
महाराष्ट्र की संस्कृति में गणपति का विशेष स्थान है। जिस प्रकार हमारी सनातन हिन्दू संस्कृति में भगवान शिव के द्वादश (12) ज्योतिर्लिंगों के प्रति श्रद्धालुओं की विशेष आस्था है; ठीक वैसे ही महाराष्ट्र के अष्ट विनायक भी हिन्दू धर्मावलम्बियों की आस्था के प्रमुख केंद्र हैं। महाराष्ट्र में पुणे के आसपास के सवा सौ किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित मंगलमूर्ति गणेश के आठ पवित्र मंदिर अष्ट विनायकों के नाम से विख्यात हैं। इन पुराण कालीन मंदिरों में विराजित गणेश की प्रतिमाएं स्वयंभू (स्वयं प्रगट) मानी जाती हैं। गणपति बप्पा के वंदन-आराधन की पुनीत बेला में प्रतिवर्ष भारी संख्या में श्रद्धालु महाराष्ट्र के इन सिद्ध तीर्थों की यात्रा करते हैं। गणपति आराधकों की मान्यता है कि इस पुण्य तीर्थयात्रा का सुयोग उन्हीं को मिलता है जिन पर गणपति की विशेष कृपा होती है। गणेशोत्सव के पावन अवसर पर प्रस्तुत हैं गणपति बप्पा के इन सिद्ध तीर्थों से जुड़ी रोचक पौराणिक जानकारियां-
पुणे से 80 किलोमीटर दूर मोरेगांव स्थित अष्ट विनायकों में प्रथम श्री मयूरेश्वर तीर्थ गणेशजी की पूजा का महत्वपूर्ण केंद्र है। इसी स्थान पर गणेशजी ने मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर नामक राक्षस का वध किया गया था। इसी कारण यह तीर्थ मयूरेश्वर विनायक के रूप में प्रसिद्ध है। यहाँ बैठी मुद्रा में विराजमान चारभुजी गणेश प्रतिमा के तीन नेत्र हैं तथा सूंड बायीं ओर है। मंदिर के चारों कोनों में निर्मित प्रस्तर स्तम्भ चार युगों; सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग के प्रतीक माने जाते हैं। मंदिर के द्वार पर बनी शिव वाहन नंदी की मूर्ति का मुंह भगवान गणेश की मूर्ति की ओर है। कहा जाता है कि प्राचीन काल में शिवजी और नंदी एक बार यहाँ आये थे, लेकिन बाद में नंदी ने यहां से जाने के लिए मना कर दिया। तभी से नंदी और मूषक दोनों ही इस मंदिर के रक्षक के रूप में तैनात हैं।
पुणे से करीब 200 किमी दूरी पर भीम नदी के किनारे एक पहाड़ की चोटी पर बना सिद्धि विनायक मंदिर ‘सिद्धटेक’ नाम से भी जाना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में स्थापित गणेशजी की तीन फीट ऊंची और ढाई फीट चौड़ी उत्तर मुखी मूर्ति में भगवान गणेश की सूंड दाईं ओर मुड़ी हुई है। दाईं सूंड वाले ये गणपति अत्यंत शक्तिशाली माने जाते हैं। मधु व कैटभ दैत्यों से युद्ध में विजय पाने के लिए भगवान विष्णु ने इसी सिद्धक्षेत्र में गणपति जी की आराधना कर सिद्धियां प्राप्त की थीं। मंदिर के वर्तमान गर्भगृह का निर्माण महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने कराया था। जबकि मंदिर का मुख्य मार्ग पेशवा के सेनापति हरि पंत फड़के ने बनवाया था।
मुंबई-पुणे हाइवे के किनारे बसे पाली गाँव का बल्लालेश्वर विनायक मंदिर गणेश के परम भक्त बालक बल्लाल के नाम से जाना जाता है। पौराणिक कथा है कि प्राचीन काल में बल्लाल नामक एक भक्त बालक ने एक बार अपने दोस्तों के साथ मिलकर पाली गांव में गणेश जी की विशेष पूजा का आयोजन किया था। यह पूजा कई दिनों तक चली; इस कारण पूजा में शामिल बच्चे कई दिनों तक अपने घर नहीं गये। इस बात से नाराज होकर उन बच्चों के माता-पिता ने बालक बल्लाल को मार-पीट कर गणेश प्रतिमा के साथ पास के जंगल में फेंक दिया। किन्तु घायल अवस्था में भी बल्लाल गणेश मंत्र का जप करता रहा। तब उसकी गहन भक्ति से प्रसन्न होकर गणेशजी ने उसे दर्शन दिए और उसके कहने पर सदा के लिए वहीं विराजमान हो गये। तभी से यह मंदिर बल्लालेश्वर विनायक के नाम से विख्यात हो गया।
महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के कोल्हापुर क्षेत्र में सुन्दर पर्वतीय गांव महाड़ में स्थित श्रीवरद विनायक वरदान देने वाले देव के रूप में पूजे जाते हैं। कहा जाता है कि यहाँ स्थापित स्वयंभू गणेश प्रतिमा सन 1690 ईस्वी में पास की एक झील से प्राप्त हुई थी। प्राचीन काल में ऋषि गृत्समद ने इस क्षेत्र में घोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश उनकी प्रार्थना पर वरदान स्वरूप सदा के लिए इस स्थान पर विराजमान हो गए। मान्यता है कि यहाँ आने वाले भक्तों की समस्त मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण हो जाती हैं। कहते हैं कि सन 1892 से एक तेल का दीपक (नंददीप) इस मंदिर में लगातार प्रज्वलित है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण वर्ष 1725 ईस्वी में सूबेदार रामजी महादेव बिवालकर ने करवाया गया था।
पुणे जिले के हवेली तालुका क्षेत्र के थेऊर गाँव में चिंतामणि गणपति मंदिर तीन नदियों भीम, मुला और मुथा के पवित्र संगम पर स्थित है। अपने चिंतित मन को शांत करने के लिए सृष्टिकर्ता भगवान ब्रहमा ने इसी स्थान पर तपस्या की थी। तभी से यह सिद्ध तीर्थ चिंता से मुक्त करने वाले मंदिर के नाम से समूचे क्षेत्र में विख्यात है। यहां शीश नवाने वाले भक्त सहज ही हर चिंता व तनाव से मुक्त हो जाते हैं। इस तीर्थ से जुड़े पौराणिक कथानक के अनुसार कपिल मुनि के पास ‘चिंतामणि’ नामक एक दिव्य रत्न था जो इच्छाएं पूरी करता था। किन्तु गुण नामक एक असुर ने उसे चुरा लिया था। तब भगवान गणेश ने असुर को परास्त कर यह रत्न उन्हें वापस दिलाया। किन्तु कपिल मुनि ने वह रत्न भगवान गणेश के गले में पहना दिया और उनकी प्रार्थना पर वे वहां ‘चिंतामणि विनायक’ के रूप में विराजमान हो गये। पूर्व दिशा की ओर उन्मुख इन चिंतामणि गणपति की मूर्ति की सूँड बाईं तरफ है। मूर्ति की आकर्षक आँखों में कीमती रत्न जड़े हैं। इस प्राचीन मंदिर का जीर्णोद्धार और यहाँ का सभा-मंडप का निर्माण श्रीमंत माधवराव पेशवा प्रथम ने कराया था।
श्री गिरिजात्मज विनायक पुणे-नासिक राजमार्ग पर पुणे से करीब 90 किलोमीटर दूर जुन्नार तालुका में नारायण गांव के निकट लेण्याद्री की पहाड़ियों पर प्राचीन गुफाओं के बीच स्थित हैं। गिरजात्मज विनायक का अर्थ है गिरिजा यानी माता पार्वती के पुत्र गणेश। यहाँ भगवान गणेश बाल रूप में विराजमान हैं। इन्हीं के नाम पर इन गुफाओं को गणेश गुफा भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि देवी पार्वती ने यहीं तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें गणेश जी की संतान का जन्म हुआ। यह एक अत्यंत अनूठा मंदिर है जहाँ बौद्ध गुफाएँ और एक हिंदू मंदिर साथ-साथ मौजूद हैं। इस मंदिर की वास्तुकला विशिष्ट बौद्ध शैली की है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 300 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं।
महाराष्ट्र के पुणे जिले के ओझर (जुन्नर तालुका) में स्थित विघ्नेश्वर विनायक जीवन की विघ्न-बाधाओं का नाश करने वाले देवता के रूप में पूजे जाते हैं। प्राचीन काल में भगवान गणेश ने इसी स्थान पर विघ्नासुर नामक असुर को पराजित किया था। तभी से वे “विघ्नेश्वर” नाम से पूजे जाने लगे। विघ्नेश्वर विनायक की मूर्ति की सूँड बाईं ओर है और मूर्ति के दोनों ओर रिद्धि और सिद्धि की मूर्तियाँ विराजमान हैं। यह मंदिर अत्यंत शुभ ऊर्जा और शक्ति का केंद्र माना जाता है। वर्तमान मंदिर का निर्माण पेशवा काल में चिमाजी आपा (बाजीराव पेशवा के भाई) ने वासई विजय के बाद कराया था। मंदिर का मुख्य आकर्षण में सोने से मढ़ा हुआ शिखर है।
अष्टविनायकों में आठवें व अंतिम हैं महागणपति। पुणे के रांजणगांव में पुणे-अहमदनगर राजमार्ग पर 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित इस मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा की ओर है। मंदिर में स्थित भगवान गणपति की विशाल और भव्य मूर्ति को ‘माहोदक’ नाम से भी जाना जाता है। इन्हें भगवान गणेश का सबसे शक्तिशाली और उग्र स्वरूप माना जाता है। भगवान शिव ने त्रिपुरासुर नामक राक्षस का वध करने से पहले इसी स्थान पर गणेश पूजन किया था। शिव जी द्वारा इस रूप को ‘महागणपति’ कहा जाता है। दोपहर के ठीक समय सूर्य की सीधी किरणें भगवान महागणपति की मूर्ति पर पड़ती हैं। इस मंदिर का निर्माण 9वीं से 10वीं शताब्दी के बीच माना जाता है। बाद में पेशवा काल में इसका जीर्णोद्धार किया गया था।