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मुद्दा – सोशलिस्ट और सेकुलर

Written byArchiveArchive
Feb 9, 2015, 12:00 am IST
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दिंनाक: 09 Feb 2015 12:57:51

केद्र की भाजपा सरकार ने गणतंत्र दिवस के अवसर पर जो एक विज्ञापन प्रकाशित किया था, वह संविधान की प्रस्तावना का था। उस विज्ञापन में, प्रस्तावना में बाद में अन्तर्भूत किये गये 'सोशलिस्ट' और 'सेकुलर' ये दो शब्द नहीं थे। इस बात को लेकर कुछ लोगों ने बिना कारण हंगामा खड़ा किया। हंगामा खड़ा करनेवाले भी जानते हैं कि जब संविधान पारित हुआ और 26 जनवरी 1950 से उसपर अमल शुरू हुआ तब ये दोनों शब्द प्रस्तावना में नहीं थे। 1976 के आपातकाल की असाधारण परिस्थिति में, जब कि श्रीमती इंदिरा गांधी की कांग्रेसी सरकार ने, सारे देश को एक जेल के रूप में खड़ा किया था, एक संशोधन कर इन दो शब्दों को संविधान की प्रस्तावना में समाविष्ट किया गया। यदि भाजपा की सरकार ने प्रारम्भ से चली आयी प्रस्तावना को विज्ञापन में प्रकाशित किया है तो यह कोई अपराध हुआ ऐसा मानने का कारण नहीं।
डॉ़ अंबेडकर का वक्तव्य
यह बात भी ध्यान में रखनी चाहिये कि जब संविधान तैयार हो रहा था, तब संविधान सभा के एक सदस्य- प्रो. के़ टी़ साहा ने- एक संशोधन के द्वारा संविधान की प्रस्तावना में 'सेकुलर, फेडरल, सोशॅलिस्ट' इन शब्दों को शामिल करने का संशोधन प्रस्तुत किया था। उस पर चर्चा होने के बाद संविधान सभा ने प्रो़ साहा का संशोधन नामंजूर किया। संविधान के निर्माता डॉ. बाबासाहब अंबेडकर ने उस समय, विशेषत: सोशलिस्ट शब्द का विरोध करते हुये जो तर्क दिया, उसे हम सबको आज भी ध्यान में लेना चाहिये। 'सोशलिस्ट' एक विशिष्ट प्रकार की आर्थिक व्यवस्था का परिचायक शब्द है। उस का अर्थ है उत्पादन के तथा वितरण के सभी साधनों पर सरकार का नियंत्रण। डॉ़ अंबेडकर ने कहा था-
“It is perfectly possible today, for the majority people to hold that the socialist organisation of society is better than the capitalist organisation of society. But it would be perfectly possible for thinking people to devise some other form of social organisation which might be better than the socialist organisation of today or of tomorrow. I do not see, therefore why the Constitution should tie down the people to live in a particular form and not leave it to the people themselves to decide it for themselves. This is one reason why the amendment should be opposed.”
Then Ambedkar remarked, “The second reason is that the amendment is purely superfluous.”
कालविसंगत
जब 'सोशलिज्म' का बोलबाला था उस समय डॉ़ अंबेडकर जी ने यह तर्क दिया था। 1976 में भी सोशलिज्म और सोशलिस्ट ये शब्द फैशनेबल थे, किन्तु आज क्या स्थिति है? सोशलिस्ट व्यवस्था के पुरोधा रूस ने भी उस व्यवस्था को समाप्त किया है। उस देश का यूनाइटेड सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक (युएसएसआर) यह नाम तक छोड़ दिया है। अपने देश में भी 1991 से, जब पी़ वी़ नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने और डॉ. मनमोहन सिंह उनके अर्थमंत्री थे, तब से सोशलिस्ट पैटर्न को समाप्त करने की आर्थिक नीति अपनायी गयी। आज तो कोई सोशलिस्ट अर्थव्यवस्था का नाम तक नहीं ले रहा है। इस लिये संविधान की प्रस्तावना में वह शब्द निरर्थक हो गया है। यदि संसद को प्रस्तावना में भी परिवर्तन करने का अधिकार है, ऐसा माना जाये, तो उससे तुरन्त उसे निकालने की पहल करनी चाहिये।
कुछ चिन्तकों का यह मत है कि संविधान की प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है। प्रस्तावना संविधान की आधारभूमि है। राजकीय व्यवस्था का मौलिक तत्वज्ञान है। संविधान की धारा 368 के द्वारा संसद को संविधान में परिवर्तन करने का जो अधिकार प्राप्त है, वह संविधान के प्रावधानों तक ही सीमित है। संविधान के आधारभूत दर्शन को वह नहीं बदल सकती जैसे 'जनतंत्रात्मक गणराज्य' की व्यवस्था को संसद संशोधन द्वारा नहीं बदल सकती। श्रीमती इंदिरा गांधी ने आपातकाल की विशेष परिस्थिति का लाभ उठाकर यह परिवर्तन किया है। आज उसे मानने का कोई कारण नहीं है। सारांश यह है कि संसद को, संविधान की प्रस्तावना में भी परिवर्तन करने का अधिकार है, यह मान्य है, तो यह 'सोशलिस्ट' शब्द हटाया जाना चाहिये क्योंकि वह अब कालविसंगत एवं निरर्थक हो गया है।
दूसरा शब्द है 'सेकुलर'। यह शब्द भी आपातकाल में जो 42वां संविधान संशोधन किया गया, उसके कारण समाविष्ट हुआ है। यह संशोधन 1976 में हुआ। यानी संविधान लागू होकर 26 वर्षों के बाद। तो क्या उन 26 वर्षों में अपना संविधान 'सेकुलर' नहीं था। क्या अपना राज्य 'थिओक्रेटिक' यानी मजहबी राज्य था? संविधान की धाराएं 14, 15, 16 और 19 पूर्णतया स्पष्ट करती हैं कि राज्य, मजहब, वंश, जाति, लिंग, इनमें से किसी भी आधार पर नागरिकों से भेदभाव नहीं करेगा। कानून सबके लिये समान रहेगा। 'सेकुलर' शब्द का समावेश करने से, ज्यादा से ज्यादा, इन मौलिक व्यवस्थाओं को शब्द रूप मिला है। कोई यह कह सकता है कि हमने संविधान में राज्य के स्वरूप की व्यवस्था जो अव्यक्त रूप में थी, वह शब्द में प्रकट की है। हमें इस अर्थ को मान्य करने में हिचकिचाहट नहीं करनी चाहिये।
धारा 30
किन्तु 'सेकुलर' शब्द को इतना महत्व देने वाले लोगों को सेकुलर राज्य की भावना और अर्थ के खिलाफ जानेवाली एक धारा का पुरजोर विरोध करना चाहिये। वह धारा है 30वीं धारा। जो अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शिक्षा संस्थाएं खोलने का तथा उनका संचालन करने का विशेष अधिकार देती है। संविधान में ऐसी कौनसी धारा है, जो अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थाएं खोलने से रोकती है। फिर इस धारा क्रमांक 30 का औचित्य क्या है? आज आवश्यकता है इस धारा को पूर्णत: हटाने की। ताकि अल्पसंख्यकों की शिक्षा संस्थाएं भी सरकारी कानून के पालन की जिम्मेदारी ग्रहण करें। वहां पर भी, उस आरक्षण का प्रावधान हो, जो अन्य शिक्षा संस्थाओं में लागू है। वहां पर भी शिक्षकों के वेतनमान आदि के सारे नियम लागू हों। धारा 30, अपने संविधान के सेकुलर चरित्र के खिलाफ है।
हिंदुद्वेष्टा
वैसे ही अपने को 'सेकुलर' माननेवालों ने तुरन्त धारा 44 को, जो बताती है कि संपूर्ण देश में समान नागरिक विधि संहिता यानी समान नागरिक कानून हो, कार्यान्वित करने हेतु आग्रहपूर्ण पहल करनी चाहिये। जब तक वे इस बारे में प्रयत्नशील नहीं होते, तब तक उनका 'सेकुलर' प्रेम दिखावे की चीज है, यही माना जायेगा। लोग यही समझेंगे कि ये 'सेकुलर' का बखान करनेवाले सारे लोग छद्मी हैं, पाखंडी हैं और हिंदुद्वेष्टा भी हैं। -मा.गो. वैद्य

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