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परम्परा का परित्याग न करें
एक जमाना था जब समाज नारी शिक्षा का विरोधी था। उस जमाने में बाल-विवाह की प्रथा थी, परन्तु अब हर जाति, हर गांव में जागृति आने से लड़कियां पढ़-लिखकर पुरुषों के साथ-साथ जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। वह नौकरी कर रही हैं, देश, प्रशासन, उद्यम, राजनीति और सभी क्षेत्रों में उनका दबदबा बढ़ा है। समाज पर पश्चिमी सभ्यता का असर भी पड़ा है। स्वाभाविक रूप से इसकी चपेट में पुरुषों की तरह महिलाएं भी आ गई हैं। इस कारण कुछ महिलाएं नारी जाति की छवि के अनुरूप कार्य नहीं कर रही हैं। ऐसी महिलाओं में न सेवा दिखती है, न समर्पण। हर कोई पैसों के पीछे भाग रहा है, जिससे घरों में समृद्धि तो आई है परन्तु खुशियां दूर चली गई हैं। घरों में वृद्ध दादा-दादी, नाना-नानी की पूछ-परख कम होती जा रही है, जिससे वृद्धों की संख्या बढ़ रही है। यह भी देखा जाने लगा है कि आज की नारी अपने पति और बच्चों (दो) में ही मगन रहने लगी है। इस कारण संयुक्त परिवार भी टूट रहे हैं। इसका सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ता है।
-सरोज ओक
270, रिजेन्सी गोल्ड, श्रीनगर एक्सटेंशन, इंदौर-452018 (म.प्र.)
चंदरेह का शिव मन्दिर और मठ
अलौकिक कलाकृतियों का दर्शन
* उदय कमल मिश्र
विंध्य भू-भाग सदा से ही ऋषियों-मुनियों की तपस्थली रही है। विंध्य भू-भाग में ही स्थित सीधी जिला, जहां पर विश्वविख्यात ग्रंथ “कादम्बरी” के रचनाकार वाणभट्ट की जनमस्थली प्रीतिकूट है, जो वर्तमान में चन्दरेह भंवरसेन के नाम से जानी जाती है।
सीधी जिला मुख्यालय से 50 कि.मी. दूरी पर चन्दरेह है। यहां पर अनुमानत: सम्वत् 324 में निर्मित शिवालय एवं मठ अद्भुत कलाकृतियों से युक्त होते हुए भी आज पूरी तरह सुरक्षित हैं और आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं। इतना ही नहीं चन्दरेह के शिवालय के पास भंवरसेन, जो सोन-बनास एवं अदृश्य सरस्वती नदियों का अद्भुत संगम स्थल है, की प्राकृतिक छटा निराली है।
निर्माण
चन्दरेह स्थित मठ के शिलालेख में वर्णित है कि इस विशाल शिवालय एवं मठ का निर्माण सम्वत् 324 में प्रशान्त शिव के द्वारा कराया गया था। विद्वानों के मतानुसार प्रशान्त शिव आजन्म अन्नत्यागी थे। उन्होंने सोन तट में अर्थात् चन्दरेह में प्रशान्ताश्रम बनवाया, प्रसिद्ध शिव मंदिर बनवाया साथ ही एक विचित्र कूप का भी निर्माण करवाया। कहा जाता है कि प्रशान्त शिव महान ज्ञानी, तपस्वी, सरल हृदय, महान वास्तुविद्, परोपकरी एवं प्राकृतिक ढंग से जीवन-यापन करने वाले महान संत थे।
चन्दरेह स्थित शिव मंदिर एवं मठ अपनी अलौकिक कलाकृतियों के कारण पूरी दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए श्रद्धा का केन्द्र हैं। यह अपने आप में आश्चर्यजनक है कि मंदिर एवं मठ में उपयोग किये गये विशाल कलाकृतियों से युक्त पत्थर मंदिर स्थल से 1000 कि.मी. के आसपास भी प्राप्त नहीं होते हैं। यानी विशाल मंदिर एवं मठ का निर्माण इतने दूरस्थ एवं दुर्गम स्थल में करना अपने आप में प्रशान्त शिव द्वारा लिये गये संकल्प का एक जीता-जागता उदाहरण है।
शिल्पकला
मंदिर ऊंची जगती पर निर्मित है। इस मंदिर में एक गोलाकार गर्भगृह, अन्तराल एवं मण्डप हैं। गर्भग्रह का शिखर सघन कलाकृतियों से अलंकृत है। अन्तराल मानवीय आकृतियों के अतिरिक्त गज एवं कीर्ति मुख पट्टिकाओं से अलंकृत है। शिल्पकला की विशिष्टता मध्य युगीन शिल्प अभियांत्रिकी प्रवीणता का परिचायक है। स्तम्भ और धरण में विशाल फलक (बड़ा चट्टानी पत्थर) का प्रयोग किया गया है, जो लगभग 18 सौ वर्ष से इसे विध्वंस होने से रोके रखा है।
आकर्षण
विशाल शिवालय में बरसात के पानी के निकास हेतु मगर के मुखाकृत के स्वरूप का बनाया गया प्रणाल एक अनोखी पद्धति को बताता है। इस प्रकार का प्रणाल अन्यत्र शायद ही हो। भू-विन्यास पर मंदिर शिवलिंग के योनिपीठ के समान प्रतीत होता है और त्रिवेन्द्रम (केरल) के परशुरामेश्वर मंदिर के सदृश्य है। वर्तमान में यह शिवालय एवं मठ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण भोपाल मण्डल की देखरेख में हैं।
प्राकृतिक छटा
चन्दरेह के मंदिर एवं मठ के पास आज भी केहजुआ की ऊंची पर्वत श्रृंखला है, जो प्राकृतिक सम्पन्नताओं से ओतप्रोत होकर एक रमणीय स्थल होने के कारण पर्यटकों को अपनी ओर खींचता चला आ रहा है। साथ ही अपनी प्राकृतिक सम्पन्नता के कारण मंदिर एवं मठ को पर्यावरण की दृष्टि से पूरी तरह से सुरक्षित भी किया है।
सोन, बनास व सरस्वती का संगम
चन्दरेह स्थित मंदिर एवं मठ के समीप ही भंवरसेन स्थित केहजुआ की ऊंची पर्वतमाला को तोड़कर सोन नदी प्रवाहित होती है। यह वही स्थल है जहां सोन, बनास एवं अदृश्य सरस्वती नदियों का संगम स्थल है, जो प्राकृतिक सम्पन्नता से परिपूर्ण है। उक्त स्थल दार्शनिक होने के साथ-साथ प्राकृतिक सम्पदा से परिपूर्ण होने के कारण पर्यटकों के लिए मनमोहक स्थल बन गया है। इतना ही नहीं सोन नदी के प्रवाह में नौका विहार का भी पर्यटक आनन्द लेते हैं। साथ ही सूर्योदय एवं सूर्यास्त के समय उक्त स्थल की छटा अद्भुत निराली है। जहां आज भी मधुमक्खियों के कई छत्ते लगे रहते हैं। इसी कारण उक्त स्थल का नाम भंवरसेन हुआ।
पर्यटन हेतु किया गया प्रयास
दुर्गम स्थल एवं अदूरदर्शी राजनीतिक इच्छा शक्ति के कारण चन्दरेह के शिव मंदिर एवं मठ, साथ ही भंवरसेन स्थल का जिस गति से विकास एवं प्रचार-प्रसार होना चाहिए वह नहीं हो सका। लेकिन सीधी विधानसभा क्षेत्र के विधायक पं. केदारनाथ शुक्ल के संरक्षण में सामाजिक चेतना उत्कर्ष समिति सीधी ने पर्यटन को बढ़ावा देने का प्रयास प्रारंभ किया है। इस समिति ने इस क्षेत्र में पर्यटकों की संख्या बढ़ाने के लिए अनेक तरह के कार्य शुरू किए हैं। अब भंवरसेन तक अच्छी सड़क भी बन गई है। इस कारण पर्यटकों की संख्या बढ़ती जा रही है। यदि इस मन्दिर और मठ का प्रचार-प्रसार किया जाए तो निश्चित से चन्दरेह पर्यटन स्थलों की सूची में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज करा सकता है। यहां का शिव मन्दिर बताता है कि हमारे पूर्वज मन्दिर निर्माण की कला में कितने दक्ष थे। मन्दिर में जिस तरह की कलाकृति दिखती है उससे यह भी ज्ञात होता है कि कला के मामले में भारत सदैव से अग्रणी रहा है। हर कला-प्रेमी को इस मन्दिर का दर्शन एक बार अवश्य करना चाहिए। द
विज्ञापनों के मायाजाल में फंसती नारी
*राजी सिंह
सुन्दरता रंग की मोहताज नहीं होती। इस सच्चाई के बावजूद गोरेपन की चाह और ललक प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। गोरेपन की चाहत का ही परिणाम है कि नित नई कम्पनियां गोरेपन का दावा करने वाली क्रीमें, साबुन एवं अन्य सौन्दर्य प्रसाधन लेकर बाजार में उतर रही हैं। हमारे देश में लाखों लड़कियां एवं महिलाएं (हर वर्ग और श्रेणी की) गोरेपन का दावा करने वाली क्रीम व सौन्दर्य प्रसाधनों के भ्रामक और आकर्षक विज्ञापनों के जाल में फंस रही हैं। इस तरह के आकर्षक विज्ञापनों के खतरों को सरकार ने भी भांपा है। बीते दिनों प्रधानमंत्री कार्यालय ने दिग्भ्रमित करने वाले, गोरेपन का दावा करने वाले ऐसे विज्ञापनों तथा उनके दुष्प्रभावों को गंभीरता से लिया है। इन पर नियामकीय प्रणाली तुरन्त स्थापित करने के निर्देश दिए हैं और उपभोक्ता मामलात विभाग के अधिकारियों को जल्दी ही दिशा निर्देशों का मसौदा तैयार करने को कहा गया है।
ऐसे भ्रामक विज्ञापनों की समस्या को सिर्फ स्वास्थ्य की दृष्टि से देखना काफी नहीं है। इस समस्या का एक दूसरा भी पक्ष है। सामाजिक नकारात्मक पक्ष। इस तरह के विज्ञापन त्वचा के रंग को लेकर सामाजिक भेद को गहरा करते हैं। सांवले रंग वाले लोगों में हीन भावना पैदा करते हैं। श्याम वर्ण वाली युवतियों के आत्मविश्वास से खिलवाड़ करते हैं।
हमारे देश की बहुसंख्यक आबादी का प्राकृतिक रंग सांवला है। गौर वर्ण प्रदान करने का दावा करने वाली कम्पनियों का लक्ष्य इस आबादी, विशेषकर महिलाओं एवं युवतियों को लुभा कर अपना व्यापार बढ़ाना है। इन्होंने अपनी बाजार रणनीति के तहत गोरेपन को सौन्दर्य एवं सफलता का महत्वपूर्ण पैमाना बना दिया है। जीवन साथी का चयन करना हो या रोजगार पाना हो, समाज में आकर्षण का केन्द्र बनना हो सबके लिए गोरापन जरूरी लगने लगा। इन आकर्षक विज्ञापनों के द्वारा इस सन्देश का प्रभाव दूरदराज के गांवों तक में दिखायी पड़ता है। कम्पनियां अपनी रणनीति में कितनी कामयाब रहीं, इसका अन्दाजा इस बात से लगा सकते हैं कि गोरेपन की क्रीम का बाजार दो हजार करोड़ रुपए के लगभग है। दूसरे कामकाजी महिलाओं की संख्या बढ़ी, उन्हें एक अलग पहचान मिली। उनकी इस पहचान को सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाली कम्पनियां अपने-अपने उत्पादों से और अधिक मजबूती देने का दावा पेश करती हैं। अपने कार्य में दक्षता प्राप्त कर सफल होने की सीख की जगह शरीर को सुन्दर एवं गोरा बनाने वाले प्रसाधनों का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। विज्ञापनों के जरिए ऐसा माहौल बनाया जाता है कि यदि जिन्दगी में कुछ प्राप्त करना है, सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास चाहिए, तो फलां-फलां क्रीम का उपयोग आवश्यक है।
गोरेपन का सच
यहां पर महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या त्वचा के प्राकृतिक रंग को बदला जा सकता है और गोरेपन को बढ़ाया जा सकता है जैसा कि विज्ञापनों में दावा किया जाता है। त्वचा का रंग “मेलानोसाइट” नामक विशेष कोशिकाओं के जरिए तय होता है। “त्वचा का रंग क्या होगा” यह गर्भकाल में ही तय हो जाता है। इन कोशिकाओं की रंग प्रक्रिया की गति पूरी जिन्दगी एक समान ही रहती है जिसे किसी भी तरह की क्रीम या अन्य किसी प्रसाधन से कम या ज्यादा नहीं किया जा सकता। अत: कोई भी क्रीम गोरा बनाने का कितना भी दावा क्यों न करे, वह त्वचा के प्राकृतिक रंग को नहीं बदल सकती।
फिर प्रश्न उठता है कि यदि त्वचा का प्राकृतिक रंग नहीं बदलता तो समय के साथ त्वचा की रंगत सांवली क्यों पड़ती जाती है? इसका कारण है प्राकृतिक रंग द्रव्य “मेलेनिन” का त्वचा की ऊपरी सतह द्वारा अधिक अवशोषण। मेलेनिन का निर्माण त्वचा की निचली परत में होता है और त्वचा की सतह पर की मृत कोशिकाओं द्वारा इसका अवशोषण होता रहता है। धूप की तेजी तथा धूल कणों के जमाव से भी त्वचा सांवली नजर आने लगती है। त्वचा के रंग को गोरा बनाने वाली क्रीमें असल में धूप तथा धूल कणों के असर को कम कर देती हैं तथा त्वचा को कोमल बनाकर उसकी शुष्कता कम करती हैं। इससे त्वचा की रंगत निखरी-निखरी लगती है।
इसलिए सौन्दर्य उद्योग का प्रचार जो वादा करता है वह लुभावना अवश्य होता है मगर सच नहीं। इस तरह के प्रचार का उद्देश्य ग्राहक के मन में उसकी वर्तमान जिन्दगी के प्रति असन्तुष्टि का भाव पैदा करना है। फिर उसे सुझाव दिया जाता है कि यदि वह फलां-फलां उत्पाद खरीद ले तो उसकी जिन्दगी बेहतर हो जायेगी। यह सुझाव लोगों का मन मोह लेता है और वे इनके दुष्प्रभाव के प्रति सचेत नहीं हो पाते। आईने व समाज में स्वयं को दूसरे से ज्यादा गोरा दिखाने तथा दूसरों के मन में कुंठा पैदा करने वाली होड़ के दुष्परिणामों के प्रति चेतना होगा। किसी महिला की सुन्दरता उसके गोरेपन में नहीं, बल्कि उसके दिल दिमाग में वास करती है। जिसके हृदय में गहराई हो, शिष्टाचार एवं विश्वसनीयता हो, विनोदप्रियता या बुद्धिकौशल हो, ऐसी महिला का व्यक्तित्व सांवला होने पर भी आकर्षक लगता है। जीवन में आगे बढ़ने के लिए आत्मबल और साहस चाहिए, गोरापन नहीं। स्वविवेक व आत्मविश्वास के साथ निर्णय लेना व स्वयं पर भरोसा करना ही आत्मनिर्भरता है। क्रीम लगाकर कुछ दिनों में इसे नहीं पाया जा सकता। अत: विज्ञापनों के मायाजाल में न फंसें। स्वविवेक से निर्णय लें। स्त्री का व्यक्तित्व तो बहुआयामी है उसे सिर्फ गोरेपन की सीमा में बांधना स्वयं के प्रति अन्याय करना है।द
खान-पान
अमृतसरी चने
सामग्री
- चने 200 ग्रा.
- लालमिर्च 1 चम्मच
- हल्दी आधा चम्मच
- जीरा 1 चम्मच
- सूखा धनिया पिसा 2 चम्मच
- हल्दी 1/2 चम्मच
- नमक 1/2 चम्मच
- जीरा 1 चम्मच
- तेल 3 बड़े चम्मच
- प्याज तीन
- लहसुन 5 कलियां
- अदरक 1 टुकड़ा
- हरी मिर्च चार
- टमाटर पांच
- हरा धनिया दो चम्मच
- सूखा आंवला दो-तीन टुकड़े
- देसी घी 1 बड़ा चम्मच
विधि: चने चार-पांच घंटे भिगोकर रखें। फिर उन्हें सूखा आंवला तथा एक चम्मच नमक डालकर उबाल लें। फिर एक बर्तन में तेल डालकर 2 प्याज और लहसुन को बारीक काटकर थोड़ा तल लें। उसमें सूखे मसाले मिला लें और बारीक कटा टमाटर भी डाल दें। जब मसाला घी छोड़ दे तो उसमें चने मिला कर भून लें। फिर पानी डालकर एकसार होने तक (15 मिनट) पकाएं। एक बर्तन में एक प्याज, बीज निकालकर एक टमाटर, हरी मिर्च बीच से काट कर (सभी चीजें मोटी कटी हों) थोड़ा सा देसी घी में हलका तलकर लाल मिर्च डाल दें और मिला करके परोसें। द प्रोमिला पोपली
“खान-पान” स्तंभ के लिए आप भी कुछ विशिष्ट व्यंजनों की पूरी जानकारी भेज सकते हैं। हमारा पता है-
द्वारा सम्पादक, पाञ्चजन्य, संस्कृति भवन, देशबन्धु गुप्ता मार्ग, झण्डेवाला, नई दिल्ली-55











