छत्तीसगढ़

नहीं रहे श्री पांडुरंग मोघे

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री पांडुरंग मोघे का देहांत हो गया। श्री मोघे का जन्म 11 मई, 1931 को जलगांव (महाराष्ट्र) जिले में हुआ था।

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WEB DESK

गत 16 मई को रायपुर (छत्तीसगढ़) में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री पांडुरंग मोघे का देहांत हो गया। श्री मोघे का जन्म 11 मई, 1931 को जलगांव (महाराष्ट्र) जिले में हुआ था। संघ का प्रचारक बनने के लिए उन्होंने 1963 में अच्छी-खासी नौकरी छोड़ दी। उन्हें दमोह (म.प्र.) जिले का जिला प्रचारक का दायित्व दिया गया। उन्होंने आपातकाल के विरोध में चल रहे सत्याग्रह में भाग लिया।

इस कारण उन्हें जेल भी जाना पड़ा। सुदूर महाराष्ट्र से आकर अविभाजित मध्य प्रदेश में रच-बस कर उन्होंने जिस तरह संघ कार्य खड़ा किया, वह राष्ट्र कार्य के प्रति उनकी एकात्मता का प्रेरक उदाहरण है। आज छत्तीसगढ़ में संघ का शायद ही कोई कार्यकर्ता हो जिसके व्यक्तित्व को गढ़ने में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से मोघे जी का योगदान न रहा हो। धमतरी में जिला प्रचारक रहते हुए उन्होंने संघ कार्य की जो नींव रखी उसने कई सेवाभावी कार्यकर्ता गढ़े। उन्होंने समाज के प्रत्येक वर्ग तक सर्वस्पर्शी व सर्वव्यापी रूप में समाज कार्य को खड़ा किया।

मोघे जी रायपुर स्थित संघ के प्रांत कार्यालय ‘जागृति मंडल’ में लगभग 20 वर्ष तक कार्यालय प्रमुख भी रहे। प्रांत भर के कार्यकर्ताओं से उनका अपनत्व था। स्वास्थ्य ठीक न होने पर भी राष्ट्र कार्य के प्रति उनकी गतिशीलता में कोई कमी नहीं थी। स्वास्थ्य ठीक न होने के बाद भी उन्होंने व्हीलचेयर पर बैठकर 7 मई को मतदान किया था।

मोघे जी संयमित आचरण की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। उनसे जो भी मिलता था, उससे वे कार्यकर्ताओं का हाल-चाल अवश्य पूछते थे और उनसे मिलने के लिए प्रेरित करते थे। वे बस एक बार भोजन करते थे। पूरी मितव्ययता अपनाते थे। वे जब तक स्वस्थ रहे तब तक साइकिल से प्रवास करते रहे। संघ के गृहस्थ कार्यकर्ताओं के बीच उनका यह वाक्य अत्यंत प्रेरणादायी है कि समाज का कार्य परिवार के साथ संतुलन बनाकर ही किया जाना चाहिए, किंतु ध्यान रहे, परिवार की ओर पीठ और समाज की ओर मुंह हो।

संसाधनों का समुचित और संतुलित उपयोग उनकी जीवनशैली में था। वे कार्यालय में बचे भोजन, सब्जी के छिलके इत्यादि को नियमित रूप से एकत्र करते और पास में विचरण करने वाले मवेशियों को स्वयं खिलाते। वे कहते थे कि समाज ने सुई-धागा भी दिया है तो समाज-हित में उसका ऐसा प्रबंधन हो जिससे कि अधिकतम लोगों को लाभ हो। उन्हें राह चलते बटन या कोई पिन भी मिल जाता था, तो उसे वे संभालकर रखते और उपयोग में लाते थे। आपातकाल के सत्याग्रही के नाते मोघे जी को राज्य सरकार की योजना से जो सम्मान निधि प्राप्त होती थी, उसे भी वे सामाजिक प्रकल्पों में दान कर देते थे। ऐसे कार्यकर्ता को पाञ्चजन्य परिवार की ओर से भावभीनी श्रद्धांजलि।

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