पुण्यतिथि विशेष: एकात्म दर्शन सदैव प्रासंगिक है
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पुण्यतिथि विशेष: एकात्म दर्शन सदैव प्रासंगिक है

Written byPanchjanyaPanchjanya
Feb 11, 2021, 10:55 am IST
inसंघ @100

अजातशत्रु पंडित दीनदयाल उपाध्याय का शताब्दी वर्ष 2016 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में मनाया गया। वे 20 वीं शताब्दी के वैचारिक युग पुरुष थे। उन्होंने भारत के जन-गण-मन का मर्म जाना था। वे एकात्म मानव दर्शन के प्रणेता थे। उन्होंने विश्व को यह दर्शन दिया

इस दर्शन में आज भारत की संस्कृति और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के साथ-साथ मानव को केंद्र-बिंदु में रखकर ही समाज व्यवस्थापन की प्रेरणा मिलती है। दीनदयाल जी कल भी प्रासंगिक थे, आज भी प्रासंगिक है , और आगे भी भी प्रासंगिक रहेंगे। एकात्म मानव तात्कालिक जनसंघ और भाजपा के लिए नहीं वरण विश्व की मानव सभ्यता और संस्कृति के लिए एक पाथेय है। उनके उदगार से उत्पन्न विचार के कुछ बिंदु हम यहां रख रहे हैं।
जनसंघः एक ऐतिहासिक आवश्यकता

विश्व का ज्ञान हमारी थाती है। मानव-जाति का अनुभव हमारी संपति है। विज्ञान किसी देश विशेष की बपौती नहीं। वह हमारे भी अभ्युदय का साधन बनेगा। किंतु भारत हमारी रंगभूमि है। भारत की कोटि-कोटि जनता पात्र ही नहीं, प्रेक्षे भी है, जिसके रंजन एवं आत्मसुख के लिए हमें सभी भूमिकाओं का निर्धारण करना है। विश्व-प्रगति के हम केवल द्रष्टा ही नहीं, साधक भी है। अतः जहां एक ओर हमारी दृष्टि विश्व की उपलब्धियों पर हो, वहीं दूसरी ओर हम अपने राष्ट्र की मूल प्रकृति, प्रतिभा एवं प्रवृति को पहचानकर अपनी परंपरा और परिस्थिति के अनुरूप भविष्य के विकास-क्रम का निर्धारण करने की अनिवार्यता को भी न भूलें। स्व के साक्षात्कार के बिना न तो स्वतंत्रता सार्थक हो सकती और न वो कर्म चेतना ही जागृत हो सकती है, जिसमें परावलंबन और पराभूति का भाव न होकर स्वाधीनता, स्वेच्छा और स्वानुभवजनित सुख हो। अज्ञान, अभाव तथा अन्याय की परिसम्पति और सदृढ़, समृद्ध, सुसंस्कृत एवं सुखी राष्ट्र-जीवन का शुभारंभ सबके द्वारा स्वेच्छा से किए जाने वाले कठोर श्रम तथा सहयोग पर निर्भर है। यह महान कार्य राष्ट्र-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में एक नए नेतृत्व की अपेक्षा रखता है। भारतीय जनसंघ का जन्म इसी अपेक्षा को पूर्ण करने के लिए हुआ है।

भारतीय सांस्कृतिक अधिष्ठान की अपरिहार्यता
लोकतंत्र, समानता, राष्ट्रीय स्वतंत्रता तथा विश्व शांति परस्पर संबद्ध कल्पनाएं हैं। किंतु पाश्चात्य राजनीति में इनमें कई बार टकराव हुआ है। समाजवाद और विश्व-शासन के विचार भी इन समस्याओं के समाधान के प्रयत्न से उत्पन्न हुए हैं पर वे कुछ नहीं कर पाए। उलटे मूल को धक्का लगाया है और नई समस्याएं पैदा की हैं। भारत की सांस्कृतिक चिंतन ही तात्विक अधिष्ठान प्रस्तुत करता है। जिससे उपर्युक्त भावनाएं समन्वित हो वांछनीय लक्ष्यों की सिद्धि कर सकें। इस अधिष्ठान के अभाव में मानव-चिंतन और विकास अवरूद्ध हो गया है। भारतीय तात्विक सत्यों का ज्ञान देश और काल से स्वतंत्र है। यह ज्ञान केवल हमारी ही नहीं वरन् पूर्ण संसार की प्रगति की दिशा निश्चित करेगा।

एकात्म दर्शन
भारतीय संस्कृति एकात्मवादी है। सृष्टि की विभिन्न सत्ताओं तथा जीवन के विभिन्न अंगों के दृश्य-भेद स्वीकार करते हुए वह उनके अंतर में एकता की खोज कर उनमें समन्वय की स्थापना करती है। परस्पर विरोध और संघर्ष के स्थान पर व परस्परावलंबन, पूरकता, अनुकूलता और सहयोग के अधार पर सृष्टि की क्रियाओं का विचार करती है। वह एकांगी न होकर सर्वांगीण है। उसका दृष्टिकोण सांप्रदायिक अथवा वर्गवादी न होकर सर्वात्मक एवं सर्वात्कर्षवादी है। एकात्मकता उसकी धुरी है।

व्यष्टि और समष्टि
व्यष्टि और समष्टि के बीच संघर्ष की कल्पना कर दोनों में से किसी एक को प्रमुख एवं संपूर्ण क्रियाओं का अंतिम लक्ष्य मानकर पश्चिम में अनेक विचारधाराओं का जन्म हुआ है।किंतु दृश्य व्यक्ति अदृश्य समष्टि का भी प्रतिनिधित्व करता है। ‘अहं’ के साथ ‘वयं’ की सत्ता भी प्रत्येक अहं के द्वारा जीती है। प्रत्येक ईकाई में समुदाय की प्रवृति परिलक्षित होती है। व्यक्ति ही समष्टि के उपकरण है, उसके ज्ञान-तंतुब है। व्यक्ति के विनाश या अविकास से समष्टि पंगु हो जाएगी। व्यक्ति की साधना समष्टि की अराधना से भिन्न नहीं हो सकती। शरीर को क्षति पहुंचाकर कोई अंग कैसी सुखी हो सकता है। फूल का अस्तित्व पंखुड़ियों की शोभा तथा जीवन की सार्थकता पुष्प् के साथ रहकर उसके स्वरूप बनाने और निखारने में है। व्यक्ति-स्वातंत्रय और समाज-हित के बीच कोई विरोध नही है।
पुरूषार्थ चतुष्ट्य
व्यक्ति के विकास और समाज के हित का संपादन करने के उद्देश्य से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार पुरूषार्थ की कल्पना की गई है। धर्म, अर्थ और काम एक-दूसरे के पूरक और पोषक हैं। मनुष्य की प्रेरणा का स्त्रोत तथा उसके कार्यों का मापक किसी एक को ही मानकर चलना अधूरा होगा। फिर भी अर्थ और काम की सिद्धि का साधन है धर्म, अतः वह अधारभूत है।

धर्म का स्वरूप
कई बार धर्म को मत या मजहब मानकर उसके गलत अर्थ लगाए जाते हैं। यह भूल अंग्रेजी के रिलीजन शब्द का अनुवाद धर्म करने के कारण हुई है। धर्म का वास्तिविक अर्थ है- वे सनातन नियम, जिनके आधार पर किसी सत्ता की धारणा हो और जिनका पालन कर व्यक्ति अभ्युदय और निःश्रेयस की प्राप्ति कर सके। धर्म के मूल तत्व सनातन है, किंतु उनका विवरण देश काल परिस्थिति के अनुसार बदलता है। इस संक्रमणशील जगत् में धर्म ही वह तत्व है, जो स्थायित्व लाता है। इसलिए धर्म को ही नियंता माना गया है। प्रभुता उसी में निहित है।

राष्ट्र की आत्मा-चिति
समाज केवल व्यक्तियों का समूह अथवा समुच्चय नहीं, अपितु एक जीवंत सावयव सत्ता है। भूमि विशेष के प्रति मातृ-भाव रखकर चलनेवाले समाज से राष्ट्र बनता है। प्रत्येक राष्ट्र की अपनी एक विशेष प्रकृति होती है, जो ऐतिहासिक अथवा भौगोलिक कारणों का परिणाम नहीं, अपितु जन्मजात है। इसे चिति कहते हैं। राष्ट्रों का उत्थान-पतन चिति के अनुकूल अथवा प्रतिकूल व्यवहार पर निर्भर करता है। विभिन्न विशिष्टताओं वाले राष्ट्र परस्पर पूरक होकर मानव एकता का निर्माण कर सकते हैं। राष्ट्रों की प्रकृति मानव एकता की विरोधी नहीं, यदि कहीं उसके विरूद्ध आचरण दिखता है तो वह विकृति का द्योतक है। राष्ट्रों का विनाश कर मानव एकता उसी प्रकार असंभव तथा अवांछनीय है, जिस प्रकार व्यक्तियों को नष्ट कर समष्टि का अस्तित्व या विकास।

चिति की अभिव्यक्ति के उपकरण
समाज की चिति स्वयं को अभिव्यक्ति करने तथा व्यक्तियों को विभिन्न पुरूषार्थों के संपादन की सुविधा प्राप्त कराने के लिए अनेक संस्थाओं को जन्म देती है। समाज में इनकी वही स्थिति है, जो शरीर में विभिन्न अंगों की। जाति, वर्ण, पंचायत, संप्रदाय, संघ, पूग, विवाह, संपत्ति, राज्य आदि इसी प्रकार की संस्थांए हैं। राज्य महत्वपूर्ण है, किंतु सर्वोपरि नहीं।

हमारी संस्कृति
जब हम संगठन का कार्य करने चले हैं तो हमें अपने समाज से जोड़नेवाली चीज हमारी संस्कृति है। उसका विचार करना पड़ता है। आजकल कई लोग पूछते है कि आप किस ‘वाद’ में विश्वास करते है? हम किसी वाद को नहीं मानते। हम तो हिंदू संस्कृति अथवा भारतीय विचार में विश्वास करते है। फिर वे कहते हैं कि हम आधुनिक वादों समाजवाद, पूंजीवाद, अराजकता, अधिनायकवाद आदि मे से किस पर विश्वास करते हैं ? तो इनमें से किसी में भी नहीं ये सब बाहर की उपज है। विदेशों में लोगों ने मुझसे पूछा, आप बीयर पीयेंगे या शैंपेन? ये दोनों भिन्न प्रकार की शराब है। लेकिन मैनें दोनो का निषेध किया। इसी प्रकार अपने देश में कुछ लोग कहते हैं कि आप पूंजीवाद में विश्वास करते है। हम कहते हैं नहीं, तो कहते हैं साम्यवाद में करते होंगे ? यह माना जाता है कि इन दोनों मे सबकुछ है। यह सत्य नहीं है। संसार में इनके अलावा दूसरे विचार भी हैं। ये सब ‘वाद’ बाहर के हैं। हम तो अपनी चीज को मानते है।

वैसे हम सत्य को सब जगह से ग्रहण कर लेते हैं। क्योंकि सत्य किसी स्थान विशेष का नहीं होता। जैसे हमने रेलगाड़ी को स्वीकार किया। परंतु पश्चिम के जितने भी दर्शन है, वे अधूरे हैं वे संपूर्ण जीवन का विचार नहीं करते, किसी एक अंग का विचार करते हैं। इसलिए हम उनको स्वीकार नहीं करते। हमारी संस्कृति की यही सबसे बड़ी विशेषता है कि इसमें जीवन का संपूर्ण विचार किया गया है।

वर्तमान भाजपा नेताओं में आडवाणी जी, डॉ. जोशी जी सहित कुछ अन्य लोग पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के साथ काम किए होंगे। पर अधिकतर लोग जो आजादी के बाद की पीढ़ी में पैदा हुए ,वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में काम कर रहे हैं। अच्छी बात यह है कि नरेंद्र मोदी अपनी आंखों के सामने पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन एवं अंत्योदय के सपने साकार कर रहे हैं। इससे यह लगता है कि दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा से जुड़े लोग सत्ता में आने के बाद भी उन विचारों को जमीनी स्तर क्रियान्वयन करने में नित्य नए-नूतन निर्णय ले रहे हैं। यही कारण है कि वर्तमान सरकार से भारत का जन-जन जुड़ा हुआ है और अधिकतर लोग कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की सरकार दीनदयाल जी के सपनों को साकार करने की दिशा में रात-दिन जुटी हुई है। उनका सपना था समाज के अंतिम पंक्ति के अंतिम व्यक्ति को अपने जीवन पर गर्व हो और वह ऊंचे स्वर में कह सके कि मुझे भारतीय होने पर गर्व है।
( लेखक पूर्व सांसद व् पूर्व भाजपा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं )

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