जिनेवा में गूंजा कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा, घर वापसी की मांग तेज
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जिनेवा में गूंजा कश्मीरी पंडितों के विस्थापन का मुद्दा, घर वापसी की मांग तेज

कश्मीर घाटी में 1989-90 के दौरान आतंकवाद और लक्षित हिंसा के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को अपने घर-दुकानें और बाग-जमीनें छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में पलायन करने को मजबूर होना पड़ा था।

Written byसुनीता मिश्रासुनीता मिश्रा — edited by Mahak Singh
Mar 12, 2026, 01:46 pm IST
inविश्व
प्रतीकात्मक चित्र

प्रतीकात्मक चित्र

जिनेवा में आयोजित संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 61वें सत्र में कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनकी घर वापसी का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। जम्मू-कश्मीर काउंसिल फॉर ह्यूमन राइट्स द्वारा एक लिखित दस्तावेज के माध्यम से 1990 के दशक की शुरुआत में घाटी से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनकी पीड़ा को उजागर किया गया। इसमें उनके पैतृक घरों, जमीनों पर गरिमापूर्ण व सुरक्षा के साथ वापस लौटने के अधिकार की ओर भी ध्यान दिलाया गया। जम्मू-कश्मीर पीस फोरम के अध्यक्ष सतीश महालदार, जो मुख्य रूप से कश्मीरी पंडितों के विस्थापन, उनकी घर वापसी और क्षेत्र में शांति बहाली से संबंधित मुद्दों को उठाते रहे हैं। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसकी जानकारी दी है। उन्होंने कहा कि तीन दशक से अधिक समय के बाद कश्मीरी पंडितों का दुखद विस्थापन एक बार फिर दुनिया भर में चर्चा में आ गया है।

वहीं, जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने भी विस्थापित कश्मीरी पंडितों की पैतृक संपत्तियों और दूसरे मामलों से जुड़ी शिकायतों के त्वरित समाधान के लिए घाटी में शिविर लगाने का फैसला लिया है। ये शिविर एक अप्रैल से 28 अप्रैल, 2026 तक जिलेवार लगेंगे। हर शिविर दो दिवसीय होगा। इन शिविरों में मुख्य रूप से संपत्तियों पर अवैध कब्जा, म्यूटेशन (स्वामित्व हस्तांतरण), डिस्ट्रेस सेल (मजबूरी में बेची गई संपत्ति), जमीन की सीमाओं से जुड़े विवाद और राजस्व रिकॉर्ड में आवश्यक सुधार जैसे मामलों का मौके पर ही निपटारा किया जाएगा।

विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए कई योजनाएं लागू 

कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का मुद्दा सदैव भारत के लिए एक संवेदनशील विषय रहा है। केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने घाटी से विस्थापित कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित वापसी और पुनर्वास के लिए अलग-अलग समय पर कई योजनाएं लागू की हैं। वर्तमान में प्रत्येक परिवार को लगभग 13 हजार रुपये की मासिक मदद दी जा रही है, जो प्रति व्यक्ति करीब 3250 रुपये है। इसके अलावा जिन राज्यों में कश्मीरी पंडित जीवन यापन कर रहे हैं, वहां भी राज्य सरकारें अपने स्तर पर प्रवासियों के लिए आर्थिक मदद और आरक्षण से जुड़ी योजनाएं चला रही हैं। वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद प्रधानमंत्री विकास पैकेज के तहत 6000 सरकारी नौकरियां, सुरक्षित ट्रांजिट आवास और 2024 में पैतृक संपत्ति के पुनर्निर्माण व डिजिटलीकरण जैसी योजनाएं शुरू की गईं। जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अगस्त, 2021 में एक आनलाइन पोर्टल भी लान्च किया था, जिसमें कश्मीरी प्रवासी स्वामित्व परिवर्तन, अवैध कब्जे और डिस्ट्रेस सेल (मजबूरी में कम कीमत पर बेची गई संपत्ति) के संबंध में शिकायतें दर्ज कर सकते हैं।

आतंकवाद, लक्षित हिंसा के कारण पलायन को हुए मजबूर

कश्मीर घाटी में 1989-90 के दौरान आतंकवाद और लक्षित हिंसा के कारण बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडितों को अपने घर-दुकानें और बाग-जमीनें छोड़कर देश के अन्य हिस्सों में पलायन करने को मजबूर होना पड़ा था। आंकड़े बताते हैं कि आतंकी हिंसा के बाद कश्मीर से लगभग दो से तीन लाख पंडित विस्थापित हुए थे। विस्थापित परिवारों की संपत्तियों पर अवैध कब्जे हो गए या उन्हें मजबूरी में कम दामों पर बेचना पड़ा। कश्मीरी पंडित तीन दशकों से अधिक समय से कब्जे छुड़ाने की लड़ाई लड़ रहे हैं। करीब पांच वर्ष पहले घाटी में विस्थापित कश्मीरी पंड़ितों की संपत्ति वापस दिलाने का अभियान शुरू किया गया। इसके बाद घाटी में लगभग एक हजार के करीब विस्थापित कश्मीरी पंड़ितों की संपत्तियों से अवैध कब्जे हटाए गए। हालांकि, कई मामलों में अभी भी अवैध कब्जे और कानूनी विवाद बने हुए हैं। प्रशासन ने घाटी से पलायन कर चुके कश्मीरी पंडितों की संपत्तियों पर हुए कब्जे छुड़ाकर उनकी भूमि वापस दिलाने के अभियान को गति दी है। इसके अंतर्गत विस्थापित समुदाय से मिल रही शिकायतों को हल करने के लिए सभी जिलों में शिविर आयोजित किया जा रहा है।

कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित घर वापसी जरूरी 

कश्मीरी पंडितों का विस्थापन स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे दर्दनाक और बड़ी आंतरिक त्रासदियों में से एक है। ऐसे में कश्मीरी पंडितों की सुरक्षित घर वापसी बहुत जरूरी है। विस्थापित समुदाय को उनकी पैतृक संपत्ति और अधिकार वापस मिलने से घाटी में शांति व सद्भाव की बहाली में मदद मिल सकती है। धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता फिर से मजबूत होगी। न्यायिक प्रणाली पर कश्मीरी पंडितों का भरोसा बढ़ेगा। विस्थापित परिवारों की जमीन, घर और बाग-बगीचे फिर से उनकी आय का स्रोत बन सकेंगे। इससे पर्यटन और व्यापार को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही दुनियाभर में यह संदेश जाएगा कि हिंसा या आतंक के बल पर किसी समुदाय को स्थायी रूप से उसकी जमीन और अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता। हालांकि, इस दिशा में कुछ चुनौतियां भी हैं। इसलिए आवश्यक है कि संपत्ति वापसी के साथ-साथ पुनर्वास, रोजगार और सुरक्षा की दिशा में भी समान रूप से कार्य किया जाए। इसके अलावा, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सरकार, कश्मीरी पंडितों और स्थानीय लोगों को भी एक साथ आगे आना होगा। क्योंकि यह केवल पुनर्वास का नहीं, बल्कि न्याय और भरोसे का भी सवाल है।

Topics: कश्मीरी पंडितों की घर वापसीकश्मीरी पीडितों का पलायनविस्थापित कश्मीरी पंडितJammu and Kashmirजिनेवाjammu kashmir launches camps for property rightskashmiri pandit property rightsSatish Maldharmigrant Kashmiri Pandits
सुनीता मिश्रा
सुनीता मिश्रा
हरियाणा की कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन और जर्नलिज्म में मास्टर डिग्री। इग्नू दिल्ली से राजनीतिक विज्ञान में मास्टर डिग्री। पत्रकारिता में 10 वर्षों का अनुभव। [Read more]
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