भारत के विभिन्न प्रातों में कांग्रेस और उसकी गठबंधन सरकारों में हिंदू हितों के शोषण और मुस्लिम तुष्टीकरण की मानो जैसे होड़ मची है। तुष्टीकरण के लिए एक राज्य सरकार कुछ घोषणा करती है तो दूसरी उससे आगे बढ़कर अन्य सौगात देने की घोषणा कर देती है। इसे हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक, झारखंड, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, केरल आदि में सरकारों की घोषणाओं से समझा जा सकता है। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस सरकार ने बीते दिनों अल्पसंख्यक कल्याण का बजट तो बढ़ा दिया, लेकिन सरकार की दो योजनाओं का व्यय मंदिर ट्रस्ट के कंधे पर डाल दिया। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने अपने बजट में मुस्लिम समुदाय को सशक्त बनाने के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी। कर्नाटक भाजपा ने इसे ‘हलाल’ बजट करार दिया है। साथ ही, राज्य सरकार पर 1.16 लाख करोड़ रुपये का रिकॉर्ड ऋण लेने का भी आरोप लगाया है, जो कर्नाटक के इतिहास में सबसे अधिक है।
तुष्टीकरण की होड़

वरिष्ठ पत्रकार
मुस्लिम तुष्टीकरण की यह स्पर्धा देश के उन 9 प्रदेशों में चल रही है, जहां कांग्रेस या उसके गठबंधन दलों की सरकारें हैं। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 7 मार्च को राज्य का बजट प्रस्तुत किया, जिसमें मुसलमानों के लिए कुल 13 घोषणाएं हैं। इसमें सरकारी ठेकों में मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला भी शामिल है। इसके लिए सिद्धारमैया सरकार ने कर्नाटक पब्लिक प्रोक्योरमेंट एक्ट, 1999 में संशोधन को मंजूरी दी है। 15 मार्च को कैबिनेट बैठक में ठेके में आरक्षण के फैसले को मंजूरी भी दे दी गई। अब इसे विधानसभा में प्रस्तुत करने की तैयारी है। इसके बाद कानून भी बन जाएगा।
बजट में इमामों को 6,000 रुपये मासिक भत्ता देने, मुअज्जिनों को दिया जाने वाला मानदेय बढ़ाकर 5,000 रुपये प्रतिमाह करने और मुस्लिम लड़कियों के लिए 15 महिला कॉलेज भी खोलने की बात है। ये कॉलेज वक्फ की जमीन पर बनेंगे, लेकिन इनका निर्माण सरकार करेगी। इन कॉलेजों के संचालन में वक्फ बोर्ड की भूमिका प्रमुख होगी। इसी तरह, ‘अल्पसंख्यक’ के सामूहिक निकाह आयोजित करने वाले गैर-सरकारी संगठनों को प्रति युगल 50,000 रुपये दिए जाएंगे। 250 मौलाना आजाद मॉडल अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में चरणबद्ध तरीके से ‘प्री-प्राइमरी’ से पूर्व विश्वविद्यालय (पीयू) कक्षाएं शुरू की जाएंगी। उर्दू माध्यम से शिक्षा देने वाले सौ विद्यालयों को अनुदान के रूप में 100 करोड़ रु. का प्रावधान किया गया है। इस योजना पर कुल 400 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। 100 करोड़ रुपये की राशि इस वर्ष के लिए है।
यही नहीं, कर्नाटक के विभिन्न नगरों में अलग से मुस्लिम कॉलोनियों का विकास किया जाएगा। इस मद में 1,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वक्फ संपत्ति और कब्रिस्तानों के बुनियादी ढांचा विकास के लिए भी सरकार 150 करोड़ रु. खर्च करेगी। इसके अलावा, मुस्लिम सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए 50 लाख रु. का अनुदान दिया जाएगा। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में नए आईटीआई कॉलेज खोले जाएंगे, ताकि मुस्लिम समाज के बच्चों का ‘कौशल विकास’ हो सके। इनमें मुस्लिम छात्रों को शुल्क में 50 प्रतिशत की छूट भी दी जाएगी। उलाल नगर में मुस्लिम लड़कियों के लिए आवासीय महाविद्यालय खोले जाएंगे और जो मुस्लिम छात्र विदेश जाकर पढ़ना चाहते हैं, उनकी छात्रवृत्ति भी बढ़ाई जाएगी। बजट में बेंगलुरु शहर में हज भवन का विस्तार और मुस्लिम छात्राओं को आत्मरक्षा प्रशिक्षण देने की भी घोषणा की गई है। कर्नाटक सरकार का कुल बजट 4.09 करोड़ का है। इसमें मुस्लिम और ईसाई समाज के लिए लगभग 4700 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। वैसे सामान्य नागरिक की भांति कर्नाटक के ‘अल्पसंख्यक’ समाज के लिए जो प्रावधान है, उनका लाभ तो उन्हें मिलेगा ही, ‘अल्पसंख्यक’ समाज के सशक्तिकरण के लिए भी अलग से प्रावधान किए गए हैं।
ऐसा पहली बार नहीं है, जब कर्नाटक सरकार ने मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए घोषणाओं की झड़ी लगा दी है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने ओबीसी समुदाय को मिलने वाले आरक्षण में से मुसलमानों को आरक्षण दिया था। बीच में भाजपा सरकार आई तो ओबीसी कोटे से मुसलमानों को आरक्षण देने के फैसले पर रोक लगा दी थी। लेकिन कांग्रेस जब दोबारा सत्ता में आई तो उसने इस फैसले को फिर से लागू कर दिया। कर्नाटक सरकार की नई घोषणाओं में उलेमाओं के उस 13 सूत्री मांग-पत्र की झलक दिखती है, जो महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में जारी किया गया था। उस मांग-पत्र में उर्दू भाषा के विकास, सरकारी ठेकों में प्राथमिकता, मुस्लिम कॉलोनियों के विकास आदि मांगे थीं। एक मांग में थोड़ा अंतर है। तब उलेमाओं ने सेना और पुलिस में मुसलमान युवकों को प्राथमिकता देने की मांग की थी। वहीं कर्नाटक सरकार की घोषणा में मुस्लिम लड़कियों के लिए ‘आत्मरक्षा प्रशिक्षण’ की घोषणा की गई है। बस यही अंतर है।
कर्नाटक सरकार ‘अल्पसंख्यक कल्याण’ के लिए उदारता से सौगातें बांट तो रही है, पर इसकी भरपाई मंदिरों से करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार इस वर्ष कर्नाटक सरकार को मंदिरों से होने वाली आय में 4 प्रतिशत की वृद्धि होगी। यह वृद्धि मंदिरों में श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के कारण अनुमानित है। अन्य राज्यों की भांति कर्नाटक में भी सरकार की अनेक मंदिर ट्रस्ट संचालन में सहभागिता है। यह आय इन्हीं मंदिरों से होती है। यानी सरकार मंदिरों से धन लेकर मुस्लिम तुष्टीकरण पर खर्च करेगी।
कांग्रेस का पैंतरा
इससे पूर्व तेलंगाना में भी कांग्रेस सरकार ने जातिगत सर्वेक्षण के बाद ओबीसी कोटे से मुसलमानों को 4 प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा की है। चिंता की बात यह है कि पिछली सरकार के सर्वेक्षण में पिछड़े वर्ग की जनसंख्या 51 प्रतिशत थी, जो नए सर्वेक्षण में घटकर 46 प्रतिशत हो गई है। केंद्रीय मंत्री बंदी संजय कुमार ने राज्य सरकार पर ओबीसी कोटे से मुसलमानों को आरक्षण देने के लिए आंकड़ों में हेरफेर करने का आरोप लगाया है। ओबीसी कोटे से मुसलमानों को आरक्षण देने का मामला नया नहीं है। इससे पहले कांग्रेस और उसकी सहयोगी गठबंधन सरकारों ने अपने-अपने राज्यों में ओबीसी कोटे से मुसलमानों को आरक्षण दिया है। इसमें कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य हैं। कर्नाटक में ओबीसी कोटा 32 प्रतिशत है। इसी में से मुसलमानों को आरक्षण दिया गया है।
कर्नाटक में पहले जब कांग्रेस की सरकार थी, तब भी यह निर्णय लागू किया गया था, लेकिन बीच में भाजपा सरकार आई तो उसने यह कहते हुए फैसले को रद्द कर दिया कि यह ओबीसी हितों के खिलाफ है। लेकिन राज्य में दोबारा सत्ता में आते ही कांग्रेस ने ओबीसी कोटे से मुसलमानों को 3.5 प्रतिशत आरक्षण देने का आदेश लागू कर दिया। इसी तरह, केरल में ओबीसी कोटे से मुसलमानों को 12 प्रतिशत आरक्षण दिया गया है, जो किसी भी राज्य में मुसलमानों को मिलने वाले आरक्षण में सबसे अधिक है। केरल की वामपंथी सरकार को मुस्लिम लीग का भी समर्थन है, जिसने मजहबी आधार पर भारत का विभाजन कराया था और अगस्त 1946 में ‘डायरेक्ट एक्शन’ के तहत देश में हिंदुओं पर हमले किए थे। विशेषकर बंगाल व पंजाब में लाखों हिंदुओं की हत्या की गई थी।
दरअसल, कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए दो बातों पर जोर दे रही है- एक, आरक्षण का कोटा बढ़ाना और दूसरा जातिगत जनगणना कराना। कोटा बढ़ाने की मांग और जातिगत जनगणना के पीछे कांग्रेस का उद्देश्य मुसलमानों को आरक्षण देना ही है। कांग्रेस मुसलमानों को ओबीसी कोटे में शामिल करना चाहती है, ताकि राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर ओबीसी का प्रतिशत सामने आ सके और उस कोटे के अंतर्गत मुसलमानों को आरक्षण दिया जा सके। लेकिन भारत का संविधान मजहबी आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता। आरक्षण का अधिकार केवल अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को ही है। चूंकि मुसलमानों को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, इसलिए उन्हें ओबीसी में शामिल करने की मांग उठाई जा रही है, ताकि मुसलमानों को आरक्षण का लाभ दिया जा सके। कांग्रेस ने इसका रास्ता भी निकाल लिया है।
कांग्रेस ने सत्ता में रहते हुए दो समितियां बनाई थीं-सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र समिति। दोनों समितियों की रिपोर्ट कांग्रेस की इच्छा के अनुरूप ही आई थीं। इनमें मुस्लिम समुदाय को ‘पिछड़ा’ माना गया है। रंगनाथ मिश्र समिति ने तो मजहबी आधार पर मुसलमानों को 10 प्रतिशत और अन्य अल्पसंख्यकों को 5 प्रतिशत आरक्षण देने की सिफारिश की थी। इसी के बाद कांग्रेस ने मुसलमानों को आरक्षण देने और कोटा बढ़ाने की मांग शुरू कर दी। साथ ही, जिन राज्यों में उसकी और सहयोगी दलों की सरकारें थीं, उन्होंने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। इसी की झलक तेलंगाना, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में देखी जा सकती है।

शुरू से रही खोटी सोच
कांग्रेस का इतिहास मुस्लिम तुष्टीकरण से अटा पड़ा है। इतिहास में जहां तक दृष्टि जाती है, तुष्टीकरण का उदाहरण मिलता है। आज भारत के भू-भाग पर पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे दो देश बने हैं तो इसमें बड़ा योगदान कांग्रेस की तुष्टीकरण नीति का भी है। बात 1916 की है। कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच लखनऊ में एक समझौता हुआ था। इसमें ‘लोकल असेंबली’ में मुसलमानों के लिए अलग क्षेत्र निर्धारित करने पर सहमति दी गई थी। अपनी स्थापना के पहले दिन से मुस्लिम लीग अलगाववाद का अभियान चला रही थी। हिंदू-मुस्लिम भाइचारे के विरुद्ध मुसलमानों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र बनाना उसकी योजना का अंग था। लीग ने अपने कुछ लोगों को कांग्रेस का सदस्य भी बनवा दिया था। कांग्रेस ने यह सुविधा दी थी कि लीग के सदस्य चाहें तो कांग्रेस के सदस्य रह सकते हैं। इसी सुविधा का लाभ उठाकर मोहम्मद अली जिन्ना कई वर्ष तक कांग्रेस के सदस्य बने रहे।
इसी तरह, 1921 में कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण के लिए ही खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ा था, ताकि दोनों आंदोलन साथ-साथ चलें। असहयोग आंदोलन स्वतंत्रता के लिए था और खिलाफत आंदोलन तुर्की में ‘खलीफा’ की बहाली की मांग को लेकर था। खलीफा का भारत से कोई संबंध नहीं था। एक समय था, जब खलीफा इस्लाम में सबसे ताकतवर माना जाता था। मध्यकाल में भारत पर अधिकांश हमले खलीफा के आदेश पर ही हुए थे। उस दौरान लूट और नरसंहार के विवरण इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। लेकिन ब्रिटिश काल में खलीफा की शक्ति क्षीण हो गई और उसका केंद्र तुर्की हो गया। बाद में जब अंग्रेजों ने खलीफा परंपरा खत्म कर दी, तब भारत के मुस्लिमों को छोड़कर दुनिया के किसी भी मुस्लिम देश ने खलीफा के समर्थन में कोई आंदोलन नहीं चलाया। कांग्रेस ने तुष्टीकरण के लिए भारतीय जनमानस को सड़कों पर उतार दिया था। हालांकि, इससे खलीफा की बहाली तो नहीं हुई, लेकिन मुस्लिम लीग को मुसलमानों में कट्टरता फैलाने और उन्हें एकजुट करने का रास्ता मिल गया। यही कट्टरता आगे चलकर भारत विभाजन और लाखों हिंदुओं की हत्या का कारण बनी।
उन दिनों भारत में दो बड़ी घटनाएं घटीं। एक घटना मालाबार की और दूसरी चौरी चौरा की है। मालाबार में कट्टरपंथियों ने बड़े पैमाने पर हिंदुओं का नरसंहार, हिंदू स्त्रियों पर अत्याचार और उनका अपहरण किया था। गांव के गांव हिंदुओं के शवों से पट गए थे। यहां तक कि कट्टरपंथियों ने उनके खेतों और घरों पर भी कब्जा कर लिया था। कई दिनों तक लाशें सड़ती रही थीं, लेकिन कांग्रेस चुप्पी साधे रही। इसी बीच, चौरी-चौरा में हिंसा हुई तो कांग्रेस ने न केवल उसकी निंदा की, बल्कि आंदोलन भी वापस ले लिया था। चौरी चौरा कांड में हिंदुओं को आरोपी बनाया गया था। इनमें कुछ तो गोरक्षपीठ के संत भी थे।
अंग्रेजों से साठगांठ
ब्रिटिश काल में (1936) में एक दौर ऐसा भी आया था, जब कांग्रेस अपनी गलती सुधार सकती थी। मुस्लिम लीग को अंग्रेजों का पूरा समर्थन था। लीग ‘लोकल असेंबली’ चुनाव में अपनी ताकत बढ़ाना चाहती थी। इसके लिए वह ऐसी नियमावली चाहती थी, जिसमें मुस्लिम बहुल क्षेत्रों हिंदू कम मतदान कर सकें। इस पक्षपातपूर्ण चुनाव नियमावली को भी कांग्रेस ने अपनी सहमति दे दी। उस समय कांग्रेस में नेताजी सुभाष चंद्र बोस सहित कुछ ऐसे नेता थे, जो साम्प्रदायिक आधार पर ऐसे किसी निर्णय के पक्ष में नहीं थे। लेकिन कांग्रेस ने यह कहकर उन्हें चुप कर दिया कि ‘‘अभी शुरुआत है, भारतीयों को सत्ता में सहभागिता मिल रही है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसका मजहब क्या है।’’ लेकिन मुस्लिम लीग अपनी योजना पर काम कर रही थी। वह कट्टरता फैलाकर पाकिस्तान के लिए अपना आधार मजबूत कर रही थी। हालांकि, पाकिस्तान की पूरी रूपरेखा 1930 में सामने आ गई थी, फिर भी कांग्रेस ऐसी चुनाव प्रक्रिया के लिए सहमत हो गई, जो देश और हिंदुओं को गहरा घाव देने वाली थी। इसी कारण पंजाब और बंगाल में कट्टरपंथी अलगाववादी सत्ता में आ गए। 16 अगस्त, 1946 को मुस्लिम लीग के ‘डायरेक्ट एक्शन’ में सामूहिक हत्याकांड में ये सरकारें भी सहभागी रहीं।
मुस्लिम तुष्टीकरण की दिशा में कांग्रेस का एक बड़ा निर्णय मुस्लिम लीग से जुड़े कट्टरपंथियों को संविधान सभा में सदस्य स्वीकार करना भी था। द्वितीय विश्वयुद्ध के समय अंग्रेजों ने भारत विभाजन का संकेत दे दिया था। इसे लेकर मुस्लिम लीग सतर्क थी। उसने ब्रिटिश काल में अलग पाकिस्तान के लिए संविधान सभा नहीं बनाई। लेकिन भारत की संविधान सभा में लीग से जुड़े लोग शामिल हुए। कांग्रेस ने इन कट्टरपंथी लीगियों को संविधान सभा का सदस्य बनाने पर सहमति दी थी। विभाजन के बाद इनमें से अधिकांश पाकिस्तान चले गए, पर भारत के संविधान में अपनी परछाई छोड़ गए, जिसे कुछ प्रावधानों से समझा जा सकता है।
मुसलमानों को प्राथमिकता
स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस के हर प्रधानमंत्री ने तुष्टीकरण को प्राथमिकता दी। इसके लिए ब्रिटिश काल में बने मुस्लिम पर्सनल लॉ को ज्यों का त्यों स्वीकार किया गया, वक्फ बोर्ड को विशिष्ट अधिकार दिया और संविधान में भी बदलाव किए। इसे मुस्लिम महिला शाहबानो को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गुजारा भत्ता देने के आदेश से समझा जा सकता है। शीर्ष अदालत का निर्णय संविधान के प्रावधानों के तहत था, लेकिन राजीव गांधी सरकार ने शीर्ष अदालत के फैसले को संविधान संशोधन विधेयक के जरिये प्रभावहीन कर दिया गया था। इसी तरह नरसिंहराव सरकार में बनाया गया प्लेसेज आफ वर्शिप एक्ट-1991 की धारा 4 भी मुस्लिम तुष्टीकरण की पराकाष्ठा है। इस धारा के तहत किसी को भी ऐसे किसी विशिष्ट स्थल के स्वरूप को बदलने या कानूनी कार्रवाई शुरू करने की इजाजत नहीं है, जैसा वह 15 अगस्त, 1947 में था। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो खुलकर कहा था, ‘‘भारत के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है।’’ इससे पहले जवाहरलाल नेहरु, इंदिरा गांधी के कार्यकाल के निर्णयों में भी मुस्लिम तुष्टीकरण साफ दिखता है। राहुल गांधी ने अपने अमेरिका दौरे के दौरान उस मुस्लिम लीग को सेकुलर बताया था, जिसका इतिहास कट्टरपंथ और साम्प्रदायिकता से भरा है। यह तुष्टीकरण की पराकाष्ठा नहीं तो क्या है?
दिखता है बस फिलिस्तीन
कांग्रेस का तुष्टीकरण केवल भारत तक सीमित नहीं है, वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस धारा पर काम करती रही है। इसे फिलिस्तीन में आतंकी समूहों पर इस्राएल द्वारा की जा रही कार्रवाई के विरोध से समझा जा सकता है। कांग्रेस ने खुलकर न केवल फिलिस्तीन का समर्थन किया, बल्कि सड़क से संसद तक इसके विरुद्ध आवाज भी उठाई। वहीं, पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिंदुओं पर होने वाले अत्याचारों पर कांग्रेस की वैसी प्रतिक्रिया नहीं आई, जैसी फिलिस्तीन के समर्थन में थी। कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा तो फिलिस्तीन के समर्थन में बैग लेकर संसद में पहुंच गई थीं। वहीं, राहुल गांधी संविधान के प्रतीक के रूप में एक ‘लाल किताब’ लेकर चलते हैं और हर सभा में संविधान को सर्वोपरि बताते हैं, लेकिन समर्थन दंगाइयों और साम्प्रदायिक शक्तियों का करते हैं। राहुल गांधी भले ही अपने हर भाषण में संविधान की दुहाई दें, लेकिन तुष्टीकरण के लिए वे उन लोगों के साथ खड़े दिखे, जिन्होंने संवैधानिक प्रक्रिया रोकने के लिए हिंसा की। इसे सम्भल के घटनाक्रम से समझा जा सकता है। सम्भल में सर्वेक्षण टीम संवैधानिक प्रक्रिया पूरी करने गई थी। लेकिन विरोध हुआ, हिंसा हुई। फिर भी वे हिंसा करने वालों से मिलने गए। चूंकि वे मुस्लिम समाज के थे, इसीलिए राहुल ने आदतन उन्हें ‘पीड़ित’ बताया और उनके परिवारों से भी मिलने गए।
यह कट्टरपंथियों द्वारा बनाए गए वातावरण और उसे कांग्रेस के समर्थन का ही परिणाम है कि विभाजन के बाद भी भारत में वही माहौल बना रहा, जो विभाजन की भीषण त्रासदी का कारण बना। सामान्यतया प्रत्येक व्यक्ति, संस्था और राष्ट्र अनुभवों से सीखता है और भविष्य की निरापद यात्रा का मार्ग अपनाता है, लेकिन कांग्रेस अनुभवों से सीखने के बजाय आज भी तुष्टीकरण की उसी राह पर दृढ़ता से चल रही है, जो कट्टरपंथ को बढ़ावा देती है। भारत का वर्तमान वातावरण किसी से छिपा नहीं है। सम्भल, बरेली और बहराइच ही नहीं, लोकसभा चुनाव से लेकर हाल ही संपन्न दिल्ली विधानसभा चुनाव तक में कट्टरपंथियों ने जिस प्रकार मुस्लिम मतदाताओं को एकजुट करने का प्रयास किया, उसकी झलक प्रचार के दौरान भी दिखी और मतदान में भी। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले कट्टरपंथियों का 13 सूत्री मांग पत्र सामने आया था और दिल्ली चुनाव प्रचार में ‘वोट जिहाद’ का स्वर भी सुनाई दिया। ये घटनाएं बताती हैं कि हिंदुओं ही नहीं, पूरे देश को सतर्क रहने की जरूरत है।
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