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होम भारत अंडमान और निकोबार द्वीप

सिर्फ शब्दों तक सीमित नहीं है ‘जय अनुसंधान’

नवाचार के विभिन्न पैमानों पर हमारे देश का आगे बढ़ते दिखाई देना सुखद तो है ही, इस बात की तरफ भी संकेत करता है कि देश में अनुसंधान, विकास और नवाचार के पक्ष में धीरे-धीरे माहौल बन रहा है

by बालेन्दु शर्मा दाधीच
Nov 4, 2023, 10:55 am IST
in अंडमान और निकोबार द्वीप, विज्ञान और तकनीक
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 पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने स्व. लाल बहादुर शास्त्री के दिये इस नारे में ‘जय विज्ञान’ को जोड़ा था तो श्री मोदी के दिये नये शब्दों के बाद यह हो गया- ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान’।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि में अनुसंधान और नवाचार की कितनी महत्ता है, वह इस बात से जाहिर होता है कि उन्होंने ‘जय जवान, जय किसान’ के नारे में ‘जय अनुसंधान’ को जोड़ा था। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. अटल बिहारी वाजपेयी ने स्व. लाल बहादुर शास्त्री के दिये इस नारे में ‘जय विज्ञान’ को जोड़ा था तो श्री मोदी के दिये नये शब्दों के बाद यह हो गया- ‘जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान, जय अनुसंधान’।

भले ही यह सांकेतिक या प्रतीकात्मक दिखाई दें लेकिन ऐसे नारों तथा उनके भीतर छिपे संदेश का प्रभाव गांव-गांव तक जाता है। बात सिर्फ नारों तक सीमित नहीं है बल्कि अनुसंधान के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता सरकारी प्राथमिकताओं, फंडिंग और योजनाओं में भी झलकती है। इतना ही नहीं, आज हमें जमीनी स्तर पर इसके परिणाम भी दिखाई देने लगे हैं।

सरकार ने विकास और अनुसंधान के क्षेत्र में निवेश को निरंतर बढ़ाया है। सन् 2020 में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का लगभग 0.8 प्रतिशत हिस्सा अनुसंधान के लिए रखा गया था। हमारे जैसे देश की सीमाओं को देखते हुए यह एक ठोस आंकड़ा है। हालांकि हमें यह स्वीकार करना होगा कि यह अब भी वैश्विक औसत (1.7 प्रतिशत) की तुलना में लगभग आधा ही है और इसमें निरंतर वृद्धि लाजिमी है।

ऐसे में नवाचार के विभिन्न पैमानों पर हमारे देश का आगे बढ़ते दिखाई देना सुखद तो है ही, इस बात की तरफ भी संकेत करता है कि देश में अनुसंधान, विकास और नवाचार के पक्ष में धीरे-धीरे माहौल बन रहा है। सरकारी और निजी क्षेत्रों के प्रयास रंग ला रहे हैं और युवाओं के बीच भी अभिरुचि पैदा हो रही है। किंतु यह सब अनायास नहीं हो गया है।

किसी जमाने में ‘बौद्धिक संपदा अधिकार’ जैसी शब्दावली हमारे लिए एक पहेली के समान हुआ करती थी लेकिन ऐसे अधिकार नये भारत की हकीकत हैं। सन् 2016 में भारत में बौद्धिक संपदा अधिकार नीति लागू की गयी थी। इसके तहत हुए कई सुधारों की झलक इन तथ्यों में दिखती है कि पेटेन्ट की जांच का समय जो पहले सात साल हुआ करता था, को घटाकर 18 महीने पर लाया जा चुका है और, ट्रे़डमार्क आवेदनों की जांच का समय 13 महीने से घटाकर एक महीने पर लाया जा चुका है।

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन’ आजादी के सौ साल बाद 2047 में भारत का कद क्या होने वाला है, इस तरफ संकेत करता है। यह कानून, जिसकी परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है, भारत के विकसित देशों की चुनिंदा लीग में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त करेगा।

सरकार ने वर्षों से अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए हैं। सन् 1971 में स्थापित विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), देश में विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रोत्साहित करने के लिए जिम्मेदार है। डीएसटी शोध और विकास परियोजनाओं के लिए वित्त प्रदान करता है और अनुसंधान संस्थानों और टेक्नोलॉजी पार्कों की स्थापना को भी बढ़ावा देता है।

इसी तरह, सन् 1942 में स्थापित वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) अनुसंधान और विकास के मामले में देश के सबसे बड़े संगठनों में से एक है। सीएसआईआर ने विमानन, जैव प्रौद्योगिकी और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में महत्वपूर्ण योगदान किया है।

पिछले 9 अगस्त को संसद में पारित किये गये अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (एनआरएफ) विधेयक, 2023 से अब तक के प्रयासों, निवेश, नीतियों और कार्यक्रमों को बल मिलेगा। यह कानून बनने के बाद भारत ऐसे गिने-चुने देशों की सूची में आ गया है जहां पर अनुसंधान और विकास को इतनी गंभीरता और महत्ता के साथ देखा जा रहा है।

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा है कि ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन’ आजादी के सौ साल बाद 2047 में भारत का कद क्या होने वाला है, इस तरफ संकेत करता है। यह कानून, जिसकी परिकल्पना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की है, भारत के विकसित देशों की चुनिंदा लीग में शामिल होने का मार्ग प्रशस्त करेगा।
(लेखक माइक्रोसॉफ्ट एशिया में डेवलपर मार्केटिंग के प्रमुख हैं)

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