हिन्दी काव्य में राष्ट्रीय जागृति के स्वर
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हिन्दी काव्य में राष्ट्रीय जागृति के स्वर

by
Dec 8, 2007, 12:00 am IST
in Archive
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दिंनाक: 08 Dec 2007 00:00:00

मैं बलि-पथ का अंगारा हूं-शैवाल सत्यार्थीभारत की अभिशप्त-पराधीनता एवं पराभव की दुर्भाग्यपूर्ण घड़ियों में मां-भारती के अलमस्त-गायक कवियों ने समय-समय पर मूक राष्ट्रीय चेतना को क्रांति तथा विद्रोह के प्रलयंकारी स्वर प्रदान किये हैं। कवि अपने युग का प्रतिनिधि होता है और उसका साहित्य, उसके समाज का दर्पण। इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतीय स्वातंत्र्य संग्राम में हिन्दी-साहित्य का कितना अधिक योग रहा है। यही वह समय था, जब साहित्य से जन-मानस प्रेरणा ग्रहण करता था। वैसे तो निराशा की घड़ियों में साहित्य सदैव प्रेरक रहता आया है। भारत में हुई क्रांति का इतिहास ही क्या, फ्रांस और रूस में हुई क्रांतियां भी इस बात की साक्षी हैं कि वहां इस कार्य के लिए साहित्य ने कितना अधिक योग प्रदान किया है।हिन्दी- साहित्य में सर्वप्रथम भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की ओजस्वी वाणी में हमें जागृति की युगान्तरकारी भावना का आभास मिलता है। भारतेन्दु जी के साहित्य-दर्पण में अचेतन भारतीय समाज की सचेतन आत्मा करवटें लेती है-कहां करुणानिधि केशव सोये?जागत नाहिं, अनेक जतन कर भारतवासी रोये।।पं. श्रीधर पाठक ने देश-प्रेम की इस उत्कट भावना को और भी आगे बढ़ाया-जय-जय प्यारा, जग से न्याराशोभित सारा, देश हमाराजगत-मुकुट, जगदीश दुलाराजय सौभाग्य, सुदेश।जय-जय प्यारा भारत देश।महाकवि जयशंकर प्रसाद की अप्रतिम वाणी ने भारतीय स्वातंत्र्य का एक नूतन इतिहास रच दिया-हिमाद्रि तुंग श्रंृग से, प्रबुद्ध शुद्ध भारतीस्वयंप्रभा समुज्ज्वला, स्वतंत्रता पुकारती!अमत्र्यवीर पुत्र हो, दृढ़-प्रतिज्ञ सोच लोप्रशस्त पुण्य पंथ है, बढ़े चलो, बढ़े चलो!!और फिर, राष्ट्र-कवि श्री मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी अमर-कृति “भारत-भारती” द्वारा देश का राष्ट्रीय मंत्रणा के लिए आह्वान किया-हम कौन थे, क्या हो गये हैं और क्या होंगे अभी?आओ, विचारें आज मिलकर, ये समस्याएं सभी।।देश की पराधीनता और ब्रिटिश नौकरशाही के अत्याचारों से, कवियों के शान्त, सरस तथा निस्तब्ध काव्याकाश पर- तूफानी बिजलियां तड़तड़ाने लगीं। देश की मिट्टी ने फिर से एक बार अंगड़ाई ली। “एक भारतीय आत्मा” के अज्ञात वेश में श्री माखनलाल चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय विद्रोह का शंखनाद किया-सूली का पथ ही सीखा हूं, सुविधा सदा बचाता आया।मैं बलि-पथ का अंगारा हूं, जीवन-ज्वाल जगाता आया।एक पुष्प के रूप में उनका क्रांतिदर्शी -ह्मदय भी, राष्ट्र की बलिवेदी पर हंसते-हंसते बलिदान हो जाने के लिए मचल उठता है-मुझे तोड़ लेना वनमाली, उस पथ में देना तुम फेंक।मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।भारतमाता के नौनिहाल, सिर-कफन बांधकर “वन्देमातरम्” का महामंत्र लेकर उठ खड़े हुए। यह वह समय था, जबकि देश के कोने-कोने में क्रांति के शोले दहक उठे थे। ज्वालामुखी के भीतर लावा सुलग रहा था, किन्तु बाहर उठता हुआ धुआं बता रहा था कि भीषण विस्फोट होने ही वाला है। ऐसे में श्री जगन्नाथ प्रसाद “मिलिंद” ने राष्ट्र के यौवन को बलि-पथ पर अग्रसर होने की प्रेरणा दी-तुम नहीं डराये जा सकते शस्त्रों से, अत्याचारों से।तुम नहीं सुलाये जा सकते थपकी से, प्यार-दुलारों से।हिन्दी के भावुक सुकुमार कवि श्री सुमित्रानन्दन पंत के सुकोमल कंठ से भी, क्रांति की स्वर-गंगा फूट निकली-इधर अड़ा साम्राज्यवाद, शत-शत विनाश के ले आयोजन, उधर प्रतिक्रिया रुद्ध शक्तियां, क्रुद्ध दे रहीं युद्ध-निमंत्रण!सत्य-न्याय के बाने पहने, सत्व लुब्ध लड़ रहे राष्ट्र-गण,सिन्धु तरंगों पर क्रय-विक्रय, स्पर्धा उठ-गिर करती नर्तन!श्री बालकृष्ण शर्मा “नवीन”, हमारी इस राष्ट्रीय परम्परा के प्रमुख कवि हैं। उनका आध्यात्मवाद विद्रोह पर उठता है, वह गरज उठते हैं-आज खड्ग की धार कुंठिता, है खाली तूणीर हुआ।विजय-पताका झुकी हुई है, लक्ष्य-भ्रष्ट यह तीर हुआ।”पौरुष के पूंजीभूत ज्वाल” श्री रामधारी सिंह “दिनकर” ने नई सांस्कृतिक राष्ट्रीय जागृति की नई तान छेड़ी-मेरे नगपति, मेरे विशाल!साकार-दिव्य गौरव विराट, पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल।मेरी जननी के हिम-किरीट, मेरे भारत के दिव्य-भाल।ओ मदहोश! बुरा फल हो, शूरों के शोणित पीने का।देना होगा तुझे एक दिन, गिन-गिन मोल पसीने का।मंजिल दूर नहीं अपनी, दुख का बोझा ढोने वाले।लेना अनिल-किरीट भाल पर, ओ आशिक होने वाले!हिन्दी के जागरूक एवं क्रांतिकारी कवि डा. शिवमंगल सिंह “सुमन” की लौह-लेखनी ने स्याही नहीं, आग उगली-दूर बैठकर ताप रहा है, आग लगाने वाला!मेरा देश जल रहा, कोई नहीं बुझाने वाला!भगतसिंह, अशफाक, लालमोहन, गणेश बलिदानी।सोच रहे होंगे, हम सबकी, व्यर्थ गई कुर्बानी।श्री सोहनलाल द्विवेदी ने भी क्रांति के स्वर में अपना स्वर मिलाया-जब ह्मदय का तार बोले, श्रृंखला के बन्द खोले,हों जहां बलि शीश अगणित,एक सिर मेरा मिला लो!वन्दना के इन स्वरों में, एक स्वर मेरा मिला लो!इतना ही नहीं, अपनी पराधीनता की श्रृंखला में आबद्ध, घायल भारतमाता की करुण-कराहों ने, साहित्य की शान्त-सुकोमल प्रतिमा श्रीमती सुभद्रा कुमारी चौहान को क्रांति एवं युद्ध की देवी दुर्गा बना दिया। दासता की बेड़ियां काटने के लिए पुरुष ने ही नहीं, नारी ने भी तलवार उठाई और उनके शब्द शोले बन गये-मेरा बंधु, मां की पुकारों को सुनकर के,तैयार हो जेलखाने गया है-कि छीनी हुई मां की स्वाधीनता को,वह जालिम के घर से लाने गया है!उनकी यह अमर और आग्नेय पंक्तियां, सात समुद्र पार विदेशी-सौदागरों की हवेलियों को थर्रा रहीं थीं-जाओ रानी! याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासीयह तेरा बलिदान, जगावेगा स्वतंत्रता अविनाशीहोते चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फांसीहो मदमाती विजय मिटा दे, गोलों से चाहें झांसी तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थीखूब लड़ी मरदानी वह तो, झांसी वाली रानी थी।और फिर 15 अगस्त 1947-नये युग की नई-चेतना के सजग प्रहरी कविवर श्री गोपाल दास “नीरज” ने निर्माण तथा शान्ति के गीतों में, अशांति और विध्वंस को खुली चुनौती दी-अब हो जाओ तैयार साथियो! देर न हो-दुश्मन ने फिर, बारुदी बिगुल बजाया है!बेमौसम फिर, इस नये चमन के फूलों पर-सर-कफन बांधने वाला मौसम आया है!27

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