‘कानून लोगों की भलाई के लिए बनाए जाते हैं, लेकिन लोग इसके जरिए दामादों को ढूंढ रहे हैं, सरकारी नौकरी वालों को तलाश रहे हैं।’ ये तल्ख टिप्पणी बॉम्बे हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस आलोक अराधे और जस्टिस संदीप मार्ने की बेंच ने RTI के दुरुपयोग के मामले में की है। हाई कोर्ट का कहना है कि सूचना का अधिकार अधिनियम जनता के भले के लिए बनाया गया है, लेकिन कुछ लोग ऐसे हैं, जो इस अधिकार की बर्बादी कर रहे हैं।
क्या है पूरा मामला
अगर आप पूरे मामले को समझने की कोशिश करेंगे तो आपको भी लगेगा कि इन सवालों को पूछे जाने का कोई औचित्य नहीं है। दरअसल, बॉम्बे हाई कोर्ट में एक मामले को लेकर सुनवाई हो रही थी। मामला आरटीआई से जुड़ा हुआ था, जिसमें याचिकाकर्ता ने उटपटांग सवाल किए थे। लाइव हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट में पूर्व सूचना आयुक्त शैलेश गांधी और पांच अन्य आरटीआई कार्यकर्ताओं की याचिका पर सुनवाई चल रही थी। आरटीआई याचिकाकर्ता ने अदालत से सूचना आय़ुक्त को 45 दिन के अंदर मामले का निपटारा के लिए निर्देशित करने की मांग की थी।
जब हाई कोर्ट से एसआईसी को बुलाया गया तो उन्होंने बताया कि राज्य में सूचना आयुक्त के पद खाली हैं, जिससे इसमें देरी हो रही है। इसी दौरान अजीबो-गरीब आरटीआई के मामलों का भी जिक्र सूचना आयुक्त ने किया और बताया कि उनके पास एक आरटीआई आई है, जिसमें पूछा गया है कि एक दिन में सरकारी दफ्तर में कितने समोसे परोसे जाते हैं। बस फिर क्या था हाई कोर्ट भड़क गया। हाई कोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता केवल सरकार में खामियां ही ढूंढते हैं। क्योंकि उनका रवैया नकारात्मक होता है, इसलिए वे कभी संतुष्ट भी नहीं होते हैं।
राज्य में एक लाख शिकायतें लंबित
महाराष्ट्र के सूचना आयुक्त ने हाई कोर्ट को बताया कि प्रदेशभर में एक लाख से अधिक शिकायतें लंबित पड़ी हुई हैं। सूचना आयुक्तों की नियुक्ति नहीं होने के कारण इन शिकायतों का निपटारा नहीं हो पा रहा है। उन्होंने आयुक्तों के तीन अतिरिक्त पदों को भी भरने की मांग की।

















