पिछले एक सप्ताह के मानसून के दौरान आई प्राकृतिक बाढ़ आपदा ने सबसे अधिक नुकसान उत्तराखंड और हिमाचल को पहुंचाया है, खास बात यह है कि तबाही का मंजर सबसे अधिक शिवालिक हिमालय की तलहटी और घाटियों में देखने को मिला है। यह इस वर्ष उत्तर भारत में एक दिन में हुई सबसे बड़ी तबाही है।
पहले ऐसी तबाही एक क्षेत्र में हो रही थी लेकिन पिछले एक सप्ताह से जारी मानसून के कारण उत्तराखंड से लेकर हिमाचल तक का बड़ा क्षेत्र प्रभावित हुआ है। उत्तराखंड में हिमाचल के देहरादून, ऋषिकेश, शिवपुरी, विकासनगर, नैनीताल, काठगोदाम, हेंवलघाटी, अमसेरा, डीडीहाट, धर्मपुर इलाके में जल प्रलय से भारी नुकसान हुआ है। देहरादून घाटी में सहस्रधारा, प्रेमनगर, विकासनगर, सरखेत, नंदा की चौकी, लाल तप्पड़, मालदेवता, केसरवाला, डोईवाला, बाढ़वाला, ऋषिकेश ढालवाला, गढ़ी, गाजीवाला जैसे कई इलाके बादल फटने की घटनाओं से प्रभावित हुए हैं, जिससे जान-माल का भारी नुकसान हुआ है।
दून घाटी की टोंस, तमसा, बिंदल, रिस्पना, बांदल, जाखन और सहस्त्रधारा सहित सभी नदियाँ उफान पर थीं। दो दिनों तक चली इस आपदा के दौरान देहरादून घाटी में चौदह लोग लापता बताए गए, जबकि 12 लोगों की मौत की पुष्टि हुई। कुछ स्थानों पर नदी में फंसे लोगों को बचाया गया।
हिमाचल जम्मू उत्तराखंड पंजाब है खतरे की जद में
इस साल उत्तर भारत के राज्य जम्मू उत्तराखंड हिमाचल पंजाब के शिवालिक तलहटी वाले क्षेत्रों में बादल फटने की घटनाओं ने तबाही मचाई। पद्म भूषण भूविज्ञानी प्रोफेसर खड्ग सिंह वल्दिया ने एक बार कहा था कि दिल्ली एनसीआर के आसपास का क्षेत्र दुनिया का सबसे प्रदूषित क्षेत्र बन गया है। कारखानों और वाहनों से निकलने वाले धुएं के कारण एक प्रकार का गैस का कक्ष बन जाता है, जो मानसूनी बादलों के साथ मिल जाता है और जब शिवालिक हिमालय से टकराता है तो एक स्थान पर बारिश होती है, इसे बादल फटना कहते हैं। प्रोफेसर वाल्दिया कहते थे कि जब तक प्रदूषण कम नहीं होगा, ये विनाश जारी रहेगा।
नदियों के रास्ते बंद हैं
पुराने लोग कहते हैं कि नदियाँ एक न एक दिन अपने पुराने रास्ते पर लौट आती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि तीस साल बाद नदियाँ फिर से अपना पुराना रास्ता पकड़ लेती हैं। लोगों ने नदी की जमीन पर अतिक्रमण कर पक्के मकान बना लिए हैं। दून घाटी की मौसमी नदियाँ अपने पुराने रास्तों पर लौटने लगी हैं। इस साल उन्होंने अपना रौद्र रूप दिखाया है, और एक दिन ये और भी तबाही मचाएँगी। एनजीटी, हाई कोर्ट तक सरकार को कह चुके है कि नदियों की जमीन को अतिक्रमण मुक्त कराया जाए। बरहाल मानसून के जल प्रलय ने सरकारी तंत्र को चेताया है कि वो प्रकृति से खिलवाड़ न करें।













