ब्रिटिश पुलिस
ब्रिटेन में एक तरफ जहां ग्रूमिंग गैंग्स के जरिये महिलाओं का शोषण हो रहा है, वहीं एक और महिला विरोधी कदम ब्रिटेन की पुलिस ने उठाया है। ब्रिटेन की नेशनल पुलिस चीफ्स काउंसिल (NPCC) ने एक प्रस्ताव दिया है। इस प्रस्ताव में यह कहा गया है कि अब महिलाओं की निर्वस्त्र तलाशी भी वे लोग ले सकेंगे जो जैविक रूप से तो पुरुष हैं, परंतु वे स्वयं को महिला मानते हैं। अर्थात ट्रांस महिलाएं। हालांकि इसको लेकर यह भी शर्त रखी गई कि यदि उनके पास अपने नए ट्रांसफार्मेशन का पहचान प्रमाणपत्र है, तभी वे महिलाओं की निर्वस्त्र तलाशी ले पाएंगी।
डेलीमेल की खबर के अनुसार पिछले वर्ष भी NPCC ने ऐसी नीति बनाई थी, जिसमें जैविक रूप से पुरुष जो खुद को महिला मानते हैं, वे महिलाओं की निर्वस्त्र तलाशी ले सकते हैं, मगर इस नीति का बहुत विरोध हुआ था। इसके बाद इस नीति को वापस लेना पड़ा था। मगर अब जो नई नीति उन्होंने भी देखी है, उसमें लिखा है कि सेनाओं को यह सलाह दी गई है कि यदि वे लोग, जिन्होंने अपनी नई पहचान के संबंध में प्रमाणपत्र हासिल कर लिया है, वे अब महिलाओं की तलाशी ले सकते हैं।
हालांकि इसे लेकर कई और विभाग भी ऐसी नीति बना चुके हैं। ब्रिटिश ट्रांसपोर्ट पुलिस ने भी ऐसे दिशानिर्देश जारी किये थे, मगर महिलाओं के अधिकार समूहों के द्वारा इस नीति को अभी न्यायपालिका में चुनौती दी गई है। और इसकी न्यायिक समीक्षा की जा रही है।
सेक्स मैटर्स नामक संस्था की चीफ एग्जीक्यूटिव माया फोर्सटेटर का कहना है कि सरकार से £5 के भुगतान के बदले में एक कागज का प्रमाणपत्र लेकर एक पुरुष पुलिस अधिकारी को एक महिला पुरुष अधिकारी में नहीं बदला जा सकता है। केवल कोई ड्रेस पहन लेना या फिर लिपस्टिक लगा लेना एक पुरुष को महिला में नहीं बदल सकता है।“
दुर्भाग्य की बात यह है कि नई नीति के दिशानिर्देशों में यह भी संदर्भ है कि यदि किसी महिला कैदी की तलाशी किसी ट्रांस अधिकारी द्वारा की जाती है, तो महिला कैदी द्वारा बोली गई “दुराग्रह पूर्ण भाषा” का सामना कैसे करना है।
दरअसल कई घटनाएं ऐसी हुई थीं, जिनमें महिला कैदियों ने यह आपत्ति जताई थी कि उनकी तलाशी कोई ट्रांस अर्थात पुरुष से महिला बना अधिकारी कैसे ले सकता है? इसके बाद एक लंबी बहस छिड़ी थी और अभी तक चल रही है कि क्या महिलाओं के कोई अधिकार नहीं हैं? ट्रांस अधिकारियों का लगातार यह कहना होता है कि यह उनके अधिकारों का हनन है, कि उन्हें महिला नहीं माना जा रहा है।
कई ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जिनमें ट्रांस कैदियों को महिला जेल में रखा गया तो महिला कैदियों के साथ यौन शोषण हुआ। कई लेसबियन लड़कियों को भी इसलिए ट्रांस महिलाओं के हाथों हिंसा का सामना करना पड़ा था, क्योंकि वे ट्रांस नहीं बल्कि सामान्य लड़कियों के साथ दोस्ती चाहती थीं।
महिलाओं के अधिकारों के लिए लड़ने वाले समूहों का यह कहना है कि ट्रांस महिलाओं द्वारा ऐसे हर कदम महिलाओं के मूलभूत अधिकारों का हनन है। जो लोग ट्रांस महिलाओं द्वारा की गई इन मांगों का विरोध करते हैं कि उन्हें आम महिलाओं के साथ रखा जाए, तो उन्हें ट्रांस महिलाओं के प्रति घृणा फैलाने वाला कहा जाता है। यह कहा जाता है कि उन्हें ट्रांसोफोबिया है।
ब्रिटेन में जो नई नीति बनाई गई है, उसके दिशानिर्देशों में ट्रांस अधिकारियों और ट्रांस कैदियों के स्वास्थ्य और अन्य हितों की बात की गई है, मगर इसमें यह नहीं बताया गया है कि महिला कैदियों पर इस नीति का क्या प्रभाव पड़ेगा, जब उनकी तलाशी जैविक आदमी लेंगे। हालांकि यह नीति अभी लागू नहीं हुई है, इसकी अभी समीक्षा की जा रही है। इसे लेकर सोशल मीडिया पर भी वे लोग मुखर होकर बोल रहे हैं, जो वोक और कम्युनिस्ट एजेंडे के खिलाफ अपनी आवाज लगातार उठाते रहते हैं। वहीं जीबी न्यूज़ के अनुसार कई पुलिस अधिकारी भी इस प्रस्तावित नीति के समर्थन में नहीं हैं। लोग कह रहे हैं कि जेन्डर आइडोलोजी को लागू करने के नाम पर ये लोग कट्टर और उन्मादी हो गए हैं।
वुमन्स राइट्स नेटवर्क के लिए काम करने वाली मिस लार्कमैन का कहना है कि नए दिशानिर्देश दिखाते हैं कि इस देश में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को जेंडर आइडियोलॉजी ने अपनी जकड़ में ले लिया है और वे अपने होश में नहीं हैं। ट्रांस वुमन अर्थात वे पुरुष जो स्वयं को महिला मानते हैं, या फिर जिन्होंने अपनी लैंगिक पहचान के चलते सरकार से प्रमाणपत्र ले लिया है, मगर वे वास्तव में तो पुरुष ही हैं, जब सामान्य महिलाओं की निर्वस्त्र तलाशी लेंगे तो आम महिलाओं पर क्या बीतेगी, इस प्रश्न का उत्तर कहीं नहीं हैं।
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