वामपंथी इतिहासकारों का प्रचार तंत्र
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वामपंथी इतिहासकारों का प्रचार तंत्र

Written byArchiveArchive
Dec 10, 2011, 12:00 am IST
inArchive

मंथन

दिंनाक: 10 Dec 2011 17:03:40

केरल से प्रकाशित अंग्रेजी साप्ताहिक “द वीक” (27 नवम्बर, 2011 अंक) में मल्लिका साराभाई का लेख देखा। शीर्षक था “हूज हिस्ट्री इज इट एनी वे” यानी “आखिर, यह किसका इतिहास है?”। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि एवं सामाजिक कार्यकत्र्ता के नाते भारत सरकार द्वारा पद्म विभूषण अलंकार से विभूषित मल्लिका को नृत्यांगना के रूप में तो जाना था, पर इतिहासकार के नाते नहीं। इसलिए उत्कंठा वश वह लेख पढ़ा। यह लेख ग्यारहवीं शताब्दी में पवित्र सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के ध्वंस पर केन्द्रित है। मल्लिका का निष्कर्ष है कि गजनवी इस्लामी कट्टरपंथी या जिहादी नहीं था। वह मात्र लुटेरा था, दौलत का भूखा था-चाहे वह हिन्दू की हो या मुसलमान की या काफिर की। लेकिन हिन्दू गुजराती तभी से मुसलमानों से इस बड़े अपमान का बदला लेते आ रहे हैं। मल्लिका जी उपदेश देती हैं कि 1026 ईस्वी में प्रभास पाटन में किसी मंदिर के ध्वंस के आधार पर आज मुसलमानों की हत्या को जायज क्यों ठहराया जाय? मल्लिका का इशारा 2002 के गुजरात दंगों की ओर है, क्योंकि तभी से गुजराती हिन्दुओं और विशेषकर वहां के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध जिन पांच-छह लोगों की मंडली-तीस्ता सीतलवाड़, शबनम हाशमी, कैथोलिक पादरी सेड्रिक प्रकाश, एडवोकेट मुकुल सिन्हा आदि ने जिहाद छेड़ रखा है, उनमें मल्लिका भी अग्रणी हैं। पर 2002 का गुजरात दंगा 1026 के सोमनाथ ध्वंस का बदला था या 27 फरवरी, 2002 को गोधरा स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेस में अयोध्या से लौट रहे 59 कारसेवकों के नरमेध की स्वत:स्फूर्त प्रतिक्रिया? मल्लिका के लेख में इसका कोई जिक्र नहीं है। वे प्रश्न उठाती हैं कि सोमनाथ ध्वंस की घटना को किसने- कब हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष का रंग दिया कि सरदार पटेल भी उसके बहकावे में आ गये?

ये कैसा इतिहास?

अपने इतिहास ज्ञान का परिचय देते हुए मल्लिका अपने ही प्रश्न के उत्तर में वामपंथी इतिहासकार रोमिला थापर की पुस्तक का सहारा लेकर लिखती हैं कि अंग्रेजों ने अपनी “फूट डालो- राज करो” नीति के अन्तर्गत सोमनाथ मंदिर की लूट को हिन्दू धर्म पर मुस्लिम आक्रमण का रंग दे दिया और फिर इस पुस्तक से एक लम्बा उद्धरण देकर बताती हैं कि सोमनाथ मंदिर पर महमूद के हमले का हिन्दू पराजय के रूप में पहला उल्लेख सन् 1843 में लंदन स्थित ब्रिटिश हाउस आफ कामन्स में हुआ था। तत्कालीन बोर्ड आफ कंट्रोल के अध्यक्ष लार्ड एलनबरा ने अफगानिस्तान में ब्रिटिश सेनाओं की भारी पराजय का बदला लेने के लिए जनरल नॉट को गजनी में महमूद के मकबरे में लगे फाटकों, जो एलनबरा के अनुसार- सोमनाथ मंदिर से लूटकर ले जाए गये थे, वापस लाकर भारत के हिन्दुओं को उनके 800 साल पुराने अपमान का बदला लेने के प्रतीक चिन्ह के रूप में वापस किया। रोमिला थापर के अनुसार, एलनबरा ने ही पहली बार हिन्दुओं को उस अपमान का, जिसे वे पूरी तरह भूल चुके थे, स्मरण दिलाया और तभी से हिन्दू सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण को अपनी राष्ट्रीय पराजय के रूप में दोहराते चले आ रहे हैं।

रोमिला थापर के शोध की परीक्षा करने के पूर्व यह जानना उचित होगा कि सन् 2004 में प्रकाशित उनकी पुस्तक का ज्ञान मल्लिका को सन् 2011 की नवम्बर में कहां से हुआ? मल्लिका स्वयं ही इसका उत्तर दे देती हैं कि रोमिला थापर की पुस्तक के बारे में अखिलेश मित्तल का ई- मेल आने तक मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी। अखिलेश मित्तल ने केवल ई-मेल ही नहीं भेजा तो किसी रेस्तरां में मुझे एक मित्र के साथ बैठे पाकर मुझसे प्रत्यक्ष भेंट की और आग्रह किया कि मैं सोमनाथ पर अवश्य लिखूं और सोमनाथ विषयक झूठ को नंगा करूं। अब ये अखिलेख मित्तल कौन हैं? उनके इतिहास ज्ञान का साप्ताहिक रसास्वादन पहले मुझे “एशियन एज” के रविवासरीय परिशिष्ट में और जबसे एम.जे.अकबर उसके सम्पादक पट से हटे हैं तब से एम.जे.अकबर द्वारा संचालित “संडे गार्जियन” में मिलता रहा है। इस घनिष्ठता के कारण यदि अखिलेश मित्तल को एम.जे.अकबर का पसंदीदा इतिहासकार कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी। अखिलेश मित्तल के इतिहास लेखन का एकमात्र नियामक सूत्र है यह सिद्ध करना कि हिन्दू-मुस्लिम वैमनस्य को पहले अंग्रेजों ने और अब हिन्दुत्ववादियों ने पैदा किया है, जबकि इतिहास ने उन्हें एकता के सूत्र में पूरी तरह से गूंथ दिया था।

उधारी के इतिहासकार

इसलिए सोमनाथ प्रश्न पर मल्लिका के इतिहास ज्ञान के स्रोत तक पहुंचने के लिए संडे गार्जियन की फाइल टटोली तो उसके 23 और 30 अक्तूबर, 2011 के अंकों में सोमनाथ पर अखिलेश मित्तल के दो लेख मिल गये। इन लेखों को पढ़ने से स्पष्ट हो गया कि सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण के बारे में अखिलेश का पूरा ज्ञान केवल रोमिला थापर की एक पुस्तक तक सीमित है। उस पुस्तक से अखिलेश इतना अभिभूत हैं कि वे चाहते हैं कि इस शोध का अधिकाधिक प्रचार किया जाना चाहिए। वे लिखते हैं कि मल्लिका साराभाई जैसे कार्यकत्र्ताओं को गुजराती और अंग्रेजी भाषाओं में पम्फलेट निकालकर गुजरातियों को बताना चाहिए कि असली अपराधी एलनबरा और ब्रिटिश शासक हैं न कि महमूद गजनवी और मुसलमान (30 नवम्बर, 2011)। और अपनी इस योजना को क्रियान्वित करने हेतु अखिलेश ने ई-मेल द्वारा अपने लेखों को मल्लिका तक पहुंचा दिया और बार-बार उन्हें इस विषय पर लिखने का आग्रह किया। अखिलेश ने रोमिला थापर की पुस्तक से जो कुछ उधार लिया था, उसे मल्लिका ने ज्यों का त्यों “द वीक” के माध्यम से परोस दिया। किस प्रकार उधार का इतिहास ज्ञान राजनीतिक प्रचार का हथियार बनाया जा सकता है, इसका यह एक उदाहरण है। अखिलेश का हिन्दू विरोधी भाव कितना प्रबल है, यह 27 नवम्बर को “संडे गार्जियन” में दिल्ली के अक्षरधाम मंदिर पर प्रकाशित लेख को पढ़कर समझा जा सकता है। जो मंदिर अपनी स्थापत्य कला और संस्कृति चित्रण के लिए पूरे विश्व के आकर्षण केन्द्र बन गया है, वह अखिलेश के लिए वितृष्णा और निंदा का पात्र है। अखिलेश की दृष्टि में उसका निर्माण अवैध है, उसकी विशालता प्रभावी है पर कला और कल्पना नहीं। अब मल्लिका और अखिलेश से आगे बढ़कर उनके ज्ञान-स्रोत रोमिला थापर के शोध ग्रंथ “सोमनाथ” का अंत:दर्शन क्यों न करें? इतिहास जगत में रोमिला थापर प्राचीन भारतीय इतिहास की विशेषज्ञ मानी जाती हैं। अत: यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि 1026 में सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण की विशुद्ध मध्यकालीन घटना को उन्होंने अपनी शोध का विषय क्यों बनाया? यद्यपि पुस्तक के 2003 में लिखित आमुख में वे आभास पैदा करती हैं कि इस विषय पर उनका अध्ययन बहुत पहले से चल रहा था किंतु 2004 में पुस्तक के प्रकाशन से स्पष्ट है कि इस शोध ग्रंथ का 2002 के गुजरात दंगों से प्रतिक्रियात्मक संबंध है। वैसे भी 1987 में दूरदर्शन पर रामायण धारावाहिक की असामान्य लोकप्रियता एवं हिन्दुत्व के उभार से चिंतित रोमिला थापर का अधिकांश लेखन शोध के आवरण में हिन्दुत्व विरोधी राजनीति से प्रेरित ही है।

रोमिला का सोमनाथ

सोमनाथ पर रोमिला थापर का शोध क्या सिद्ध करना चाहता है? संक्षेप में कहना हो तो उनका शोध निम्न बिन्दुओं पर केन्द्रित है- महमूद गजनवी की मूल प्रेरणा मजहबी थी या दौलत के लिए लूटमार की? महमूद गजनवी ने जिस मंदिर पर हमला किया क्या वह हिन्दू मंदिर था? क्या वह वहां शिवलिंग तोड़ने आया था या इस्लाम पूर्व अरब में जिसकी उपासना होती थी उस मनात देवी की प्रतिमा को, जिसे तोड़ने का आदेश स्वयं पैगम्बर मुहम्मद ने जारी किया था? दूसरे- क्या सोमनाथ मंदिर का सचमुच ध्वंस हुआ था? यदि हुआ था तो संस्कृत और जैन स्रोतों में लगातार उसकी तीर्थयात्रा और पूजा-अर्चा की बात क्यों की जाती है? क्या हिन्दू मानस सोमनाथ पर आक्रमण की घटना को पूरी तरह भूल चुका था और उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश शासकों ने हिन्दू- मुस्लिम कटुता पैदा करने के लिए इस घटना को हिन्दू पराजय और अपमान का रंग देकर पुनरुज्जीवित किया?

फारुखी सीस्तानी जैसे कुछ मध्यकालीन मुस्लिम लेखकों के आधार पर रोमिला थापर बार-बार यह स्थापित करने की कोशिश करती हैं कि महमूद गजनवी सोमनाथ में किसी हिन्दू मंदिर में स्थापित शिवलिंग को तोड़ने नहीं आया था, अपितु इस्लाम पूर्व देवी मनात की प्रतिमा को- जिसे अरबस्तान से लाकर यहां सुरक्षित कर दिया गया था, तोड़ने के लिए आया था। उनकी दृष्टि में महमूद गजनवी के समकालीन विद्वान अल बरूनी की इस साक्षी का कोई महत्व नहीं है- “जिस मंदिर पर गजनवी ने आक्रमण किया उसमें पत्थर का एक शिवलिंग स्थापित था, उसे सोमनाथ नाम मिला, क्योंकि “सोम” का अर्थ है चन्द्रमा और “नाथ” का अर्थ है स्वामी।” अल बरूनी लिखता है कि महमूद गजनवी ने शिवलिंग के खंड-खंड करवा दिये। उसके एक टुकड़े को अपनी राजधानी गजनी में एक रंगशाला की सीढ़ियों पर थानेश्वर से लाई गयी चक्रस्वामिन की कांस्य प्रतिमा के साथ फिंकवा दिया। एक टुकड़े को गजनी की मस्जिद के दरवाजे पर रखवा दिया ताकि नमाजी लोग उसे अपने पैरों तले रौंद सकें। अल बरूनी सोमनाथ नामक शिवलिंग का संबंध सरस्वती नदी व प्रभास में वासुदेव कृष्ण के वंशनाश से भी जोड़ता है। अल बरूनी के अनुसार इस मंदिर का निर्माण लगभग एक सौ वर्ष पूर्व हुआ था। तेरहवीं शताब्दी के जकारिया अलकाज विनी ने सोमनाथ के धार्मिक महत्व का सविस्तार वर्णन करके उसकी पूजा-अर्चना का विशद वर्णन किया है। वह स्पष्ट शब्दों में लिखता है कि सुल्तान यामनीउद्दौला महमूद बिन गजनवी ने भारत के विरुद्ध जिहाद छेड़ा था। हिन्दुओं को इस्लाम की गोद में लाने के लिए उसने सोमनाथ का ध्वंस करने का बड़ा प्रयास किया। फारुखी सीस्तानी ने, जो उस आक्रमण के समय महमूद गजनवी के साथ था, महमूद को कट्टर सुन्नी मुसलमान बताया है। फारुखी के अनुसार, “महमूद ने अपनी सोमनाथ विजय का विस्तृत वर्णन खलीफा को पत्रों में लिखकर सूचित किया। जिससे प्रसन्न होकर खलीफा ने इस्लाम के एक महान प्रचारक की उपाधि से उसे सम्मानित किया।” ग्यारहवीं शताब्दी से सत्तरहवीं शताब्दी तक अनेक मुस्लिम लेखकों ने सोमनाथ ध्वंस का वर्णन किया है और महमूद की एकमात्र प्रेरणा मजहब को बताया है।

पर, रोमिला थापर इन सब मध्यकालीन साक्षियों को समय के साथ बदलती हुई मजहबी कट्टरवाद का परिणाम बताती हैं, उनमें अतिरंजना और कल्पना का पुट देखती हैं। कुछ संस्कृत ग्रंथों, अभिलेखों और जैन स्रोतों के आधार पर वे प्रमाणित करना चाहती हैं कि सोमनाथ मंदिर एक तीर्थस्थल और उपासना केन्द्र के रूप में हमेशा बना रहा। इसलिए उसके विध्वंस की कहानी निराधार है। वे इस तथ्य की उपेक्षा कर देती हैं कि मध्यकालीन मुस्लिम स्रोतों के अनुसार ही सोमनाथ मंदिर सात बार तोड़ा गया और सात बार बनाया गया। अलाउद्दीन खिलजी से लेकर औरंगजेब के काल तक सोमनाथ पर आक्रमण होते रहे, उसका ध्वंस होता रहा, किंतु रोमिला थापर ने अपनी समूची व्याख्या शक्ति को यह सिद्ध करने में लगा दिया है कि सोमनाथ मंदिर या तो टूटा ही नहीं था, अगर टूटा था तो हिन्दुओं का उसका पूरी तरह स्मृति लोप हो चुका था। इस स्मृति लोप को फिर से जिंदा करने का काम सन् 1843 में ब्रिटिश शासक लार्ड एलनबरा ने किया। एलनबरा की कहानी को भी रोमिला थापर गलत ढंग से पेश करती हैं। एलनबरा ने सोमनाथ मंदिर के ध्वंस की कहानी का आविष्कार नहीं किया, वह तो हिन्दू मानस में उस समय भी पूरी वेदना के साथ जीवित थी। उस वेदना का दोहन करने के लिए ही उसने गजनवी के मकबरे पर लगे फाटकों को सोमनाथ मंदिर से लूटकर ले जाए गये फाटक घोषित कर दिया और भारत के हिन्दू मन की सहानुभूति अर्जित करके बड़ी धूमधाम के साथ उन फाटकों को भारत को फिर से वापस लौटाकर आठ सौ साल पुराने अपमान का बदला लेने की गर्वोक्ति की। बाद में पता लगा कि ये फाटक सोमनाथ मंदिर के नहीं हैं और इसलिए उन्हें आगरा के किले के गोदाम में पटक दिया गया। इससे सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण और शिवलिंग के ध्वंस की घटना झूठी नहीं हो जाती। उसकी वेदना हिन्दू मन में नहीं होती तो फाटकों की कहानी गढ़ी ही नहीं जा सकती थी। दरवाजों की घटना का खंडन तो समझ में आता है, पर उसे निमित्त बनाकर सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी के आक्रमण और उस घटना के बारे में हिन्दुओं के स्मृति लोप की कहानी गढ़ना इतिहास लेखन के साथ बलात्कार से कम नहीं है।

वामपंथियों का राजनीतिक इतिहास लेखन

वस्तुत: वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास लेखन को एक विशिष्ट विचारधारा के राजनीतिक प्रचार का माध्यम बना लिया है। उनका इतिहास लेखन उनके राजनीतिक राग-द्वेष से ओतप्रोत रहता है। उनका इससे भी बड़ा अपराध यह है कि वे आईसीएचआर, आईसीएसएसआर, इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस आदि शीर्ष शैक्षिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों के इतिहास विभागों पर कब्जा जमाकर सत्ता के सहारे युवा शोधकत्र्ताओं और छात्रों के किशोर मस्तिष्कों पर अपने दृष्टिकोण को थोपने का प्रयास करते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास (आनर्स) के छात्रों पर भाषाशास्त्री व लोकसाहित्य विद् ए.के.रामानुजम के द्वारा संकलित आग्रहसूचक विकृत रामकथाओं को थोपना इस प्रवृत्ति का उदाहरण है। विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद में 9 के विरुद्ध 111 के बहुमत से पराजय के बाद वे उस अध्याय को वापस लाने के लिए तरह-तरह के चोर दरवाजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक ओर उन्होंने आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस पर दबाव बनाया है कि वह पाउला रिचमैन की “मैनी रामायणाज” पुस्तक का रामानुजम के लेख के साथ पुनप्र्रकाशन करें, इसके लिए आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी के विरुद्ध इंटरनेट अभियान आरंभ किया गया है। इससे भी हास्यास्पद प्रयास यह रहा कि तीन दिसम्बर को टाइम्स आफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में पहले पन्ने पर नेहा पुष्करणा के नाम से एक लम्बा-चौड़ा शीर्ष समाचार छपा कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुत्री डा.उपेन्द्र सिंह को बचाने के लिए इस अध्याय को पाठ्यक्रम से हटाया गया। दो पन्नों पर छपे इस समाचार में कोई भी ठोस तथ्य नहीं है किंतु उसका एकमात्र उद्देश्य प्रधानमंत्री के नाम को घसीटकर उनका हस्तक्षेप आमंत्रित करना है। जमीनी समर्थन के अभाव में पत्रकारों के कंधों पर सवार होकर खोई बाजी जीतने की यह रणनीति विचित्र है। वामपंथी शैक्षिकों और पत्रकारों का यह अपवित्र गठबंधन खतरनाक है। इससे भी अधिक खतरनाक यह है कि टाइम्स आफ इंडिया जैसा बड़ा अखबार इस गठबंधन का मोहरा बनने को तैयार है। क्या टाइम्स आफ इंडिया अभी भी ब्रिटिश शासकों द्वारा प्रदत्त “बोरीबंदर की बुढ़िया” बाली छवि से बाहर निकलने को तैयार नहीं है? इस विषय पर पायनियर (5 दिसम्बर) में सिद्धार्थ मिश्रा की टिप्पणी पठनीय है।द

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