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पुस्तक चर्चा

Written byArchiveArchive
Nov 6, 2006, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 06 Nov 2006 00:00:00

आचार्य रघुवीर-भारतीय धरोहर के मनीषी

भारत-भारती के साधक

पुस्तक परिचय

पुस्तक का नाम : आचार्य रघुवीर- भारतीय धरोहर के मनीषी

लेखक : शशिबाला

मूल्य : 300/- रुपए

पृष्ठ : 179

प्रकाशक : आदित्य प्रकाशन

एफ-14/65,

माडल टाउन-।।,

दिल्ली-110009

प्रख्यात भाषाविद्, भारतीय सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक पुरुष आचार्य रघुवीर का प्रेरक जीवन जिसने भी देखा या पढ़ा है, वह उनके विराट व्यक्तित्व की आभा से प्रभावित हुए बिना नहीं रहा होगा। उन्हीं के जीवन एवं कार्यों पर लिखी गयी पुस्तक है, “आचार्य रघुवीर-भारतीय धरोहर के मनीषी।” इसकी लेखिका हैं डा. शशिबाला। डा. शशिबाला ने लालित्यपूर्ण एवं प्रवाहमय भाषा में आचार्य रघुवीर के प्रारम्भिक जीवन, यूरोप में व्यतीत उनके किशोर जीवन, भारत-भारती की साधना हेतु उनके द्वारा किए गए वैश्विक भ्रमण, उनके भाषा दर्शन, राजनीतिक चिन्तन को संजोया है। पुस्तक की छपाई, कागज व कलेवर भी उत्तम गुणवत्ता से भरपूर है। यहां प्रस्तुत है उसी पुस्तक से कुछ अंश-

भारत और मंगोलिया की सांझी संस्कृति की खोज में

अपने जीवन के अन्तिम दशक में आचार्य रघुवीर मंगोलिया देश की यात्रा पर गए। उस समय उनके अनुसंधान का विषय था- मंगोलिया की भाषा, साहित्य, संस्कृति और धर्म। वह इतिहास जिसमें छठी शताब्दी के उन भारतीय आचार्यों का वर्णन है जो धर्म की ज्योति लिए मंगोल देश में गये, और 6000 संस्कृत ग्रन्थों का मंगोल भाषा में भाषान्तर किया, जिनके द्वारा निर्मित दास लाख मूर्तियां, सात सौ पचास विहारों में सुरक्षित थीं, जिनके द्वारा लिखी अथवा लिखवायी गयीं बत्तीस लाख पाण्डुलिपियां 1940 तक विहारों में सुरक्षित थीं, लाखों प्रभापट थे। आचार्य जी इन सब का अवलोकन करना चाहते थे। मंगोल भाषा में लिखा गया विक्रमादित्य, राजा भोज और कृष्ण की कथाएं वे अपने साथ लाए।

बीसवीं शताब्दी में भारत से मंगोलिया जाने वाले वे पहले आचार्य थे। 1956 में जब वे वहां गए तो वहां की जनता के लिए मानो एक युगप्रवर्तक घटना घटी हो। प्रधानमंत्री से लेकर विद्वान, पत्रकार, जनता-जनार्दन का अपार स्नेह उन्हें मिला। जिस-जिस तम्बू में वे गए, माताओं ने अपने बच्चों को उनकी गोद में बिठा दिया, सब उनका आशीर्वाद पाने को आतुर थे।

इस यात्रा से वे अपने साथ तीन लाख पृष्ठों के अणु चित्र लाये, पाण्डुलिपियां और प्रभापट लाये। पहली बार कोई भारतीय मंगोलिया से भारत-अनुप्राणित साहित्य और कला-निधियां लेकर आया था।

आचार्य जी स्वतंत्रता का उदय होते ही सर्वप्रथम अवसर की खोज में रहे कि भारत के सांस्कृतिक सखा देशों से पुन: सम्बंध स्थापित कर सकें। आचार्य जी का मंगोलों में जाना क्या था, वे तो आनन्द-विभोर हो उठे कि कई शतियों के उपरान्त भारत के आचार्य के चरण उनकी भूमि पावन कर रहे हैं।

जनवरी 1956 में आचार्य जी सोवियत संघ, साइबेरिया (शिबिर देश) और मंगोल गणराज्य की यात्रा पर गये तो वहां शरीर को जमा देने वाली ठण्ड थी। मास्को में चलने के लिए दो व्यक्तियों का सहारा लेना पड़ता था। गरम बनियान, ऊनी कमीज, कोट, ओवरकोट और उसके ऊपर रुई से भरा चमड़े का कोट पहन कर भी सर्दी से शरीर की रक्षा नहीं हो पाती थी। वहां उन्होंने चंगेज खां के वंशजों के अति दिव्य मन्दिर देखे जो गणेशजी की मूर्तियों से सुशोभित थे। मन्दिरों में भिक्षु उपासना के साथ ढोल और अन्य वाद्य बजा रहे थे। मन्दिरों के बाहर लटकी छोटी-छोटी घण्टियां मधुर स्वर गुंजा रही थीं। मन्दिरों के भीतर बोधिवृक्ष को शिशु की भांति पाला-पोसा जाता था। अगुरु और चन्दन से बनी महाघण्टी थी, श्रीवत्स से अंकित वस्त्र से ढके पटल (मेज) थे, मन्दिर के बाहर पीले नेजाबुत्का फूल थे। नेजाबुत्का का अर्थ है: मुझे भूल न जाना। चारों ओर हिम का धवल साम्राज्य था।

यहां से आचार्य जी मंगोल भाषा में अनूदित अनेक ग्रन्थ लाये जिनमें कालिदास का मेघदूत, पाणिनि का व्याकरण, अमरकोश, दण्डी का काव्यादर्श आदि सम्मिलित हैं। इनमें से एक, “गिसन खां” अर्थात् राजाकृष्ण की कथाओं का उनकी सुपुत्री डा. सुषमा लोहिया ने अनुवाद किया है। वे भारतीयों को भारतीयता के गौरव की अनुभूति करवाना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने मंगोल-संस्कृत और संस्कृत-मंगोल कोश भी लिख डाले। उन्होंने मंगोल भाषा का व्याकरण भी लिखा ताकि भावी पीढ़ियां उसका अध्ययन कर सकें।

वहां “आलि-कालि-बीजहारम्” नामक, संस्कृत पढ़ाने की एक पुस्तक आचार्य जी को उपलब्ध हुई। इसमें लाञ्छा और वर्तुल दो लिपियों का प्रयोग किया गया है। भारत में ये लिपियां खो चुकी हैं। मंगोलिया में बौद्ध भिक्षु संस्कृत की धारणियों को लिखने और पढ़ने के लिए इस पुस्तक का अध्ययन किया करते थे। इसमें संस्कृत अक्षरों का तिब्बती और मंगोल लिपियों में लिप्यन्तर कर उन्हीं भाषाओं में वर्णन प्रस्तुत किए गए हैं। और भी आश्चर्य की बात है कि इसकी छपाई चीन में हुई थी। यह पुस्तक मात्र भारत के चीन, मंगोलिया और तिब्बत के साथ सांस्कृतिक सम्बंधों की गाथा ही नहीं सुनाती अपितु नेवारी, देवनागरी तथा बंगाली लिपियों का विकास जानने में भी सहायक है। समीक्षक

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