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मुजफ्फर हुसैन
स्लिम जगत में इन दिनों प्राय: सभी देशों में कट्टरवादी आंदोलन अपने चरम पर हैं। भारत में जिस सांस्कृतिक परिवर्तन को घर वापसी की संज्ञा दी गई है उसे हमारे पड़ोसी देश के कट्टरवादी सुन्नी संगठनों ने अपना राजनीतिक और मजहबी एजेंडा बना लिया है। पाकिस्तान निर्माण के बाद एक दिन भी ऐसा नहीं बीता है कि जब कट्टरवादी सुन्नियों ने अपने हाथ खून से लाल न किए हों। इसका ताजा उदाहरण पाकिस्तान का नगर योहानाबाद है। कट्टरवादी सुन्नी मुसलमानों ने वहां ईसाइयों को चुन-चुन कर किस तरह से कत्ल किया, उसका विस्तृत वर्णन जानने से पूर्व हम कराची जैसे अन्तरराष्ट्रीय नगर की एक दिल दहला देने वाली घटना पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करते हुए कराची में दाऊदी बोहरों की एक मस्जिद में रखे गए बम विस्फोट के कारण नमाजियों की हताहत का वह दृश्य प्रस्तुत करना चाहेंगे, जिसमें अनेक नमाज पढ़ने आए दाऊदी बोहरा खून में लथपथ हो गए। नमाज समाप्त होते ही शक्तिशाली बम फटा। इस घटना को पाकिस्तान के मीडिया ने तो छिपा लिया, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से कुछ ही समय में उक्त समाचार सारी दुनिया में फैल गया। बम विस्फोट करने वाले मस्जिद के बाहर नारे लगा रहे थे, जिसमें कहा जा रहा था कि राफजियों को पाकिस्तान में रहने नहीं दिया जाएगा। राफजी अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ होता है भटका हुआ।
पाकिस्तान में जो सुन्नी पंथ से जुड़ा हुआ नहीं होता है उसे राफजी की संज्ञा दी जाती है। पाकिस्तान के निर्माण से ही वहां के कट्टरवादी सुन्नी इस बात का आग्रह करते रहे हैं कि पाकिस्तान कट्टर सुन्नियों का देश है, इसलिए यहां किसी भी अन्य इस्लामी पंथ के व्यक्ति को रहने नहीं दिया जाएगा। पाकिस्तान बनते ही वहाबी पंथ के मौलानाओं ने अन्य मुस्लिम पंथ को इस बात से अवगत करवा दिया था कि यह नया देश मात्र सुन्नी अनुयायियों का है। वास्तव में यहां औरों को कभी पसंद नहीं किया गया। इतना ही नहीं उन्हें यह धौंस भी दी जा रही है कि पाकिस्तान में उनके लिए कोई स्थान नहीं है। जिन्ना जिस पंथ से संबंध रखते थे, उन खोजा मुसलमानों को भी नहीं बख्शा गया। शिया मुस्लिम किसी भी पंथ के हों, वे उनके शब्दों में वर्जित हैं। इसके उपरांत भी इस्लाम के लगभग सभी पंथ के अनुयायी पाकिस्तान में निवास करते हैं। भारत से गए बड़ी संख्या में दाऊदी बोहरों का भी समावेश होता है। उनकी कराची में बहुत बड़ी संख्या है, इसलिए वहां इस प्रकार की घटनाएं घटित होना अत्यंत साधारण बात है। कट्टर सुन्नी उन्हें राफजी की संज्ञा देते हैं। 20 मार्च को जब बम फटा उस समय भी नारे सुने गए 'राफजी, पाकिस्तान छोड़ो।' इस प्रकार पाकिस्तान निर्माण के प्रथम दिवस से ही वहां शिया-सुन्नी ही नहीं, बल्कि अहमदियों को भी निशाना बनाया गया है।
पाकिस्तान में अब पारसियों की संख्या तो नहीं के बराबर रह गई है, लेकिन हिन्दू और बौद्ध सहित अन्य पंथ के लोग अब वहां से पलायन करने लगे हैं। ईसाई पंथ भी अब नाम का रह गया है। ईसाइयों को फांसी देने के लिए चुना जाता है। पाठकों के मन-मस्तिष्क में अब तक तारा मसीह का नाम जीवित होगा जिसने जुल्फिकार अली भुट्टो को फांसी दी थी। लेकिन पिछले दिनों योहानाबाद में घटी घटना के पश्चात ईसाई समाज इस बात पर विचार करने लगा हैं कि या तो मुट्ठी भर ईसाई अपने अन्य देशों के ईसाई बंधुओं को साथ लेकर लड़ाई लड़ें अथवा वे पाकिस्तान को हमेशा के लिए अलविदा कह दें। पाकिस्तान एक मुस्लिम बहुल देश होने के कारण चाहे जिस प्रकार के कायदे-कानून बनाए, लेकिन आज के अंतरराष्ट्रीय जगत में वहां के नेताओं को विचार करना होगा कि वे इस दुनिया से जुड़कर रहें या फिर अरबस्थान के बददू बनकर अकेले ही भटकते फिरें। पाकिस्तान में ईसाइयों की सामूहिक हत्या संबंधी इस नवीन घटना ने न केवल दुनिया के अन्य पंथियों को बल्कि स्वयं पाकिस्तान के सत्ताधारियों को भी इस बात के लिए मजबूर कर दिया है कि वे अपने कट्टरवादियों से किस प्रकार निपटें? पाकिस्तान के इतिहास में एक भी दिन ऐसा अब तक नहीं गुजरा कि जब किसी अन्य पंथ या इस्लाम के ही अन्य पंथ वाले अनुयायियों के खून से उन्होंने अपने हाथ न रंगे हों। पाठकों को यह तो बताने की जरूरत ही नहीं है कि वहां के मुट्ठीभर हिन्दुओं के साथ उनका व्यवहार किस प्रकार का रहा है? योहानाबाद में ईसाइयों के साथ जिस प्रकार की मारकाट की गई, यह खूनी आंदोलन का नया अध्याय है। पाकिस्तान का कोई भी कोना हो, इन दिनों जो घृणा और मारकाट की नई लहर चल रही है उसका मुख्य नारा है-'राफजी भगाओ,पाकिस्तान बचाओ।' इसका सामान्य भाषा में यह अर्थ है कि जो इस्लाम से भटक गए हैं उन्हें पाकिस्तान में रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। पाकिस्तान इस्लामी देश है और वह केवल मुसलमानों के लिए बनाया गया है। जो सुन्नी मुसलमान नहीं हंै, उनकी गिनती वह इस्लाम में नहीं करते हैं। उन्हें पाकिस्तान से जाना होगा, नहीं जाते हैैं तो उन्हें भगाना होगा और नहीं निकलते हैं तो उनका पाकिस्तान से सफाया करना होगा। इसलिए जहां कहीं इस्लाम के अन्य अनुयाइयों को मारा-काटा जाता है उन्हें राफजी कहा जा रहा है। सच्चा मुसलमान वही होगा कि जो सुन्नी आस्था के अनुसार इस्लाम को मानेगा और सुन्नी आदेशों के अनुसार ही इस्लामी क्रियाओं का पालन करेगा। इसलिए अन्य पंथा के मुसलमानों की मस्जिदों को तोड़ देना और नमाज पढ़ रहे पुरुष-स्त्रियों को मौत के घाट उतार देना असली मुसलमान के लिए अनिवार्य है। वे पाक से इन राफजियों को निष्कासित कर अथवा मौत के घाट उतारकर सच्चे मुसलमान का दायित्व निभाते हैं। मार-काट की इस नई लहर से अन्य समाज के मुसलमान भयभीत हैं, लेकिन वे इन कट्टरवादियों के सामने लाचार हैं। पाक सरकार में इतना साहस नहीं कि इस गुंडागर्दी का दमन कर सके।
पाकिस्तान के कराची से प्रकाशित होने वाले गत 18 मार्च के दैनिक जंग में अयाज अमीर ने लेख का शीर्षक दिया है-'पाकिस्तान में अब ईसाई क्या करें?' जब पाकिस्तान की ईसाई बिरादरी के घरों को जला दिया गया, जब ईश निंदा के बहाने लाहौर की जोजफ कॉलोनी को तहस-नहस कर दिया गया, जब ईंटों के भट्ठों पर काम करने वाले ईसाई पति-पत्नी को भट्ठों में धकेल दिया गया, तब केन्द्र और राज्य की पुलिस कहां थी? लाहौर के दो चर्च में 15 लोगों ने घटनास्थल पर ही दम तोड़ दिया और दर्जनों घायल हो गए तो लाचार ईसाई सड़कों पर निकल आए और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहंुचा कर अपनी ओर ध्यान आकर्षित कराने का प्रयास करने लगे तो दो व्यक्तियों को पकड़कर आग में डाल दिया गया।
दंगाइयों को गिरफ्तार न करके बेचारे ईसाइयों को ही गिरफ्तार किए जाने की शुरुआत कर दी गई तो भला कोई बताए कि ईसाई जनता अपनी रक्षा के लिए स्वयं संघर्ष नहीं करती तो क्या करती? लेकिन प्रशंसकों ने दंगाइयों को सजा देने के स्थान पर जो इस हिंसा में प्रभावित हो रहे थे उन्हीं को अपना निशाना बनाना शुरू कर दिया। ऐसी स्थिति में मुट्ठीभर ईसाई 'मरते क्या नहीं करते' वाली कहावत को चरितार्थ कर दंे इसमें किसका दोष होगा? दंगाइयों का सामना करने वाले दो व्यक्तियों को जब पुलिस ने आरोपी घोषित करके बंदी बना लिया तो फिर जनता की भावना भड़काना एक साधारण बात थी। ईसाइयों के ही मामले में पुलिस का यह रवैया नहीं है, बल्कि शिया युवकों के साथ भी पुलिस और प्रशासन ऐसा ही व्यवहार करते हैं। तब संकट से घिरे लोग अपनी सुरक्षा के लिए संघर्ष न करें तो क्या करें? इसका उत्तर आज तक पाकिस्तान में कोई भी सरकार नहीं दे सकी है। वास्तविकता तो यह है कि पाकिस्तान की पुलिस एक विशेष वर्ग की पक्षधर बनकर यह काम करती है, तब सवाल यह उठता है कि पाकिस्तान में रह रहे अन्य मुसलमानों के वर्ग स्वयं की रक्षा के लिए हथियार न उठाएं तो क्या करें? पाकिस्तान के पुलिस और प्रशासन की यह मनगढं़त कहानी 66 वर्ष पुरानी हो चुकी है। इसलिए जनता को अपनी रक्षा के लिए हथियार भी उठाना पड़ता है और संघर्ष भी करना पड़ता है।
सरकार इस बात का उत्तर दे कि क्या वह केवल उन जिहादियों की सरकार है जो अन्य पाकिस्तानी नागरिकों को गाजर-मूली की तरह काट देते हैं। सच तो यह है कि पाकिस्तान की आज तक की सरकारों ने स्वयं को केवल एक ही पक्ष की निगेहबान माना है। इसलिए यह बीमारी अब एक भयंकर रोग का रूप ले चुकी है। वास्तविकता तो यह है कि यह जुनूनी संस्कृति उत्तर-पश्चिम सीमाओं के निकट है,जबकि दक्षिण में समुद्र किनारे के निकट एक सेकुलर स्वरूप धारण किए हुए है। अब भले ही सेना का रवैया बदल गया हो, लेकिन जिस देश की सरकार और सेना ही देशवासियों के बीच अंतर करती हो भला उस देश में अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक कैसे सुखी रह सकता है? पाकिस्तान इस्लाम के नाम पर बन तो गया, लेकिन इस्लाम के सभी अनुयायियों के साथ एक जैसा न्याय नहीं कर सकता है। बुशरा एजाज नामक महिला पत्रकार लिखती हैं कि योहानाबाद जैसी घटनाएं बार-बार इसलिए घटती हैं कि उसमें कहीं एक राष्ट्र और एक कौम का सूत्र नहीं दिखाई पड़ता है। सच तो यह है कि अन्याय एक मजबूर इंसान को मजलूम से जालिम बना देता है। पाकिस्तान अलग देश बनने के बाद से अलग-अलग राज्य, फिर्के और भाषाओं में बंटा है।
पाकिस्तान का एक राष्ट्रीय स्वरूप तो आज तक विकसित ही नहीं हुआ है। हर बार की तरह इस समय भी पश्चिमी राष्ट्रों की सरकार अपने ईसाई पंथ के लिए नाराजगी व्यक्त कर चुकी हैं, लेकिन दुनिया के किसी देश में न तो खोजों,बोहरों और कादियानियों की सरकारें हैं। इसलिए वे हर बार मरते भी हैं और जब मजबूर होकर मारने लगते हैं तो सरकार और पुलिस के अभिशाप के शिकार भी होते हैं।
पाकिस्तान में मुल्ला कहते हैं कि यह तो खुदाई देश है तब अनेक बार मजबूर होकर बार-बार दंगों में पिटने वाले लोग कहते हैं कि यदि तुम्हारा खुदा केवल किसी एक वर्ग, समाज और विचारधारा का खुदा है तो इससे बेहतर यही होगा कि इंसान अपना विश्वास उस खुदा से उठा ले ताकि वह मरे तब भी वीर और बलिदानी की मौत से आलिंगन करें। सच्चा मुसलमान तो ऐसे पापियों की सरकार को शैतान की सरकार से ही संबोधित करेगा।











