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स्वच्छ और साफ आवाज में, हिंदी में यह सारी क्रियाएं बताई जाती हैं। सारे विद्यार्थी तल्लीनता से, एकचित्त होकर यह देखते हैं और सुनते
आज के युग में ई-लर्निंग ने शहर ही नहीं, बल्कि देश के ग्रामीण क्षेत्रांे में चल रहे विद्यालयों में भी मानो क्रांति ला दी है। कल तक जो बच्चे पाठ्यपुस्तकों पर ग्रहण या अन्य गूढ़ विषयों को चित्रों के माध्यम से चाहकर भी नहीं समझ पाते थे, आज वे ही बच्चे स्क्रीन पर ग्रहण को
लाइव देखकर उसे किसी चमत्कार से कम नहीं मान रहे हैं।
उदाहरण के लिए मध्य प्रदेश के एक जिले की दसवीं कक्षा तक चलने वाले सरस्वती शिशु मंदिर में चौथी कक्षा के बच्चों को जब मास्टर जी चन्द्र ग्रहण और सूर्य ग्रहण का पाठ पढ़ाते हैं तो उनके पूरे प्रयत्न के बाद भी यह ह्यग्रहणह्ण की संकल्पना बच्चों के समझ में नहीं आती है। बच्चों के मन में सूर्य-पृथ्वी-चन्द्र कैसे घूमते-घूमते एक-दूसरे को ढक लेते हैं और फिर कैसे अंधेरा छा जाता है? यह सब बाल मस्तिष्क की बड़ी उलझन बन जाती है। बच्चे ठीक से समझ ही नहीं पा रहे हैं कि ग्रहण कैसे होता है। इस उलझन को दूर करने के लिए मास्टर जी उन्हें साथ वाली ह्यस्मार्ट क्लासह्ण में लेकर जाते हैं। ऊपर छत में टंगे ओवरहेड प्रोजेक्टर से सामने वाला बड़ा परदा प्रकाशमान हो गया है। मास्टर जी साथ में रखे हुए कम्प्यूटर में कुछ करते हैं और उस बड़े परदे में चौथी कक्षा का ह्यचन्द्र ग्रहण-सूर्य ग्रहणह्ण का पाठ शुरू होता है। एनीमेशन की सहायता से सूर्य-पृथ्वी-चन्द्र को एक दूसरे को चक्कर लगाते हुए तारामंडल में दिखाया जाता है। स्वच्छ और साफ आवाज में, हिंदी में यह सारी क्रियाएं बताई जाती हैं। सारे विद्यार्थी तल्लीनता से, एकचित्त होकर यह देखते हैं और सुनते हैं। भूगोल का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पाठ, बड़ी सरलता से उन नन्हें मस्तिष्कों में प्रवेश कर जाता है। बच्चों को सारी संकल्पनाएं देखते ही देखते स्पष्ट हो जाती हैं। यह है आधुनिक भारत की ह्यई-कक्षाह्ण या ह्यई-क्लास रूमह्ण। इलेक्ट्रॉनिक्स का उपयोग कर, ऑडियो-वीडियो के माध्यम से दी जाने वाली शिक्षा अब आम हो चली है। अनेक विद्यालयों ने इस प्रणाली को अपनाया है। अनेक शालाओं के बाहर ह्यस्मार्ट क्लासेजह्ण के बोर्ड लगे हुए हैं। वर्तमान और भविष्य की शिक्षा ऐसी ही रहने वाली है। तकनीक के नवीनतम साधनों से यह शिक्षा दी जाएगी। अभी सरकारी शालाओं में ई-क्लास रूम की सुविधा नहीं है, लेकिन जल्द ही कुछ चुनिन्दा कक्षाओं में शासन को ई-लर्निंग की इस संकल्पना को लाना पड़ेगा।
एलएमएस यानी ह्यलर्निंग मैनेजमेंट सिस्टमह्ण यह ई-लर्निंग का ही दूसरा नाम है। आईटी और आईसीटी तकनीक का प्रयोग कर के शिक्षा देना, पाठ पढ़ना एलएमएस के अंतर्गत आता है। ई-लर्निंग का यह झंझावात यहीं तक नहीं रुका है। यह एक बहुत बड़ा बाजार बन गया है। देश के अधिकांश प्रमुख उद्योग-घराने इस व्यवसाय में कूद पड़े हैं। टाटा समूह ने ह्यक्लास-एजह्ण नाम से इंटरैक्टिव लर्निंग का सम्पूर्ण प्लेटफॉर्म बनाया है। यह डिजिटल क्लास रूम के साथ प्रबंधन के लिए ईआरपी पैकेज मुहैया कराता है। विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रम निर्माण करने के लिए ह्यटाटा इंटरैक्टिव सिस्टम्सह्ण इस कंपनी द्वारा काम किया जाता है। बिरला श्लोका, एनआईआईटी, नेट विद्या, एज्युकोम्प, आइप्रोफ आदि कंपनियों ने अनेक विद्यालयों में स्मार्ट क्लासेज स्थापित की हैं।
इन स्मार्ट क्लासेज की कल्पना बड़ी सरल है। कक्षाओं में पाठ्यक्रम को इन सभी ने डिजिटल स्वरूप में बदला है। इस स्वरुप में पाठ्यक्रम को लाते हुए उसमे एनीमेशन्स, वीडियो, ऑडियो, गीत, संगीत आदि सभी विधाओं का उपयोग किया गया है। कक्षा में पाठ्यक्रम अब नीरस नहीं रहा, वह जीवंत हो उठा है। ह्यखूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी़.़..ह्ण इस गीत में लय, ताल और सुर के साथ बच्चे झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का चित्र देखते हैं। उन्हें घोड़े पर दौड़ता देखते हैं, अंग्रेजों के विरोध में उनका निश्चय और शौर्य देखते हैं। यह सब तेजी से विकसित हो रहे नन्हें मस्तिष्क पर अंकित हो रहा है। संकल्पनाएं स्पष्ट हो रही हंै। जीवशास्त्र में ह्यफोटो सिंथेसिसह्ण पढ़ते हुए उन्हें पौधे, फूल, उनके द्वारा लिया गया सूर्य का प्रकाश, उसका परिवर्तन, यह सब प्रत्यक्ष रूप से दिख रहा है। रसायन शास्त्र के प्रयोग दिख रहे हैं तो ज्यामिति के त्रिकोण, चौंकाने वाले प्रमेय जीवित होकर सामने आ रहे हैं। इसमें कंटेंट को डिजिटाइज करना यह सबसे बड़ी चुनौती है। जिस कंपनी का ह्यडिजिटाइज्ड कंटेंटह्ण अच्छा है, उस कंपनी की स्मार्ट क्लास ज्यादा सरलता से बिकती है।
अनेक भारतीय कंपनियां ई-लर्निंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं क्योंकि इसमें ज्यादा लोगों की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए अनेक नयी-नयी कंपनियां इस क्षेत्र में आ रही हैं। ये कंपनियां कंटेंट डेवलपमेंट का काम किसी दूसरी कंपनी को आउटसोर्स कर रही हैं। ई-लर्निंग का भारत की कंपनियों द्वारा होने वाला व्यवसाय लगभग 600 मिलियन अमरीकी डॉलर्स का है। उससे भारत में होने वाला व्यवसाय लगभग 60 से 65 मिलियन अमरीकी डॉलर्स का है, जो 10 प्रतिशत होता है।
अब स्मार्ट क्लासेज की कल्पना मात्र लैब या विद्यालयों तक सीमित नहीं रह गई है। विद्यार्थियों के लिए व्यक्तिगत डिजिटल कोर्सेज उपलब्ध हैं। टेबलेट और लैपटॉप के लिए इनके अलग-अलग, किन्तु विशेष पैकेज हैं। आइप्रोफ (आई-प्रोफेसर) नाम की कंपनी ने टेबलेट पर सीबीएसई की बारहवीं कक्षा तक का सम्पूर्ण पाठ्यक्रम उपलब्ध कराया है। आईआईटी की प्रवेश परीक्षा का भी पूरा पाठ्यक्रम उपलब्ध है। सीबीएसई के साथ ही राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग के लिए भी पाठ्यक्रम हैं। अंग्रेजी के साथ अनेक भारतीय भाषाओं में भी यह कंटेंट उपलब्ध है।
ई-लर्निंग में मिल रही सफलता देखकर इस विषय को समर्पित अनेक सशुल्क वेबसाइट्स भी बाजार में आयी हैं। इन वेबसाइट पर छात्र अपना पाठ्यक्रम चुन सकते हैं। पाठ्यक्रम चुनने के बाद इंटरनेट द्वारा आवश्यक पैसे भरने पड़ते हैं। पैसे भरने के बाद छात्र-छात्रा को एक पासवर्ड मिलता है, जिसके माध्यम से पूरे सालभर वह उस विषय की सामग्री ले सकते हैं, डाउनलोड कर सकते हैं, प्रश्नपत्र लेकर ह्यमॉक एग्जामह्ण दे सकते हैं। इस तरह की अनेक सुविधाएं उपलब्ध रहती हैं।
जहां ऊंची कक्षाओं के लिए या प्रतियोगी परीक्षाओं के विद्यार्थियों के लिए ह्यडिजिटल क्लास रूमह्ण का प्रचलन देश में बढ़ रहा है। विशेषत: जो बच्चे आईआईटी, पीएमटी या जेईई की तैयारी करने कोटा जैसे शहरों में नहीं जा सकते, उनके लिए पहले और दूसरे स्तर के अनेक शहरों में डिजिटल क्लास रूम चलते हैं। इनमें उस विषय के प्रख्यात और नामांकित अध्यापक, उन्हीं के स्थान से क्लास लेते हैं। यह क्लास 20 से 25 शहरों के छात्र-छात्राएं अपने-अपने शहर के डिजिटल क्लास रूम में बैठकर एक साथ सुनते और देखते हैं। ज्यादा बैंडविड्थ वाले इंटरनेट के माध्यम या फिर व्हीसेट की मदद से ये सभी डिजिटल क्लासेज जुड़ी होती हैं। प्रत्येक क्लास रूम में एक बड़ा परदा लगाया जाता है। उस पर उस अध्यापक की प्रतिमा स्पष्ट रूप से दिखती है और आवाज साफ होती है। प्रत्येक क्लास रूम में जूम होने वाले डोम कैमरे लगे हुए होते हैं, जिनके माध्यम से वह अध्यापक अपने से दूर बैठे हुए छात्रों को देख और उन्हें सुन भी सकते हैं। छात्र-छात्राएं भी अपने ह्यडिजिटलह्ण अध्यापक से प्रश्न पूछ सकते हैं। विशेषत: छोटे शहरों और गांवों में, जहां अच्छे शिक्षकों की कमी खलती है, वहां पर यह व्यवस्था विद्यार्थियों के लिए वरदान है। कोई विषय व्यक्तिगत रूप से सीखने के लिए, उस विषय का स्वाध्याय करने के लिए भी अनेक डिजिटल विषय उपलब्ध हैं। कम्प्यूटर की कोई भी तकनीक, कोई भी भाषा, कोई भी डाटाबेस सीखने के लिए अनेक कोर्सेज और ट्यूटोरिअल्स नेट पर मौजूद हैं।
ई-लर्निंग का यह बाजार भारत में भी तेजी से बढ़ रहा है। न्यूनतम 20 से 25 प्रतिशत की गति से इसकी बढ़ोतरी जारी है। इस ई-लर्निंग के कारण अगले पांच से सात वर्षों में अपने देश में शिक्षा के स्वरूप में बड़े बदलाव होने निश्चित हं।
-प्रशांत पोल











