बंगाल हिंसा: हिंदुओं का पलायन, ममता की चुप्पी
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पश्चिम बंगाल में हिंदुओं के विरुद्ध राज्य प्रायोजित हिंसा: ममता बनर्जी की सरकार की असंवैधानिक भूमिका

पश्चिम बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ सुनियोजित हिंसा। मुर्शिदाबाद, मालदा में हिंदुओं पर हमले, पलायन और मंदिरों पर पत्थरबाजी। बंगाल में क्या हो रहा है?

by साध्वी जया भारती
Apr 14, 2025, 12:51 pm IST
in मत अभिमत
Wes bengal burning

मुर्शिदाबाद में दंगाइयों के द्वारा जलाई गई पुलिस वैन (फोटो साभार: HT)

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पश्चिम बंगाल में वक्फ संशोधन कानून के विरोध के नाम पर जो हिंसा फैली है, वह मात्र विरोध प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक सुनियोजित और राज्य प्रायोजित है। मुर्शिदाबाद, मालदा, हुगली और नॉर्थ 24 परगना जैसे जिलों में हिंदू समुदाय के घरों पर हमले, आगजनी, लूटपाट और हत्या की घटनाएं सामने आई हैं। इन घटनाओं के बाद सैकड़ों हिंदू परिवारों को अपने घर छोड़कर पलायन करना पड़ा है, जो कि राज्य सरकार की निष्क्रियता और हिंदू विरोधी रवैये को उजागर करता है।

ममता बनर्जी: संविधान की नहीं, तुष्टीकरण की मुख्यमंत्री

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हाल ही में वक्फ संशोधन कानून को पश्चिम बंगाल में लागू न करने की घोषणा की। उन्होंने मुस्लिम अल्पसंख्यकों और उनकी संपत्ति की सुरक्षा की बात की, परंतु हिंदू समुदाय पर हो रहे हमलों पर एक शब्द तक नहीं कहा। इससे यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री सुनियोजित ढंग से न केवल हिंसा को समर्थन दे रही हैं, बल्कि मुस्लिम समुदाय को हिंदुओं पर हमला करने के लिए चुपचाप तरीक़े से बढ़ावा दे रही हैं।

क्या एक मुख्यमंत्री जो संविधान के आदेशों को ठुकरा दे, सुप्रीम कोर्ट की दिशा-निर्देशों को चुनौती दे, और एक विशेष मजहब के वोट बैंक को खुश करने के लिए पूरे राज्य को आग में झोंक दे, उसे पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार है? एक वीडियो में ममता सरकार के मंत्री को यह कहते सुना गया कि “जरूरत पड़ी तो पूरे कोलकाता और बंगाल को भर देंगे।” यह कथन किसी मंत्री का नहीं, बल्कि एक मजहबी युद्ध की चेतावनी की तरह प्रतीत होता है। क्या यह किसी लोकतांत्रिक राज्य का भाषण है, या किसी जिहादी संगठन का घोषणा-पत्र?

पुलिस मूकदर्शक क्यों?

हमने देखा कि जब हिंदू घरों को जलाया गया, महिलाओं को डराया गया, मंदिरों पर पत्थरबाज़ी हुई, तब राज्य पुलिस या तो नदारद थी या मूकदर्शक बनी रही। जिन लोगों को जनता की रक्षा करनी चाहिए, वे राज्य सरकार के इशारे पर पीड़ितों को अकेला छोड़ गए। क्या यह राज्य द्वारा समर्थित हिंसा नहीं है?

दलित और गरीब हिंदुओं की हत्या पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ पार्टियों की चुप्पी

जो पार्टियाँ हर समय जातीय जनगणना और SC/ST/OBC के अधिकारों की बातें करती हैं—कांग्रेस, सपा, वामदल—वे सब आज मौन हैं। जब दलित हिंदू मारे जा रहे हैं, तब किसी ने भी एक शब्द नहीं कहा। क्या उनका ‘धर्मनिरपेक्षता’ केवल एक मजहब के लिए है?

क्या बंगाल को बांग्लादेश बनाने की योजना है?

मुर्शिदाबाद और मालदा जैसे जिलों में हिंदुओं पर हमले की शैली—हिंदुओं की हत्या, घर जलाना, पत्थरबाज़ी, पीने के पानी में ज़हर मिलाना—हमें न सिर्फ़ 1971 के बांग्लादेशी हिंदू नरसंहार की, बल्कि हाल ही में शेख हसीना सरकार को हटाने की साज़िश के बाद बांग्लादेश में हुए जिहादी दंगों की भी याद दिलाते हैं, जहाँ मंदिरों को जलाया गया, हिंदू को निशाना बनाया गया।

क्या ममता बनर्जी बांग्लादेशी घुसपैठियों का उपयोग करके बंगाल को बांग्लादेश में बदलने का प्रयास कर रही हैं? आज हिंदू खुद को अपनी ही भूमि में अनाथ महसूस कर रहा है। बंगाल में हिंदू समुदाय डरा हुआ है, और असहाय छोड़ दिया गया है।

हर मुस्लिम आंदोलन क्यों बनता है हिंदू-विरोधी नरसंहार?

यह बड़ा प्रश्न है। चाहे CAA हो, NRC हो, रामनवमी हो, या अब वक्फ संशोधन — हर बार एक विशेष समुदाय हिंसक होता है और हिंदू ही मारे जाते हैं। यह सिर्फ राजनीति नहीं, यह समाज और राष्ट्र के विरुद्ध घोषित युद्ध है।

लेकिन अन्य राज्यों में शांति क्यों?

जब हम पश्चिम बंगाल के बाहर नज़र डालते हैं तो स्थिति बिलकुल अलग है। वक्फ बोर्ड के खिलाफ विरोध प्रदर्शन देश के कई राज्यों में हो रहे हैं। लेकिन असम, जो कि पश्चिम बंगाल का पड़ोसी राज्य है और जिसकी मुस्लिम जनसंख्या 30% से अधिक है — वहाँ एक भी हिंसक घटना नहीं हुई। क्यों? क्योंकि असम सरकार जिम्मेदारी से कार्य कर रही है। वहाँ कानून व्यवस्था को प्राथमिकता दी गई है, और प्रशासन पूरी सजगता से काम कर रहा है। परिणामस्वरूप, वहाँ शांति, स्थिरता और सुशासन बना हुआ है।

उत्तर प्रदेश की बात करें, तो वहाँ भी वक्फ संशोधन को लेकर विरोध जरूर हुआ, लेकिन एक भी हिंसक प्रदर्शन नहीं हुआ। क्योंकि वहाँ की सरकार स्थिति को नियंत्रण में रखने में सफल रही।

तो प्रश्न उठता है – आखिर ममता बनर्जी क्यों राज्य को हिंसा की आग में झोंक रही हैं? क्यों वह एक खास मुस्लिम वर्ग को उकसा रही हैं? क्या यह सब ‘वक्फ संशोधन’ का विरोध है या इसके नाम पर एक सुनियोजित हिंदू-विरोधी हिंसा का प्रयास?

केंद्र सरकार को हस्तक्षेप करना होगा

अब समय आ गया है कि केंद्र सरकार स्थिति की गंभीरता को समझे और तुरंत राष्ट्रपति शासन लागू करे। ममता सरकार को बर्खास्त करना अब राजनीतिक नहीं, संवैधानिक और नैतिक अनिवार्यता बन चुकी है। क्योंकि यह प्रश्न सिर्फ बंगाल का नहीं, पूरे भारत के भविष्य का है। अगर आज बंगाल को बचाया नहीं गया, तो कल कोई भी राज्य इस मजहबी उन्माद की आग में झुलस सकता है।

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