यह कहानी उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में रहने वाले उन्नतिशील कृषक लोकेश कुमार की है, जिन्होंने घर से दूर नौकरी और परिवार की परेशानियों को देखते हुए कृषि में हाथ आजमाना शुरू किए और देखते-देखते कामयाबी की नई गाथा लिख डाली। रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से दूर रहकर लोकेश विषमुक्त खेती कर रहे हैं और हर साल लाखों रुपए कमा रहे हैं।
लोकेश हाथरस के जटोई गांव के रहने वाले हैं और गो-आधारित कृषि के लिए पूरे क्षेत्र में पहचाने जाते हैं। वे विज्ञान और विधि में स्नातक की पढ़ाई के बाद एमएसडब्ल्यू कर चुके हैं। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत 90 के दशक में भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी से की थी। कुछ साल बाद आगरा में वकालत शुरू की, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियां राह में बाधा बनने लगीं। आखिरकार लोकेश ने मोटी कमाई की चिंता छोड़ गांव में ही रहकर कृषि से परिवार चलाने का फैसला किया।
लोकेश पिता के साथ रहकर बचपन से ही पारंपरिक कृषि के बारे में जानने-समझने लगे थे। उन्हें खेतों में रासायनिक खाद और कीटनशक के दुष्प्रभाव पता थे। उन्होंने आगे बढ़ने के लिए प्राकृतिक तरीके से कृषि की शुरुआत की। शुरू-शुरू में वे लोगों की हंसी के पात्र बने, जैसे-जैसे वे तरक्की करते गए, समाज में उनका सम्मान भी बढ़ता गया। अपने घर में गाय पालने वाले लोकेश कहते हैं, ‘‘कुछ ही साल की मेहनत से मैंने अपनी जमीन को पूरी तरह रासायनिक खाद व कीटनाशकों से मुक्त कर दिया है।’’
2004 से वे पूरी तरह प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। दलहन-तिलहन के साथ वे मसालों की पैदावार करते हैं। वे खेतों के किनारे नीबू, बेल, किन्नू, मौसमी, संतरा, जामुन, अमरूद, खिन्नी, करोंदा जैसे वृक्ष लगाकर फलों का उत्पादन भी करते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त मुनाफा होता है। उनके पास 8 एकड़ कृषि भूमि है, जिसमें गो आधारित खेती करने में करीब 4 लाख रु. का सालाना खर्च आता है और इसके बदले आमदनी चार-गुना से भी अधिक होती है।
वे खेतों की मेड़ पर फलदार व छायादार पेड़, बेड पद्धति से सब्जी और क्यारी विधि से अनाज की पैदावार ले रहे हैं। वे गोबर से खाद व गोमूत्र से कीटनाशक बनाते हैं। बीज बैंक भी अपना बना रखा है, जिससे उन्हें बाजार से महंगे बीज खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती।
टिप्पणियाँ