चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की अगले दो दिन चलने वाली शिखर वार्ता पर दुनिया भर के विशेषज्ञों, जानकारों और मीडिया की नजरें जमी हैं। कूटनीति के जानकारों का एक बड़ा हिस्सा मानता है कि राष्ट्रपति शी ट्रंप को कोई रियायत नहीं देने वाले, न ही ईरान पर और न ही ताइवान पर। ईरान, ताइवान, टैरिफ की पटरी पर चलने वाली दोनों नेताओं की वार्ता की गाड़ी कितनी आगे जाएगी, यह जानने को विश्व भर के थिंक टैंक अपने घोड़े दौड़ा रहे हैं।
चीन का मुख्य लक्ष्य रहेगा राष्ट्रपति शी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के बीच होने जा रही शिखर वार्ता में ताइवान और अमेरिकी टैरिफ पर रियायतें हासिल करना। जैसा कि सब जानते हैं, यह बैठक ईरान युद्ध की पृष्ठभूमि में हो रही है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है।
उल्लेखनीय है कि ट्रंप का आज शाम से शुरू हो रहा चीन का यह तीन दिवसीय दौरा 2017 के बाद किसी अमेरिकी राष्ट्रपति का पहला दौरा होने जा रहा है। माना जा रहा है कि यह शिखर वार्ता अमेरिका-चीन संबंधों को नई दिशा देने का एक मौका हो सकती है, लेकिन ताइवान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर तनाव बना रहा तो वार्ता के कुछ और ही मायने निकल सकते हैं।
ट्रंप भले अपने बयानों से पल में तोला और पल में माशा होने की छवि से ग्रस्त हैं, लेकिन शी जिनपिंग के लक्ष्य स्पष्ट ही रहते आए हैं। बीजिंग के लिए ताइवान ‘कोर इंटरेस्ट’ का विषय है, जिसे वह अपना ‘अभिन्न अंग’ मानता है। ताइवान खुद को ‘डी फैक्टो संप्रभु राष्ट्र’ मानता है, लेकिन अमेरिका ने 1979 के ताइवान संबंध अधिनियम के तहत उस द्वीप की रक्षा में सहायता देने का वादा किया हुआ है। इस कानून के अंतर्गत वाशिंगटन ने ताइवान को अरबों डॉलर के हथियार दिए हैं और सैन्य प्रशिक्षण व खुफिया साझेदारी की है।
चीन इसे अपने ‘आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप’ मानता है। अमेरिका आधिकारिक रूप से ताइवान को चीन का हिस्सा मानने की बीजिंग की स्थिति को तो स्वीकार करता है, लेकिन खुद की सहमति या हस्तक्षेप की स्पष्टता से बचता है।
ताइवान है अड़चन!
ध्यान रहे, गत माह चीनी विदेश मंत्री वांग यी ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो से फोन पर बातचीत में ताइवान को ‘चीन-अमेरिका संबंधों में सबसे बड़ी अड़चन’ बताया था। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका ताइवान पर अपनी नीति नहीं बदलेगा। साथ ही, ट्रंप ने कहा कि शिखर वार्ता में ताइवान द्वीप को हथियार बिक्री पर चर्चा होगी। अमेरिकी कांग्रेस ने इस साल इस ओर 14 अरब डॉलर के हथियार पैकेज को मंजूरी दी है, लेकिन अंतिम स्वीकृति ट्रंप की है।

ताइपे स्थित क्राइसिस ग्रुप के विश्लेषक विलियम यांग कहते हैं, “शी ट्रंप को ताइवान को हथियारों की बिक्री कम करने या रोकने के लिए मनाने की कोशिश करेंगे।” यांग कहते हैं कि यदि ट्रंप ऐसा करते हैं, तो यह पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन काल की नीति का उल्लंघन होगा, जिसमें बीजिंग से सलाह न लेना लिखा है। साथ ही, ताइवानी राष्ट्रपति विलियम लाई चिंग-ते के लिए यह एक बड़ा झटका होगा, जो विपक्ष के साथ रक्षा खर्च पर टकराव की स्थिति में हैं। यांग कहते हैं कि चीन ट्रंप को प्रभावित कर लाई सरकार के भविष्य के रक्षा बजट को कठिन बना सकता है।
व्यापार युद्ध की स्थिरता
माना जाता है कि 18 महीनों के तनावपूर्ण दौर के बाद शी अमेरिका-चीन संबंधों को सुधारना चाहते हैं। ट्रंप ने अपने इस कार्यकाल में चीन के साथ दूसरा व्यापार युद्ध शुरू किया, जिसमें दोनों पक्षों ने 100 प्रतिशत से अधिक शुल्क लगाए हैं। इसमें कुछ विराम तो लाया गया, लेकिन कुछ शुल्क और निर्यात नियंत्रण बने हुए हैं। पिछले महीने अमेरिका ने चीनी कंपनियों पर ईरानी तेल खरीदने और ड्रोन-मिसाइल सामग्री आपूर्ति के आरोप में नए प्रतिबंध लगाए थे। चीन ने अपनी तेल रिफाइनरियों से अमेरिकी प्रतिबंधों को नजरअंदाज करने का आदेश दिया था।

बीजिंग के विश्लेषक फेंग चूचेंग कहते हैं कि बीजिंग ट्रंप के 2029 तक के कार्यकाल में अनिश्चितता कम करना चाहता है, ताकि अपनी आर्थिक नीतियां बना सके। इसमें शुल्क के स्तरों की स्पष्टता शामिल है।
रेनमिन यूनिवर्सिटी के वांग वेन का कहना है कि चीन ‘शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, पारस्परिक सम्मान और दोनों के हित के सहयोग’ की नीति पर लौटना चाहता है। गत अक्तूबर में दक्षिण कोरिया में सम्पन्न बैठक में दोनों देशों ने एक साल का व्यापार विराम तय किया था। इस शिखर वार्ता में चीन अमेरिकी कृषि उत्पादों और बोइंग विमानों की खरीद बढ़ा सकता है, साथ ही ट्रंप के ‘बोर्ड ऑफ ट्रेड’ और ‘बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट’ प्रस्ताव का समर्थन कर सकता है।
ईरान युद्ध: चीन की मध्यस्थता
ईरान पर अमेरिका-इस्राएल युद्ध शिखर वार्ता की पृष्ठभूमि में रहने वाला है। होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से वैश्विक तेल-गैस आपूर्ति प्रभावित हुई है, जो चीन को नुकसान पहुंचा रही है। बीजिंग ने युद्ध के शुरू होने के साथ ही युद्धविराम और वार्ता की मांग की थी।
त्सिंग्हुआ यूनिवर्सिटी की जोडी वेन कहती हैं, “वार्ता में शी ट्रंप से कहेंगे कि युद्ध एशिया, अमेरिका और दुनिया को प्रभावित कर रहा है, इसलिए संवाद जरूरी है।” इस विषय में ट्रंप ने कहा है कि उन्हें चीन की ‘मदद’ नहीं चाहिए, लेकिन व्हाइट हाउस ने बीजिंग से ईरान पर दबाव बनाने को तो कहा ही था।
यहां ध्यान रहे कि चीन की ईरान के साथ 2016 से ‘व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ है और वह उसका 80 प्रतिशत से अधिक तेल खरीदता है। शी और वांग यी ने इस मुद्दे पर दर्जनों वैश्विक नेताओं से बात की है। जोडी वेन कहती हैं, “चीन हस्तक्षेप न करने की नीति पर जमा रहेगा, और सिर्फ मध्यस्थ की भूमिका में रहेगा।”
ट्रंप के ‘मूड स्विंग’ पर भी नजर
ताइवान के तुंगहाई यूनिवर्सिटी के हंग पू-चाओ का कहना है कि ट्रंप को आज कठिन प्रतिद्वंद्वी’ माना जाता है। चीन का लक्ष्य प्रतिकूल रणनीतिक स्थिति को नियंत्रित फ्रेमवर्क में लाना है। यह शिखर वार्ता न केवल ताइवान और टैरिफ पर समझौते की उम्मीद बढ़ा सकती है, बल्कि ईरान संकट में स्थिरता भी लाने का दम रखती है। लेकिन ट्रंप के ‘मूड स्विंग’ की वजह से कोई ठोस परिणाम पर संशय बना हुआ है। लेकिन अधिकांश कूटनीतिकों का मानना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए यह वार्ता एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

















