हास्य अभिनेता सतीश शाह का हाल ही में निधन हुआ। उनके निधन को लेकर जहां एक ओर उनके प्रशंसक एवं उनके साथ कार्य करने वाले लोगों के रोते हुए और दुख मनाते हुए वीडियोज़ सामने आ रहे हैं, तो वहीं एक वर्ग ऐसा भी है, जो उनके निधन पर यह कह रहा है कि “कोई दुख नहीं” या फिर “अच्छा हुआ!”
सवाल — आखिर कौन हैं ये लोग?
आखिर वह कौन लोग हैं और सतीश शाह से उन्हें समस्या क्या है? क्यों वे लोग सतीश शाह को लेकर इतनी कटुता से भरे हुए हैं? क्योंकि एक कलाकार अपनी कला का प्रदर्शन जब करता है, तब वह भेदभाव नहीं करता, वह मात्र अपनी कला दिखाता है। हाँ, ऐसा भी होता है कि उसके राजनीतिक विचार एक व्यक्ति के रूप में कुछ अलग हो सकते हैं, और वह उसकी वैयक्तिक स्वतंत्रता है और लोकतान्त्रिक अधिकार भी।
कला के नाम पर पाखंड और पक्षपात
भारत में लंबे समय तक कला के क्षेत्र पर ऐसी मानसिकता वाले लोगों का कब्जा रहा, जिन्होनें हिंदुओं के खिलाफ ही विमर्श खड़ा किया और इतना ही नहीं भारतीय सेना के खिलाफ भी विमर्श बनाया। इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कहा गया और ऐसे कलाकारों को क्रांतिकारी कलाकार कहा गया और कहा गया कि कलाकार के विचारों का स्वागत होना चाहिए। यह कहा गया कि कला और कलाकार स्वतंत्र होता है और उसके मतों और विचारों पर कोई पहरा या प्रतिबंध नहीं होना चाहिए।
हिंदू विरोधी विमर्श और उसका एजेंडा
और इसी वर्ग के लोगों ने सुविधाजनक रूप से उन मामलों को एजेंडावश उठाया, जिनमें हिन्दू धर्म की आलोचना थी, और औपनिवेशिक सोच का प्रभुत्व था। हालांकि आज तक ऐसी फिल्में बन रही हैं, परंतु अब उनकी संख्या अपेक्षाकृत कम है।
स्वतंत्रता केवल अपने विचारों तक सीमित क्यों?
मगर अभिव्यक्ति की यह स्वतंत्रता उन कलाकारों को यह वर्ग नहीं देना चाहता था, जो इस वर्ग के विपरीत मत रखने वाले थे। जैसे जो लोग इजरायल के समर्थक थे, उनके प्रति इस वर्ग का दृष्टिकोण भिन्न था। जो लोग अपनी हिन्दू पहचान को लेकर मुखर थे, उनके प्रति इस वर्ग का रवैया भिन्न था, या कहें असहिष्णु था। और यह असहिष्णुता एक नहीं अपितु कई मामलों में दिखाई दी।
सतीश शाह — कलाकार के साथ देशभक्त भी
और अब यही असहिष्णुता दिखाई दे रही है, सतीश शाह के निधन के समय। सतीश शाह दरअसल जितने अच्छे कलाकार थे, उतने ही बड़े वे देशभक्त थे। उन्होंने एक बार नहीं, अपितु कई बार ऐसे राजनीतिक विषयों पर खुलकर टिप्पणी की थी, जो कथित लिबरल या प्रगतिशील वर्ग के “उदार” दायरे में नहीं आती हैं। उनका एक स्क्रीनशॉट इन दिनों वायरल है, जिसमें उन्होंने लिखा था — “भारत कभी भी इजरायल जैसा कदम नहीं उठा सकता है, क्योंकि इजरायल दुश्मनों से घिरा हुआ है, जबकि भारत दुश्मनों से भरा हुआ है!”
“स्टोन्स आर सेक्युलर्स, बुलडोज़र्स आर कम्यूनल” — सतीश शाह का व्यंग्य
एक और स्क्रीनशॉट वायरल हो रहा है, जिसमें उन्होंने लिखा था — “स्टोन्स आर सेक्युलर्स, बुलडोज़र्स आर कम्यूनल!”
ऐसे ही कई स्क्रीनशॉट उनके वायरल हो रहे हैं, और कथित लिबरल लोग इन पोस्ट्स के बहाने यह साबित करने का प्रयास कर रहे हैं कि सतीश शाह दरअसल एक कट्टर व्यक्ति थे और हिंसा के समर्थक थे। जबकि सतीश शाह का एक भी पोस्ट ऐसा नहीं है, जिसमें उन्होंने हिंसा का समर्थन किया हो।
एक यूजर ने लिखा कि मृत व्यक्ति की ऐसी आलोचना आपके खुद के खालीपन को दिखाती है। निर्दोष लोगों के प्रति शाह की संवेदना पर संदेह नहीं किया जा सकता।
ShameIess @TARUNspeakss
ill of the dead, reflects his own emptiness. Shah’s compassion for innocent lives was never in question. Unlike u he never justified the cruel acts of vioIence by Hamas! Standing against terror is standing for humanity.
“Keep sleeping” https://t.co/tZXuN73ys8 pic.twitter.com/LyEUHaeuGf— Ashtalakshmi 🇮🇳 (@Ashtalakshmi8) October 27, 2025
कथित लिबरल्स की विद्रूपता पर सतीश शाह की टिप्पणियाँ
दरअसल सतीश शाह उन विद्रूपताओं पर लगातार बोलते थे, जो ये कथित लिबरल्स कभी भाषा, तो कभी धर्म के नाम पर पैदा कर रहे थे। उन्होंने भाषा पर चल रहे विवाद पर भी एक कार्टून साझा किया था।
One of the Reasons why Liberals and Congressis are mocking the death of #SatishShah pic.twitter.com/BRidrXdN8h
— Abhishek Singh (@IAbhi_s) October 26, 2025
कांग्रेस आईटी सेल की घृणित प्रतिक्रिया
कांग्रेस का आईटी सेल सतीश शाह के निधन के बाद नकारात्मक टिप्पणियाँ कर रहा है और उनके प्रति घृणा की अभिव्यक्ति कर रहा है। यह वही सेल है, जिसके लोग लगातार यह कहते हैं कि संविधान का आदर करना चाहिए, परंतु संविधान की मूलभूत बात — अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता — वह खुद भूल गए हैं और एक मृत व्यक्ति के प्रति इसलिए विष वमन कर रहे हैं क्योंकि उसके राजनीतिक विचार उनके अनुसार नहीं थे।
Congress IT cell mocking a senior actor’s death just because he wasn’t a Congress supporter! Satish Shah was a retired actor who had a political opinion. Like anyone can have. He lived his life king-size. If you are mocking him now, you are already morally dead. Pathetic! pic.twitter.com/IyR554inMU
— The Hawk Eye (@thehawkeyex) October 26, 2025
संविधान की भावना और विरोधाभास
इस देश में हर व्यक्ति को अपना राजनीतिक मत रखने का अधिकार संविधान देता है। यह वही संविधान है, जिसकी दुहाई यह वर्ग लगातार देता रहता है और कहता है कि भाजपा सरकार संविधान को कुचल रही है। परंतु जब यही लोग संविधान की मूल भावना — स्वतंत्र राजनीतिक विचार रखने का अधिकार — का आदर न करते हुए एक मृत कलाकार के प्रति घृणा का प्रदर्शन करते हैं, तो वे स्वयं को किस श्रेणी में रखेंगे?
क्या “कथित लिबरल्स” ही असली असहिष्णु हैं?
ऐसे में प्रश्न उठता है कि ऐसे कथित लिबरल्स क्या उन कट्टरपंथियों के समान नहीं हैं, जो किसी भी भिन्न राजनीतिक या धार्मिक असहमति के आधार पर किसी की भी जान के दुश्मन बन जाते हैं? जिनके लिए केवल “माई वे ऑर हाई वे” जैसी विचारधारा महत्वपूर्ण है?
सतीश शाह के निधन ने दिखाया असली चेहरा
सतीश शाह जैसे कलाकार की मृत्यु पर कथित “उदारवादियों” का “उदार” चेहरा बहुत कुछ कह रहा है — या यूँ कहें कि उनका असली चेहरा दिखा रहा है!

















