुनाव में कुठूपरम्बा से भाजपा प्रत्याशी रहे सदानंदन मास्टर ने माकपा के हिंसाचार की कलई खोली। जनवरी 1994 में माकपा तत्वों ने उन पर भरे बाजार जानलेवा हमला करके उनके दोनों पैर घुटनों से नीचे काट दिए थे। पैर काटने के बाद रिसते जख्मों पर कीचड़ लगा दी जिससे कटे पैर फिर से न जुड़ पाएं। उस वक्त सदानंदन की उम्र महज 30 वर्ष थी। उनका 'अपराध' था, संघ का कार्यकर्ता होना। सेमिनार में सदानंदन ने कहा कि अपने राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए मार्क्सवादी किसी भी हद तक जा सकते हैं। सत्र में फिल्मकार अद्वैत काला की सदानंदन मास्टर और माकपाई हिंसा के शिकार हुए अन्य संघ कार्यकर्ताओं पर बनाई लघु डॉक्युमेंटरी फिल्म दिखाई गई।
सेमिनार के दूसरे सत्र-महिलाओं और दलितों पर अत्याचार-में विक्टोरिया कॉलेज (पलक्कड़) में प्रधानाचार्या रहीं श्रीमती टी.एन. सरसू विशेष रूप से भाग लेने आई थीं ताकि महिलाओं के प्रति उन माकपाइयों के असल व्यवहार की सच्चाई सामने लाएं जिसकी पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा कारत टीवी चैनलों पर 'महिलाओं पर अत्याचार' के लिए भाजपा को खूब खरी-खोटी सुनाती रही हैं। श्रीमती सरसू ने जब धीर-गंभीर मुद्रा में बोलना शुरू किया तो सभागार में मौजूद हर श्रोता के चेहरे पर भावुकता और आक्रोश के भाव साफ पढ़े जा सकते थे। सरसू की भी उस भयंकर मानसिक यातना को याद करके बार-बार आंखें भर आतीं और गला रुंध जाता। 31 मार्च, 2016 को सेवानिवृत्त होने से पहले 8 महीने उन्होंने उस कॉलेज की प्रधानाचार्या के नाते सेवा दी थी जिसमें वे पिछले 27 साल से पढ़ा रही थीं। प्रधानाचार्या का प्रभार मिलने के बाद उन्होंने कॉलेज में जारी वित्तीय अनियमितताओं को सुधारा, अराजकता को दूर करने की कोशिश की, मनमानी करते रहे शिक्षकों से समय पर कक्षाएं लेने को कहा तो कॉलेज के वामपंथी शिक्षक संघ से जुड़े कुछ शिक्षकों ने उनके खिलाफ गलत आरोप लगाते हुए मोर्चा खोल दिया। अधिकारियों ने जांच की तो सरसू पर लगे आरोप झूठे साबित हुए। मार्क्सवादी गुटों से जुड़े छात्रों ने उनका कॉलेज आना-जाना दूभर कर दिया। मुकदमे चले। पर श्रीमती सरसू ने हार नहीं मानी। वे उस सरकारी कॉलेज में पढ़ने वाले ज्यादातर गरीब छात्रों के हित में जूझती रहीं। हद तो तब हो गई जब उनकी सेवानिवृत्ति के दिन एसएफआइ के छात्रों ने न केवल आतिशबाजी की बल्कि उन्हें फिर  एक झूठे आरोप में फंसाने का षड्यंत्र तक रचा। लेकिन तारीफ करनी होगी श्रीमती सरसू की जिन्होंने कम्युनिस्ट शिक्षक संघ और एसएफआइ के उन छात्रों के खिलाफ आगे भी डटकर मुकाबला करने का संकल्प किया है।
जीआइए की संयोजक और सर्वोच्च न्यायालय में वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीमती मोनिका अरोड़ा ने जीशा हत्याकांड से लेकर महिलाओं पर कम्युनिस्ट अत्याचारों के तमाम मामले गिनाते हुए कहा कि मार्क्सवादियों की कथनी और करनी में अंतर है। उन्हें आतंकियों के मानवाधिकारों की तो चिंता है, पर सदानंदन, जयकृष्णन, सत्यन, जीशा, श्रुति, सरसू, सुजित और सनूप जैसों के मानवाधिकारों की कोई परवाह नहीं है। (देखें, बॉक्स) सत्र की अध्यक्षता कर रहे अंग्रेजी साप्ताहिक ऑर्गनाइजर के पूर्व संपादक और भाजपा के प्रकाशन प्रकोष्ठ प्रभारी डॉ. आर. बालाशंकर ने कहा कि माकपा के हिंसाचार को रोकने के लिए संघ की ओर से किए गए शुरुआती प्रयास को आज करीब 40 साल होने को आए पर केरल में कम्युनिस्टों की हिंसा नहीं थमी। अभी एक महीने पहले कण्णूर में एक माकपा नेता ने अपने हिंसक जत्थों को खुलेआम कहा कि विरोधियों को जैसे हो, खत्म करो। ऐसा बयान देने के बाद भी उस पर कोई मुकदमा दर्ज नहीं हुआ। ऐसा क्यों है कि माकपा के खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाता, कोई कार्रवाई नहीं होती? इसका कारण मात्र इतना है कि राजनीतिक रूप से उन्होंने हर मोर्चे को साधा हुआ है।
तीसरे सत्र में गुरुवायूर श्री कृष्ण कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष रहे के.एस. सनूप का वक्तव्य रोंगटे खड़े कर गया तो केरल में ध्वस्त होती कानून-व्यवस्था की चारों ओर हो रही अनदेखी के बारे में सोचने को भी मजबूर कर गया। उसके अभाविप कार्यकर्ता के नाते छात्रसंघ अध्यक्ष बनने से तिलमिताए एसएफआइ वालों ने सनूप पर उस वक्त जानलेवा हमला किया जब वह परीक्षा हॉल में उत्तर लिख रहा था। हमले में सनूप की बाईं आंख हमेशा के लिए चली गई। सनूप ने जब अपनी नकली बाईं आंख कोटर से निकालकर सबके सामने रखी तो सब हतप्रभ रह गए। सनूप के शब्दों में आवेश साफ झलक रहा था। उसने कहा कि कितने ही सेमिनार हो चुके हैं, पर परिणाम कुछ नहीं निकलता। सनूप ने कहा कि वे किसी की दया के नहीं चाहते। वे कहते हैं, ''हम केरल का भविष्य को सुनहरा बनाने का संकल्प लेकर चल रहे हैं और स्वामी विवेकानंद के शब्द हमें रास्ता दिखाते हैं-उठो, जागो और लक्ष्य प्राप्त होने तक रुको नहीं।''
सत्र में विशेष रूप से उपस्थित लोकसभा में एंग्लो-इंडियन सांसद प्रो. रिचर्ड हे ने अपने वक्तव्य में कहा कि केरल की मार्क्सवादी सरकार हिंसा पर लगाम लगाने में असफल रही है। ज्यादातर गरीब परिवारों के एकमात्र कमाने वाले युवकों को हिंसा का शिकार बनाया जाता है। कम्युुनिस्ट अपने विरोधियों का उनके ही गांव में रहना मुहाल कर देते हैं, उनकी बहन-बेटियों की शादी नहीं हो पाती, क्योंकि उनके लिए रिश्ता लाने वालों को डराकर भगा दिया जाता है। उन्होंने आह्वान किया कि राजनीतिक दल राजनीति से ऊपर उठकर इस पर गंभीरता से विचार करें। नेता, मीडिया और बुद्धिजीवी इस हिंसा पर चिंतन करके समाधान खोजें। सेमिनार के चौथे और आखिरी सत्र में सांसद मीनाक्षी लेखी ने कहा कि वामपंथी बड़ी सफाई से झूठ का प्रचार करते हैं, लेकिन अफसोस कि उनके झूठ को उजागर नहीं किया जाता। मीडिया आज भी मनमानी चलाता है। अगर वामपंथियों के झूठ का दमदार तरीके से पर्दाफाश किया जाए तो वे सामना नहीं कर सकेंगे। (देखें, बॉक्स) विशेष वक्ता के नाते रा.स्व. संघ के अ.भा. सह प्रचार प्रमुख श्री जे. नंद कुमार ने समय-समय पर संघ द्वारा दिए शांति प्रस्तावों का उल्ल्ेख किया और बताया कि कम्युनिस्ट शांति के लिए तैयार ही नहीं हैं, प्रस्तावों का मजाक उड़ाते हैं। उन्होंने केरल के 'पार्टी गावों' की असलियत बयां की। श्री नंदकुमार का कहना था कि मार्क्सवादियों की हत्या करने की पद्धति में तालिबानी बर्बरता की झलक स्पष्ट बताती है कि मार्क्सवादियों का उनसे प्रशिक्षण के स्तर पर कोई सूत्र जुड़ा है। (देखें, बॉक्स)। सेमिनार को रेडक्रॉस सोसाइटी, केरल के पूर्व अध्यक्ष सुनील कुरियन, नवोदयम के मार्गदर्शी श्री एन. वेणुगोपाल, अध्यक्ष एडवोकेट कैलाशनाथ पिल्लै, फिल्मकार अद्वैत काला और भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के. जे. एल्फोंस ने भी संबोधित किया। दिन भर चले सत्रों में राजधानी दिल्ली के लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार और समाजसेवी बड़ी संख्या में उपस्थित थे।     -आलोक गोस्वामी

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