लालू राज के 15 साल में बिहार से पलायन भयानक गति से हुआ। अब, मोदी-नीतीश के विकास के दौर में बिहार से होने वाला पलायन न केवल थम गया है बल्कि पलट गया है। वैसे तो हर प्रदेश में प्रवासी होते हैं। लोग गांव से शहर की ओर जाते हैं, और शहरों से दूसरे प्रदेशों या बाहर के देशों में बहतर अवसरों के लिए जाते भी हैं, और वहाँ रह भी जाते हैं। लेकिन लालू के जंगल राज में जो पलायन हुआ वो ख़ौफ़नाक था। इस असाधारण पलायन के कई कारण थे। शिक्षा व्यवस्था के चरमराने से युवाओं को बिहार छोड़ कर दूसरे प्रदेशों में जाने पर मजबूर होना पड़ा।
लालू राज में लोगों को अपने उद्योगों तक को छोड़कर भागना पड़ा
माहौल खराब होने से उद्योग धंधे छोड़ कर लोग बाहर भागने लगे। बिज़नेस बैठ जाने से बेरोज़गारी हुई, जिस के कारण लोगों को रोज़गार पाने के लिए दूसरे प्रदेशों में जाना पड़ा। और सब से अफ़सोसजनक ये हुआ कि हत्या, लूट-पाट, डकैती और ख़ास तौर से अपहरण और फ़िरौती के डर से डॉक्टरों जैसे सफल व्यवसायी जान बचा कर भागे। इन सब लोगों के बिहार छोड़ के जाने का एक ईकोसिस्टम बन गया। अच्छे डॉक्टर गए तो स्वास्थ्य प्रणाली कमज़ोर हुई। यानी इलाज के लिए भी अब लोगों को मजबूरी में बाहर जाना पड़ा।
जंगल राज के 15 सालों में रेलवे स्टेशनों और बस अड्डों पर बिहार से पलायन करते लोगों के मुख पर लाचारी साफ़ झलकती थी। इस पलायन में परिवारों का बिखराव, और काम-काजी लोगों का अपमान सब से बड़े दुःख का कारण थे। ये केवल शरीर का नहीं, बल्कि आत्मा का विस्थापन था।
“शिक्षा के क्षेत्र में हुए पलायन का गवाह तो मैं ख़ुद ही हूँ।” ये कहना है रवि त्रिपाठी का जो अखिल भारती विद्यार्थी परिषद् में बड़े हुए, फिर पत्रकारिता में 24 साल काम कर के, वरिष्ठ पदों का तजुर्बा ले कर, अभी नए-नए राजनीति में आये हैं। उन्होंने बताया कि “1991 में बिहार बोर्ड से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास करने के बाद मेरा दाख़िला मैथन के बी. एस. के. कॉलेज में हुआ। लेकिन 1993 तक सेशन लेट चल रहा था, कोई exam तब तक नहीं हुआ। आख़िरकार हमें ट्रांसफर सर्टिफिकेट लेकर पढ़ाई ज़ारी रखने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाख़िला कराना पड़ा। मेरे जैसे लाखों छात्रों ने बिहार में उस समय की चरमराती शिक्षा व्यवस्था की वजह से पलायन किया।”
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नीतीश सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग को किया पुनर्जीवित
नीतीश सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और उद्योग, तीनों क्षेत्रों को पुनर्जीवित किया। निवेश बढ़ाया। मोदी-नीतीश की सरकार ने एक सर्वांगीण नीति को लागू किया। स्कूल-कॉलेज में पढ़ाई, टाइम पर दवाई, खेत में सिंचाई, और हर घर में पानी की सप्लाई। मोदी सरकार ने देश भर में जो चार करोड़ पक्के मकान गरीबों को दिए हैं, उसमें से 60 लाख मकान बिहार के गरीब परिवारों को मिले हैं। बिहार में अब बिजली 22 से 23 घंटे आती है, और 125 यूनिट बिजली फ़्री मिलती है। युवाओं को ग्रेजुएट होने के बाद 1,000 रूपया महीना भत्ता दो साल तक मिलता है। विधवा पेंशन 400 रूपए महीने से बढ़ा कर 1,100 रूपए कर दी है। बुढ़ापा पेंशन भी 400 रूपए महीने से बढ़ा कर 1,100 कर दी गयी है। आंगनवाड़ी सेविका का मानदेव 7,000 से बढ़ा कर 9,000 कर दिया गया है। ऐसे ही ममता कार्यकर्ताओं का पैसा भी दो गुना कर दिया गया है। आई. टी. आई., पॉलिटेक्नीक और स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रमों से बिहार के युवाओं को इस योग्य बनाया जा रहा है कि वो चाहें तो बिहार में, या किसी भी मन चाही जगह पर काम कर सकते हैं।
सब से बड़ी बात ये है कि लालू काल में जंगल राज के कारण जो डिप्रेशन था, उस की जगह अब आत्मविश्वास ने ले ली है।

















