भारत की पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान और पूर्वी पर बांग्लादेश में वर्तमान में कट्टर इस्लामी तत्वों का सत्ता अधिष्ठान पर दबदबा भारत के लिए अनेक प्रकार की चिंताओं की वजह बन रहा है। कभी पाकिस्तान से टूटकर भारत की मदद से अलग देश बने बांग्लादेश में वर्तमान अंतरिम सरकार बीएनपी के कट्टर मजहबी तत्वों के प्रभाव में आकर हर वह प्रयास कर रही है जो भारत के लिए परेशानी खड़ी कर सकते हैं। अपने यहां हिन्दुओं के दमन को अनदेखा करके पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के कथित इशारे पर भारत की सीमा पर मादक पदार्थों की तस्करी और घुसपैठ को बढ़ावा देने के अनेक कृत्य सामने आए हैं। यूनुस के सत्ता के आने के बाद से पाकिस्तान के साथ इस्लाम के नाम पर सरकारों के स्तर पर भी नजदीकियां बढ़ रही हैं जो सवाल खड़ा करती हैं कि दोनों की साठगांठ के पीछे कोई भारत विरोधी योजना तो नहीं है?

हाल के घटनाक्रमों पर नजर डालें तो इस ओर संकेत मिलते हैं। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस ने चीन के साथ भी संबंधों को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। यूनुस ने हाल में चीन को बांग्लादेश में निवेश के लिए आमंत्रित करते हुए भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को “भूमि से घिरे” बताया और खुद को ‘महासागर का रखवाला’ करार दे दिया। चीन को इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का सुझाव देने के पीछे क्या भारत के माथे पर बल डालने के लिए है?

जैसा पहले बताया, पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ते संबंधों को लेकर भी भारत में चिंता बढ़ने लगी है। भारत के विरुद्ध षड्यंत्र रचती आ रही पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई के मुखिया की ढाका यात्रा और दोनों देशों के बीच खुफिया जानकारी साझा करने की ‘संभावनाओं’ ने भारत के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं।
कल इस्लामाबाद में बांग्लादेश के उच्चायुक्त मुहम्मद इकबाल हुसैन खान ने यह कहा है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के संबंधों का “गोल्डन पीरियड” यानी स्वर्णिम काल शुरू हो चुका है। उन्होंने दोनों देशों के बीच व्यापार और सहयोग को बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई। यह बयान ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच उच्चस्तरीय राजनयिक यात्राएं हो रही हैं, जो भारत के लिए रणनीतिक रूप से विशेष गौर का विषय हो सकती हैं।
बांग्लादेश के मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस की नीतियां और बयान भी ‘आईवाश’ अर्थात टालमटोल वाले रहे हैं। यूनुस ने चीन के साथ मिलकर तीस्ता नदी सहित अन्य कई तरह की संधियां करके यह जताने की कोशिश की है उसे विस्तारवादी कम्युनिस्ट ड्रैगन पर ज्यादा भरोसा है, हर आड़े वक्त में उसके काम आए भारत की बजाय। चीन को अपने यहां निवेश के लिए उकसाकर यूनुस कहीं बीजिंग की पहुंच भारत की दहलीज तक कराने को तो बेताब नहीं हैं, भारत के रक्षा विश्लेषकों को इस सवाल को भी खंगालना होगा। अतना ही नहीं, बांग्लादेश में भारत-विरोधी विद्रोही गुटों को अप्रत्यक्ष समर्थन देने के आरोप भी यूनुस सरकार पर लगे हैं।
इसमें संदेह नहीं है कि पाकिस्तान और बांग्लादेश के बीच बढ़ती नजदीकी और बांग्लादेश की भारत-विरोधी नीतियां भारत के लिए रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। इन घटनाओं पर भारत को सतर्क रहकर अपनी कूटनीतिक और सुरक्षा नीतियों को मजबूत करने की आवश्यकता है।
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