जिहाद की खाद जेएनयू : थापर के शागिर्द बने गजनवी और अफजल भक्त
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जिहाद की खाद जेएनयू : थापर के शागिर्द बने गजनवी और अफजल भक्त

Written byArchiveArchive
Aug 8, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 08 Aug 2016 15:17:05

प्रसिद्ध अंग्रेजी विचार पत्रिका 'सेमिनार' की संस्थापक संपादक राज थापर ने अपनी आत्मकथा 'ऑल दीज ईयर्स' में एक प्रसंग को दर्ज किया है। बात 1980 की है। तब   डॉ. कर्ण सिंह इंदिरा गांधी मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री थे। उन्होंने अपने मित्र रोमेश थापर से एक दिन शिकायत की कि उनकी बहन रोमिला थापर अपने इतिहास लेखन से भारत को नष्ट कर रही हैं। इस पर उन की रोमेश से तकरार हो गई। रोमिला की भाभी ने यह प्रत्यक्षदर्शी वर्णन लिखते हुए रोमिला का बचाव नहीं किया है। उलटे इस झड़प में अपने पति रोमेश को ही कमजोर पाया जो 'केवल भाई' के रूप में उलझ पड़े थे। संकेत यही है कि डॉ. कर्ण सिंह की बात राज को अनुचित नहीं लगी थी।
तब से रोमिला थापर ने लंबा सफर तय किया है। वे जेएनयू की सबसे प्रतिनिधि प्रोफेसर के रूप में प्रसिद्ध हुईं। उनके लेखन का मुख्य स्वर हिन्दू-निंदा रहा है। इसी को भारत को नष्ट करना कहा जा सकता है। उन्होंने और उनके संप्रदाय ने जेएनयू में छात्रों को लगातार यही पढ़ाया। उन्हीं के चेले अब विरासत संभाल रहे हैं। अत: संसद पर हमला करने वाले अफजल यदि जेएनयू में हीरो बनाया जाता है, तो यह अनायास नहीं है। आखिर वह भारत को नष्ट ही तो करना चाहता था! ठीक वही चीज जो, बकौल डॉ. कर्ण सिंह, रोमिला का लेखन करता रहा।
इसलिए महमूद गजनवी और जिहादी अफजल के प्रति जेएनयू के मार्र्क्सवादी नजरिए में बड़ी समानता है। रोमिला थापर को गजनी के महमूद से वही लगाव रहा है, जो अभी अनेक जेएनयू छात्रों को जिहादी अफजल से दिखता है। 10-11वीं सदी का महमूद भारत पर 17 हमलों और सोमनाथ मंदिर के विध्वंस के लिए कुख्यात है। पिछले 45 साल से इतिहास लेखन या सांप्रदायिकता, हिन्दू धर्म आदि पर रोमिला का ऐसा कोई भाषण, लेख ढूंढना कठिन है, जिसमें महमूद का हसरत भरा जिक्र न हो। कि, किस तरह 'उस के साथ नाइंसाफी हुई'। उसी तरह, जैसे अभी 'अफजल के साथ' हुई!
रोमिला को शुरू से ही विश्वास है कि महमूद को सबने, विशेषकर 'मूढ़ हिंदुओं ने गलत समझा। अल बरूनी से लेकर मीनाक्षी जैन तक, एक हजार साल से इतिहासकारों ने उसका भ्रामक चित्रण किया। महमूद कत्लो-गारत मचाने वाला, मंदिरों-मूर्तियों का विध्वंसक, हिंदुओं का उत्पीड़क, और इस्लामी गाजी नहीं था'- इसमें तो रोमिला को कभी संदेह नहीं रहा। किंतु तब वह था क्या? वे इसी खोज में लगी रहीं।
उनकी इस खोज का एक आकलन है उनकी पुस्तक: 'सोमनाथ: मेनी वॉयसेज ऑफ ए हिस्टरी'। इसमें थापर ने अनेक अनुमानों, किंवदंतियों को इकट्ठा किया है ताकि 'महमूद के माथे से सोमनाथ विध्वंस का कलंक हटाने का उपाय हो'। थापर के लिए 'सबसे महत्वपूर्ण सवाल' इस प्रकार था: ''ठीक-ठीक किस वर्ग ने (सोमनाथ) मंदिर का विध्वंस किया था और कौन वर्ग इससे प्रभावित हुए थे? इन वगार्ें के बीच क्या संबंध थे और क्या यह हर ऐसी क्रिया से बदलेे भी थे? क्या यह मुसलमानों द्वारा हिंदू मंदिर अपवित्र करने का मामला था या कोई और उद्देश्य था? क्या मजहबी वाहवाही पाने के अलावा किसी और मकसद से ऐसी घटनाओं को जान-बूझकर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया?''
इस सवाल को ध्यान से पढ़ें। सवाल रखने की चतुराई में ही मनचाहा उत्तर निहित है। महमूद ने अकेले तो सोमनाथ का ध्वंस किया न होगा, वह जरूर कोई वर्ग होगा। तो वह कौन था? उसे सामने लाना चाहिए। सोमनाथ विध्वंस को मामूली घटना बताने, उसमें महमूद की भूमिका को कम करने, यहां तक कि उसे सद्भाव-प्रेरित बताने की गरज से रोमिला थापर ने बेपर-की को भी खूब स्थान दिया, गल्प-लेेखन और इतिहास का भेद मिटा दिया। उन्होंने महमूद के बारे में अंतर्विरोधी कथाओं को भी समान आदर से रखा है। कौन जाने, भोला हिंदू किस से कायल हो! जैसे यह कि, ''महमूद कोई मंदिर तोड़ने थोड़े ही आया था। वह तो किसी इस्लाम से पहले अरब में पूजी जाती किसी देवी की मूर्ति ढूंढता आया था जिसे खुद पैगंबर ने तोड़ने का हुक्म दिया था। अब कहीं वह सोमनाथ मंदिर में रही हो, तो महमूद बेचारा क्या करता! एक मुसलमान के लिए किसी देश पर हमलेे का यह बिल्कुल उचित कारण था! फिर भी बुर्जुआ यूरोपीय और सांप्रदायिक हिन्दू इतिहासकार महमूद को दोषी बताते रहे। कैसे नीच लोग हैं।''
आगे रोमिला की दूसरी कथा है। ''महमूद केवल धन लूटने आया था, क्योंकि उसे साम्राज्य-विस्तार करना था। इसके लिए फौज चाहिए थी। फौज के लिए धन चाहिए था। अत: राज्य का विस्तार, न कि मंदिर-ध्वंस उसका उद्देश्य था। फिर भारत की लूट से उसने गजनी में मस्जिद, और हां, लाइब्रेरी भी बनवाई!'' क्या अब भी कोई उसे दोषी मानेगा? बल्कि शायद यह हुआ होगा कि महमूद के जरखरीद सिपाहियों में हिन्दू भी रहे होंगे। हो सकता है, सोमनाथ ध्वंस में उन्हीं का हाथ हो। यानी, कुछ भी हुआ हो सकता है। अंतत: रोमिला का निष्कर्ष है कि ''अगर महमूद ने सोमनाथ मंदिर तोड़ा भी, तो उस के पास इस के बहुत बड़े कारण थे।''
ठीक उसी तरह, जैसे जिहादी अफजल के पास भारतीय संसद पर हमला कर दर्जनों या सैकड़ों सांसदों का एकबारगी खात्मा करने की चाह के बहुत बड़े कारण थे। तभी तो उसने कहा कि मौका मिले, तो वह फिर वही करेगा। ''वाह! कैसा जांबाज। ऐसे शानदार जिहादी को इस पिद्दी 'हिन्दू-इंडियन स्टेट' ने फांसी दे दी। क्या हिमाकत है! थापर के भक्त छात्रों का रोष बिल्कुल वाजिब है। इसीलिए वे अफजल को आज का हीरो बनाने का आंदोलन कर रहे हैं, जैसे रोमिला ने महमूद गजनवी को इतिहास का बनाया है।''
रोमिला का हिसाब है कि ''उसके द्वारा भारत पर चढ़ाई के बाद की सदियों में भारत की बड़ी तरक्की हुई। महमूद की शरारतों (अगर उसने की भी) को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाता रहा है। नहीं तो, डेढ़ ही सदी बाद लिखे गए 'पृथ्वीराज रासो' में सोमनाथ विध्वंस का जिक्र क्यों नहीं मिलता? जैन पुराणों और संस्कृत अभिलेखों में भी इसका मामूली ही जिक्र क्यों है? इसके माने कि सोमनाथ विध्वंस कोई बड़ी बात नहीं रही होगी। संभवत: उसका बार-बार ध्वंस होता रहा हो (मरदूद था ही इसी लायक!), स्वयं हिन्दुओं ने भी उसका कई बार ध्वंस किया हो। वैसे भी, हिंदुओं द्वारा मंदिर तोड़ने की पुरानी परंपरा रही है।'' अब इसका प्रमाण मत मांगिए। जेएनयू के मार्क्सवादियों से उनकी जानकारी का स्रोत पूछना उनकी तौहीन करना है। रोमिला ने जो कह दिया, उसे मानो वरना 'तुम सीताराम गोयल की तरह उजड्ड हो, बात करने लायक नहीं'। उसी प्रकार, 'यदि अफजल निदार्ेष है, तो है'। बस! इसे 'नहीं मानने वाले असहिष्णु, सांप्रदायिक, फासिस्ट हिन्दूवादी हैं'।  
 फिर ''महमूद एक लड़ाका सुल्तान था।   यहां-वहां चढ़ाई करना, मुल्क पर मुल्क जीतना और मनमानी करना उसका स्वाभाविक कर्म था। आखिर कोई अपने जमाने के चलन से बाहर थोड़े होता है! फिर महमूद इस्लाम का पक्का बंदा था। उसे मस्जिद बनवाने के लिए दौलत चाहिए थी। यदि वह गजनी में नहीं थी, तो कहीं से उसे लाना ही था। वैसे भी, सोमनाथ की दौलत तो उच्च-जातीय हिंदुओं ने गरीबों का खून चूसकर ही इकट्ठी की होगी (यह जानने के लिए भी क्या शोध की जरूरत है?)। तब लूटे माल को फिर किसी ने लूट लिया तो कौन सी बड़ी बात हो गई!''
उसी प्रकार, आज इस ''सड़े-गले, उच्च-जातीय, हिंदू, दमनकारी, बुर्जुआ, सेमी-फ्यूडल इंडिया को नष्ट करने की चाह तो बिलुकल सही है। यदि अफजल इसके लिए कटिबद्ध हुआ, तो यह एक सबाब का काम था। क्या कुरानशरीफ और शरीयत पवित्र नहीं हैं? तब दारुल-हरब पर हमला कर उसे दारुल-इस्लाम बनाने की कार्रवाई में गलत ही क्या है! क्या खुद गांधीजी ने नहीं कहा था कि एक हिंदू को अच्छा हिंदू, और मुसलमान को अच्छा मुसलमान बनना चाहिए? तब अपने प्रोफेट का अक्षरश: अनुकरण करते हुए इस्लाम का विस्तार करने के लिए गैर-इस्लामी इलाके पर हमला करके अफजल ने वही तो किया। फिर वह हीरो नहीं तो और क्या है!''  मगर 'जैसे महमूद की सचाई न तो प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद, न कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, न सरदार पटेल जैसे सांप्रदायिक हिंदुओं ने जानने का कष्ट किया। और 1947 के बाद सोमनाथ-जीणार्ेद्धार जैसी निहायत बेजा हरकत कर डाली। यदि वह न हुआ होता, तो रोमिला के अनुसार, 1991 में आडवाणी ने वहां से रथयात्रा न की होती, तब सेक्युलरिज्म को सबसे बड़ी चोट न पहुंची होती। अब समझे, कि महमूद के बारे में बढ़ा-चढ़ाकर लिखने-बोलने के कितने खराब नतीजे हुए!'' वैसे ही खराब, जो 'अफजल को फांसी देने से कश्मीर, हिन्दुस्थान और जेएनयू में हुए हैं'। इसलिए, ईमान की बात यह है कि अभी जेएनयू विवाद में अफजल का गुणगान करने वाले प्रतिभाशाली छात्र नहीं बल्कि 'इंडियन स्टेट' दोषी है, जो अफजल का ऐतिहासिक महत्व समझने से इनकार कर रहा है। जैसे, रोमिला सन् 1010 से लेकर 1991 तक सारी जरूरी चीजों को जोड़कर सोमनाथ और महमूद पर सही इतिहास लिखा। क्योंकि मामला तथ्यों का था ही नहीं, वह तो सेक्युलरिज्म के भविष्य का है! अत: जैसे अपने देश से कटे हुए पश्चिमी भारतविदों और हिंदू सांप्रदायिक इतिहासकारों ने महमूद गजनवी के साथ नाइंसाफी की, उसी तरह अभी अफजल के साथ हो रहा है।''
हालांकि, मुश्किल यह है कि महमूद के बारे में उसके अपने विद्वान अल बरूनी से लेकर बीसवीं सदी में मुहम्मद हबीब तक, अनगिनत इतिहासकारों ने ही ढेर सारी गड़बड़ बातें लिख छोड़ी हैं। जैसे, अल बरूनी: ''महमूद ने भारत की उन्नति को तहस-नहस कर दिया और ऐसे लाजबाव कारनामे किए जिससे हिन्दू धूल-कणों की तरह हर दिशा में बिखर गए और उन की कहानियां ही बच गईं। तब से इन बिखरे लोगों में सभी मुसलमानों के प्रति तीव्र घृणा भर गई।'' अल बरूनी को पता न था कि ऐसा लिखने से हजार साल बाद भाजपा को लाभ हो सकता है।
उसी तरह, अफजल को हीरो बनाने में मुश्किल यह है कि ताजाकिस्तान,अफगानिस्तान, बंगलादेश, पाकिस्तान से लेकर सीरिया और मोरक्को तक वैसे जिहादियों को खत्म करने का अभियान चल रहा है। ये सभी मुसलमान देश ही हैं, जो जिहाद को आज का उसूल मानने में समस्या देखते हैं कि इस में दूसरों से ज्यादा उनके अपने मिट जाने का अधिक खतरा है।
इस प्रकार, कुल-मिलाकर मामला मिटने या मिटाने का है। यदि आप अफजल को नहीं मिटाएंगे, तो अफजल और उनके दस्ते आपको मिटा देंगे। हां, यदि आप अपना मिटना खुशी-खुशी कबूल कर लें, तो आप प्रगतिशील, लिबरल, सेक्युलर हैं। अन्यथा प्रतिगामी, सांप्रदायिक, फासिस्ट। अब यह कहने की जरूरत नहीं कि मिटकर भी ख्याति पाना अच्छा है। रोमिला थापर और उनके वर्तमान चेलेे जेएनयू के माध्यम से 'मूढ़ हिंदुओं को यही समझाना चाह रहे हैं।''   
– शंकर शरण-

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