विरासत की खोज - सरस्वती से साक्षात्कार
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विरासत की खोज – सरस्वती से साक्षात्कार

Written byArchiveArchive
Jun 28, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 28 Jun 2014 15:46:59

 

विलुप्त हो चुकी सरस्वती आज हमारे बीच मौजूद है या नहीं, इस विषय पर वर्षों तक बातें होती रही हैं। हमारे पुराणों में सरस्वती का उल्लेख मिलता है। जब तक सरस्वती को लेकर तमाम वैज्ञानिक शोध नहीं हुए थे, तब तक बहुत से कथित बुद्धिजीवी इसके अस्तित्व को ही नहीं स्वीकारते थे, लेकिन अब स्थिति एकदम साफ है केवल धार्मिक और आध्यात्मिक आस्था वाले श्रद्धालुओं ने ही नहीं बल्कि वैज्ञानिकों ने भी सरस्वती के अस्तित्व को स्वीकार किया है। यहां तक कि नासा ने भी पृथ्वी के अंदर प्रवाहमान इसके प्रवाहित हाने की पुष्टि की है। सरस्वती के प्रवाहमान होने के प्रमाण आज भी भारत के कोने-कोने में विद्यमान हैं।
उल्लेखनीय है कि गंगा, यमुना और गोदावरी आज भी प्रत्यक्ष रूप से पीढि़यों से हमारे बीच में विद्यमान हैं लेकिन सरस्वती नदी एक कालखंड विशेष से लुप्त मानी जाती है। प्रकृति की अपनी गति होती है और नदी का प्रवाह भी प्रकृति ही निर्धारित करती है। असंख्य नदियां ऐसी हैं जिन्होंने समय-समय पर अपने जलधारा के तीव्रवेग के कारण युगों- युगों से चले आ रहे निर्धारित मार्ग को बदलकर अपने लिए नया मार्ग बनाया। निश्चित रूप से सरस्वती नदी की जलधारा किसी भी स्तर पर गंगा, यमुना से कम नहीं रही होगी और इस नदी की धारा में बहुत सी नदियों ने सहायक के रूप में विशेष भूमिका भी निभाई होगी। समय के बदलाव और प्राकृतिक आपदा के कारण व नदी में अत्यधिक जलधारा का समावेश होने के कारण यह नदी धरती के अंदर समाकर फिर किसी अन्य स्रोत से दूसरी ओर परिवर्तित हो गई होगी या फिर किसी अन्य नदी में समाहित हो गई। भारतीयों की सरस्वती के प्रति अनन्य श्रद्धा आज भी दिखाई पड़ती है और इसी कारण आज भी असंख्य श्रद्धालु और पर्यटक इसके उद्गम स्थल शिवालिक पहाडि़यों के अंचल में हरियाणा के यमुनानगर जिले में स्थित बिलासपुर तहसील के काठगढ़ के जंगलों में जाते हैं। यहीं पर स्थित है सरस्वती का उद्गम स्थल। काठगढ़ में सरस्वती के उद्गम स्थल व इससे जुड़े धार्मिक व वैज्ञानिक पक्षों का उद्घाटन करने हेतु पाञ्चजन्य संवाददाता ने विस्तृत रिपोटिंग की और प्रवाहित होने वाले श्रद्धालुओं वहां जाकर देखा कि वास्तव में यहां सरस्वती बह रही है, भले ही एक लघु जलधारा के रूप में, लेकिन सरस्वती के विद्यमान होने के कई प्रसंग यहां बिखरे पड़े हैं।
आदिबद्री धाम से पहले है उद्गम स्थल
आदिबद्री धाम मंदिर से करीब एक किलोमीटर पहले सरस्वती का उद्गम स्थल है। आज भी लोग इसे तीर्थ स्थान के रूप में पूजते हैं। वैदिक और महाभारतकालीन वर्णन के अनुसार इस नदी के किनारे कुरुक्षेत्र था। जहां से होकर यह बहा करती थी। नदियों के विलुप्त होने की प्रक्रिया में सैकड़ों वर्ष लगते हैं। जब नदियां सूखती हैं या विलुप्त होती हैं तो अपने निशान छोड़ जाती हैं। जगह -जगह छोटे-छोटे जलाशय बन जाते हैं। आज भी कुरुक्षेत्र और पेहवा में इस प्रकार के छोटे-छोटे सरोवर देखने को मिलते हैं। यमुनानगर जिले में स्थित मुस्तफाबाद में आज भी सरस्वतीकुंड है, जहां सरस्वती की पूजा होती है। बहरहाल काठगढ़ के जंगलों में स्थित सरस्वती उद्गम स्थल के बाहर हरियाणा वन विभाग की तरफ से एक बोर्ड लगाया गया है। बोर्ड देखकर ही पता चलता है कि यहां पर सरस्वती उद्गम स्थल है। यहां पहाड़ी की तलहटी से बंूद-बूंद पानी रिसकर एक छोटे से कुंड में एकत्रित हो रहा है। कुंड के बाहर मां सरस्वती की एक टूटी हुई मूर्ति रखी हुई है। बाहर बोर्ड लगा है। जिस पर लिखा है कि 'श्री सरस्वती उद्गम स्थल-पूजा स्थल बोर्ड श्री आदिबद्री' बूंद बूंद जो पानी कुंड में इकट्ठा हो रहा है। वही सरस्वती का जल है। यहां आने जाने के लिए कोई बस या टंैपो नहीं मिलता, बेहतर है कि आप अपने वाहन से यहां पहुंचें। जैसे ही यमुनानगर की सीमा खत्म होती है- पहाड़ नजर आने लगते हैं, चढ़ाई शुरू होते ही करीब एक किलोमीटर चलकर यहां तक पहुंचा जा सकता है।
न सफाई न देखरेख
सरस्वती का पानी जिस कुंड में एकत्रित होता है उसकी स्थिति बेहद खराब थी। कुंड में सूखी हुई पत्तियां और कुछ मेंढक दिखाई दिए। हालांकि कुंड की तलहटी तक साफ दिखाई दे रहा था, लेकिन उसमें तैरते पत्तों और छोटे-छोटे कीड़ों को देखकर जल का आचमन करने का मन नहीं हुआ। उद्गम स्थल के बाहर हरियाणा वन विभाग की तरफ से लगाए गए बोर्ड पर सरस्वती नदी के अस्तित्व को लेकर जानकारी दी गई है। इसमें बताया गया है कि सरस्वती नदी हिमालय से निकलकर इस पहाड़ी क्षेत्र से पहली बार मैदानी क्षेत्र में प्रवेश करती थी।
सबसे बड़ी नदी थी सरस्वती
सरस्वती नदी कभी गंगा, सतलुज और यमुना से भी बड़ी हुआ करती थी। सतलुज और साबरमती इसकी सहायक नदियां थीं और भी कई नदियां जैसे सोम (पुरातन नाम स्वर्णभद्रा), घग्घर, बाता आदि की धारा सरस्वती की धारा में मिलकर इसके वेग को और प्रचंड बनाती थी। आदिबद्री धाम के पास स्थित नदी के वेग से कटे पहाड़ और स्वर्णभद्रा नदी की तलहटी में पाए जाने वाले गोल पत्थर और ऊपर पहाड़ी पर पाए जाने वाले गोल पत्थर बिल्कुल एक जैसे हैं। इससे पुष्ट होता है कि कभी सरस्वती यहां पर प्रचंड वेग से बहा करती थी। सर्वे ऑफ इंडिया के मानचित्रों में आदिबद्री से पिहोवा तक के रास्ते में सरस्वती के प्रवाह के मार्ग को दर्शाया गया है। कुरुक्षेत्र में इस संबंध में खुदाई भी की गई थी। जिसमें नदी के तल में पाए जाने वाले गोलपत्थर और सीपियां व अन्य कई चीजें भी मिली हैं।
सरस्वती शोध संस्थान के अध्यक्ष दर्शनलाल जैन ने बताया कि हिमालय के 'नाइटवर ' ग्लेशियर से निकलकर सरस्वती नदी हिमाचल, उत्तराखंड, आदिबद्री से मैदानी इलाके में प्रवेश करती थी। इसके बाद हरियाणा, राजस्थान और गुजरात होते हुए समुद्र में जाकर मिलती थी। उस समय राजस्थान आज की तरह सूखा प्रदेश नहीं था। वह भी भारत के अन्य हरित प्रदेशों की तरह भरपूर हरियाली से युक्त था। पानी की कोई कमी नहीं थी। कालांतर में कई भीषण भूकंप आए। इन प्राकृतिक बदलावों के चलते सरस्वती नदी धरातल में चली गई और पृथ्वी के गर्भ में छिपे पहाड़ ऊपर उठ गए। समय के साथ सरस्वती पूरी तरह विलुप्त हो गई। हालांकि विलुप्त होती सरस्वती ने भी तमाम जगहों पर अपने होने के प्रमाण छोड़ रखे हैं जो आज उपलब्ध हैं सरस्वती नदी को लेकर हुई तमाम वैज्ञानिक और भूगर्भीय खोजों से ऐसा प्रमाणित हुआ है। नासा ने सरस्वती के पृथ्वी के भुगर्भ में प्रवाहमान होने की पुष्टि की है। इसके लिए नासा ने अंतरिक्ष से लिया चित्र भी जारी किया है।
अटल सरकार के समय शुरू हुई थी खुदाई
अटल बिहारी वाजपेयी के समय राजग सरकार में केंद्रीय संस्कृति और पर्यटन मंत्री जगमोहन ने सरस्वती नदी के प्रवाह मार्ग की खुदाई और सिंधु सरस्वती सभ्यता के अनुसंधान की परियोजना की शुरुआत कराई थी। संप्रग सरकार के सत्ता में आने के बाद इस पर रोक लगा दी गई। जैसलमेर के रेगिस्तान के पश्चिम में कई जगहों पर जलोढ़ मिट्टी पाई गई है। इससे प्रमाणित होता है कि कभी वहां सरस्वती की स्वच्छ जलधारा बहती थी।
ओएनजीसी ने शुरू किया था प्रोजेक्ट
वर्ष 2004-5 में लीबिया के रेगिस्तान में तेल की तलाश करते हुए स्वच्छ पानी का स्रोत मिला था। यह जानकारी प्रकाश में आने के बाद ओएनजीसी (तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम) ने भी रेगिस्तान में स्वच्छ जल की तलाश करने हेतु एक प्रोजेक्ट शुरू किया। ओएनजीसी ने वर्ष 2006 में सरस्वती नाम से एक प्रोजेक्ट शुरू किया। इस प्रोजेक्ट के दौरान ओएनजीसी ने जैसलमेर के नजदीक पृथ्वी में 500 मीटर नीचे स्वच्छ पानी का स्रोत ढूंढ निकाला। जब इस पानी की जांच की गई और उसका मिलान आदिबद्री स्थित सरस्वती उद्गम स्थल से निकल रहे पानी से किया गया तो दोनों के एक जैसा होने की पुष्टि हुई। तमाम वैज्ञानिक खोजों से भी यह बात प्रामणित हो चुकी है कि सरस्वती आज भी पृथ्वी के भूगर्भ में अविरल रूप से बह रही हैं। इसके अलावा केंद्रीय भूमि जल आयोग ने सरस्वती नदी द्वारा छोड़े हुए प्रवाह में कई कुएं खोदे थे। ये वही क्षेत्र हैं जहां कालांतर में सरस्वती नदी के प्रवाहमान होने की पुष्टि हुई है। इन क्षेत्रों में खोदे गए एक दो कुओं को छोड़कर बाकी सभी कुओं का पानी पीने लायक मिला था। बहरहाल तमाम वैज्ञानिक खोजों और नासा द्वारा पुष्टि किए जाने के बाद इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि सरस्वती विशाल नदी थी, जिसमें अथाह जलराशि बहती थी। यदि सरकार इस दिशा में सार्थक प्रयास करे तो फिर से सरस्वती की धारा को पहले की तरह धरा पर लाया जा सकता है।
कथाओं और धर्मगं्रथों में सरस्वती
आदिबद्री धाम के महंत विनय स्वरूप ने बताया कि स्कंध महापुराण में उल्लेख है कि कलयुग की शुरुआत से कुछ पहले बड़वानल नाम के राक्षस ने पूरी सृष्टि में प्रलय मचा दी। तब सभी देवताओं ने मिलकर ब्रह्मा जी से प्रार्थना कर मदद मांगी। उस समय सरस्वती पृथ्वी पर बहा करती थी। ब्रह्मा जी ने देवताओं को सरस्वती की शरण में जाने का निर्देश दिया। तब कलयुग शुरू होने में कुछ ही समय शेष था। कलयुग में सरस्वती को पृथ्वी पर नहीं बहना है ऐसा पहले से तय था। देवताओं की प्रार्थना पर मां सरस्वती बड़वानल को अपने साथ समुद्र में बहा ले गईं। तब सारे देवताओं ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में भी आप पृथ्वी पर विराजमान रहेंगीं लेकिन लघु रूप में कहीं-कहीं। इसलिए सरस्वती कलयुग में लघु रूप में है। उन्होंने बताया कि कलयुग की आयु 3 लाख 28 हजार वर्ष है। अभी कलयुग के करीब 5 हजार साल से ज्यादा का समय बीत चुका है। जब कलयुग खत्म हो जाएगा तब सरस्वती दोबारा पहले की तरह धरा पर बहने लगेंगी।
ऐसी भी मान्यता है कि सरस्वती सबसे पहले राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्म सरोवर से प्रकट हुई थी। सरोवर से प्रकट होने के कारण उनका नाम सरस्वती पड़ा। ब्रह्मा जी ने लोक कल्याण के लिए सरस्वती का आह्वान किया था। उनके आह्वान करने पर वह 'सुप्रभा' नाम से प्रकट हुई। कई अवसरों पर ऋषियों ने सरस्वती का आह्वान किया। नैमिषारण्य में यज्ञ करते समय ऋषियों के आह्वान करने पर सरस्वती 'कांचनाक्षी' नाम से प्रकट हुई। हमारी पौराणिक कथाओं में अनेकों बार सरस्वती का उल्लेख मिलता है।

सरस्वती सुत
मां भारती की सेवा के व्रती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक स्व. मोरोपंत पिगंले राष्ट्रीय अस्मिता जगाने वाले विभिन्न प्रकल्पों के प्रेरक रहे। सरस्वती नदी के लुप्त पथ की खोज भी उनकी जिज्ञासा से उपजा एक ऐसा ही प्रकल्प रहा। भारतीय रेल की कम्प्यूटरीकरण टीम के प्रमुख सदस्य रहे डॉ. एस. कल्याणरमण जब श्री पिंगले के संपर्क में आए तो देश की प्रगति में योगदान की इच्छा से समय से 5 वर्ष पहले ही सेवानिवृत्ति ले ली। सरस्वती नदी एवं सिंधु लिपि पर गहन शोधकार्य करने वाले डॉ. कल्याणरमण को सरस्वती पथ खोज निकालने पर 'वाकणकर सम्मान' से विभूषित किया गया।

– काठगढ़ से लौटकर आदित्य भारद्वाज

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