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हैदराबाद में फिर वैसी ही घटनाएं होने लगी हैं, जिनसे सभ्य समाज शर्मसार हो रहा है। कभी हैदराबाद में अरब के बूढ़े शेख नन्ही-मुन्नी बच्चियों के साथ विवाह का ढोंग करके अपनी काम-वासना पूरी किया करते थे। इन दिनों हैदराबाद में अरब के शेख तो लगभग गायब हो गए हैं, लेकिन उनके स्थान पर अफ्रीका के काले हब्शी दिखाई देने लगे हैं। इनका भी वही काम है, जो कल तक अरब के शेखों का था। यानी अपनी सेक्स की भूख मिटाना और फिर तलाक-तलाक कह कर उनके जीवन को जहन्नुम में झोंक देना। परिवर्तन के इस दौर में भी हैदराबाद की उन गलियों में कोई परिवर्तन नहीं आया है जहां मुस्लिम आबादी है। आज भी इन मोहल्लों में दलालों की चहल-पहल रहती है, जो कामुक 'भेड़ियों' के लिये छोटी उम्र की दुल्हनें ढूंढते रहते हैं। अरबों की तरह अफ्रीका के नीग्रो और हब्शियों ने भी खूब पैसा कमा लिया है। इसलिए वे हैदराबाद पर मंडराने लगे हैं। एक महीने में 15 से बीस दुल्हनें उन्हें चाहिए। इसलिए दलालों के बिना उनकी यह हवस कैसे पूरी हो सकती है? इन ग्राहकों को दुल्हनें चाहिए, लेकिन केवल एक माह के लिए। सेक्स का भूत उतरते ही वे विमान पकड़ते हैं और अपने देश चले जाते हैं। जाते-जाते वही तलाक, तलाक और तलाक का शब्द सुनाई पड़ता है। दुल्हन की जो रकम होती है वह अदा कर दी जाती है। दलाल तो अपनी रकम उसी समय वसूल कर लेता जब कोई लड़की शैतान को देता है।
44 वर्षीय सूडानी इंजीनियर, जो न केवल विवाहित था, बल्कि दो बच्चों का बाप भी था। लेकिन जब उस पर कामुकता का भूत सवार हुआ तो हैदराबाद की ओर भागा, क्योंकि वहां अल्प समय के लिये अल्पायु की मासूम लड़कियां मिल जाती हैं। लड़कियों से निकाह करके न केवल मजहब, बल्कि कानून के शिकंजे से भी ये शैतान बच जाते हैं। लगभग पांच दलालों ने उसको दर्जनों लड़कियां दिखाईं। अंतत: उस कामुक भेड़िये को एक लड़की पसंद आ गई। उसे शानू कहते हैं, जो उसका बदला हुआ नाम है। आयु लगभग 17 वर्ष की होगी। दलाल सोच रहे थे कि एक दिन शानू की कहानी भी आज तक जो असंख्य अल्पायु की बालाओं की रही है, वह बन कर रह जाएगी। आज तो मामला सुलट ही गया। फिर कोई नया ग्राहक मिलेगा और अपना धंधा चलता रहेगा। हमें इससे क्या मतलब कि लड़की को फंसाने वाला अरबी, सूडानी या फिर नाइजीरियाई है। अपना मतलब तो मिलने वाले रुपयों से है।
लेकिन शानू किसी और मिट्टी की निकली। सात दिन बाद उस सूडानी के शिकंजे से भाग निकली और पुलिस स्टेशन पहुंच गई। पुलिस वालों से न्याय मिले, यह बहुत कठिन काम है। लेकिन शानू के सितारे बुलंद थे। उसने सोच लिया था इस सूडानी भेड़िये को और हैदराबादी दलाल को ऐसा सबक सिखाऊंगी कि उनकी बुद्धि ठिकाने आ जाएगी। शानू को एक भला पुलिस वाला मिल गया। उसने उस सूडानी और उसके दलाल के विरुद्ध रपट दर्ज कर ली। पुलिस ने अपना जाल फैलाया। इसके पश्चात् 5 मार्च को उसके दलाल इब्राहीम, उसके पिता यूसुफ अली, उसकी चाची मुमताज और निकाह पढ़ने वाले काजी मोहम्मद नसरुद्दीन और बिचौलिया ताहेरा बेगम को गिरफ्तार कर लिया गया। शानू को सरकारी 'गर्ल्स होम' में भिजवा दिया गया।
जांच-पड़ताल के लिये थाना अधिकारी ने इन्स्पेक्टर विजय कुमार को तैनात कर दिया। शानू का भाग्य अच्छा था कि विजय कुमार के शरीर में एक हिन्दुस्थानी बाप का दिल धड़क रहा था। विजय कुमार को आश्चर्य हुआ कि निकाह ऐसे काजी ने पढ़े थे, जो सरकार की ओर से मनोनीत किया गया था। सवाल उठता है उक्त काजी उस दलाल और हब्शी की वासना का संरक्षक था या फिर इस मासूम शानू का? काजी ने बड़े भोलेपन से उत्तर दिया कि मुझे मालूम नहीं था कि यह 'कांट्रेक्ट मैरिज' है।
विवाह से पूर्व 17 वर्षीया शानू मुगलपूरा के तलब कट्टा में रहती थी। उसके आठ भाई-बहन हैं। उसके पिता यूसुफ और माता आइशा मजदूरी करके किसी प्रकार अपने परिवार का पेट पालते हैं। शानू के घर में उसके दो और चाचा एवं चाचियां भी साथ में रहते हैं। उनके कितने बच्चे हैं, इसकी गिनती करना कठिन काम है। दसवीं कक्षा तक पढ़ी शानू को उसके पिता ने बताया कि वे उसका विवाह एक अमीर आदमी से कर देना चाहते हैं। जो इंजीनियर है और उन्हें दो लाख रुपये भी दे रहा है। शानू ने बयान दिया है, 'उसके विवाह की खबर किसी को कानों कान नहीं लगने दी। यह भी नहीं बताया कि उसका होने वाला पति 44 वर्ष का है। यह भी नहीं बताया कि वह पहले से विवाहित भी है। 21 जनवरी को हमारे घर निकाह हुआ। मुझे भारी आश्चर्य तो यह हुआ कि निकाह करने की मेरी इच्छा है या नहीं यह भी किसी ने नहीं पूछा। मैंने इस्लामी तरीके से ज्यों ही 'कबूल' कहा कि मेरा निकाह पढ़ दिया गया। विवाह के बाद जब मैंने उस बूढ़े खूसट सूडानी को देखा तो मैं फूट-फूट कर रोने लगी। विवाह के बाद यह सूडानी प्रतिदिन मेरे घर आता था, लेकिन मैं कोई न कोई बहाना बनाकर उससे दूर हो जाती थी। मेरा यह प्रयास रहता कि यह अकेले में मुझसे कभी नहीं मिले। इसमें मेरी सहायता मेरी सहेलियों ने की। उन्होंने मुझे वहां से भाग खड़े होने का अवसर जुटा दिया और पुलिस को भी फोन कर दिया। मैं पुलिस स्टेशन गई, जहां मैंने अपने घर वाले तथा उस सूडानी के विरुद्ध सब कुछ बता दिया। जाहिरा नामक एक महिला ने मेरे माता-पिता को इस सूडानी से मिलवाया था। यह महिला दलाल है, जो इस प्रकार के विवाह करवाती है।'
पुलिस ने इस घटना के बाद जब छापा मारा तो दलाल पकड़ी गई। वह बरकास, मुगलपूरा और चारमीनार इलाके की जानी-मानी दलाल है। जो हैदराबादी लड़कियों के विवाह विदेशियों से कराने का काम करती है। शानू की चाची बेगम ताहेरा उसी दलाल के जरिए इब्राहीम से मिली थी। इब्राहीम को शानू की चाची ने कई लड़कियां दिखाईं लेकिन इब्राहीम को शानू ही पसंद आई। शानू उसे इतनी पसंद आई कि उसने उसकी चाची को एक घंटे के भीतर ही एक लाख रुपए दे दिये। इब्राहीम पहला व्यक्ति नहीं है, जो अपनी सेक्स-पिपासा को शांत करने के लिए हैदराबाद आया हो। इसी प्रकार शानू भी पहली लड़की नहीं है, जिसे फंसाया गया हो। अब तो यह हर दिन की बात हो गई है। नाइजीरिया और सूडान में खनिज तेल निकलता है जिससे वहां के कुछ लोग अपार धन कमा रहे हैं। वे अपनी वासना बुझाने के लिए हैदराबाद का रूख करते हैं। जो दलाल कल तक तंगी में थे आज उनके मुंह पर पानी लौट आया है। अफ्रीकी लड़के भारत के कई विश्वविद्यालयों में पढ़ते हैं। वे भी जाते समय हैदराबाद की इन मासूम लड़कियों को अपनी दुल्हन बना कर ले जाते हैं और कुछ जाते-जाते तलाक भी देते हैं। ऐसी भी जानकारी मिली है कि वे अपने देश में जाकर इन्हें बेच देते हैं। अफ्रीकी विद्यार्थी इन लड़कियों के माध्यम से यहां रहने योग्य स्थान भी खोज लेते हैं। महिला कल्याण के लिए संस्था चलाने वाली शीराज अमीना खान कहती हैं कि हैदराबाद में इतनी गरीबी है कि मुस्लिम घरों में पैदा होने वाली सात-आठ लड़कियों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। मां-बाप के सिर पर वे भार बन जाती हैं, जिन्हें इस प्रकार वे अंधकार के गर्त में धकेल देते हैं। वक्फ बोर्ड का कहना है कि एक बार फिर हैदराबाद की लड़कियां भेड़ियों के जाल में फंस रही हैं। जब तक सरकार इस धंधे में लगे लोगों पर शिकंजा नहीं कसेगी तब तक मासूम लड़कियां यूं ही शिकार बनती रहेंगी। मुजफ्फर हुसैन










