शावेज का जाना…
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आलोक गोस्वामी
पूंजीवादी अमरीका के धुर विरोधी राष्ट्रपति शावेज ने लातीनी अमरीकी देशों में बढ़ाया था दबदबा
5 मार्च को कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद दुनिया से विदा हुए वेनेजुएला के राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज को उस देश के इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा। राजधानी काराकास के अस्पताल के बाहर 5 मार्च को भारी संख्या में जुटे उनके चाहने वालों की तादाद को अनदेखा कर भी दें तो भी, 6 मार्च को वहां से उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शनार्थ सैन्य अकादमी ले जाते समय साथ चलती हजारों की भीड़ वेनेजुएला में 14 साल तक एकछत्र राज करने वाले उस शख्स की गहरी छाप की तरफ इशारा कर रही थी। ताबूत के साथ चलते लोग 'कामरेड शावेज जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे। गरीबी के खिलाफ जंग अधूरी छोड़ जाने वाले समाजवादी शावेज ने पूंजीवादी अमरीका से जिस तरह टक्कर ली थी और उसकी थानेदारी के आगे देश के स्वाभिमान को कभी डिगने नहीं दिया था, उसके चलते वह अपने देशवासियों के अलावा हर उस लातीनी अमरीकी देश के चहेते बन गए थे जो अमरीकी ठसक पर कुनमुनाता रहा है। यह शावेज की अपने देश पर पकड़ ही थी जो उनके जाने के बाद सत्ता संभालने के लिए उन्हीं के पसंदीदा उप राष्ट्रपति निकोलस मादूरो के अब देश का सर्वोच्च नेता बनने की राह सुगम बना चुकी है। सेना सहित वेनेजुएला की राजनीतिक बिरादरी उनके तय किए उत्तराधिकारी यानी मादूरो को हरसंभव सहायता देने को तैयार दिखती है।
मादूरो का भारत से आध्यात्मिक जुड़ाव बताया जाता है। वह सत्य साईं बाबा के अनुयायी हैं और 2005 में पुत्तापार्थी आश्रम में बाबा के दर्शन भी कर चुके हैं। यह मादूरो ही थे जिनके आग्रह पर 24 अप्रैल, 2011 को बाबा के समाधिस्थ होने के बाद वेनेजुएला की संसद में सत्य साईं पर चर्चा रखी गई थी। उनके दफ्तर में बाबा का एक बड़ा सा चित्र भी लगा
रक्षा पर चीन खर्च करेगा 115.7 अरब डालर
बजट बढ़ाया, रौब दिखाया
चीनी सत्ता की बागडोर नए हाथों में आने के साथ ही दो मोर्चों पर चीन की आक्रामकता में बढ़त के साफ संकेत दिखाई दिए हैं। पहला तिब्बत और दूसरा रक्षा बजट। तिब्बत में चीनी दबंगई का आलम यह हो चुका है कि वहां रहने वाले तिब्बती अपनी ही माटी पर अनजान से बना दिए गए हैं। चलने-फिरने, मिलने जुलने, हंसने-बतियाने पर ड्रेगन की कुंडली का घेरा कसता जा रहा है। तिस पर नौकरी-पेशे पर मंडराते नित नए तुगलकी फरमान। तिब्बतियों की सांसें अटकी हैं और उनका स्वाभिमान रौंदा जा रहा है।
अब बात चीनी रक्षा बजट की। भारत के मुकाबले रक्षा पर तिगुना पैसा खर्चने वाली चीन की कम्युनिस्ट सत्ता की कमान अक्तूबर 2012 में नए नेताओं ने संभाली थी। उपराष्ट्रपति झाई जिनपिंग राष्ट्रपति पद की कमान संभालने जा रहे हैं। उनके चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव बनने के फौरन बाद अंतरराष्ट्रीय राजनय में चीन ने दुनिया और दक्षिण एशिया में अपना रसूख बढ़ाने की कवायद में नई तेजी दिखाई। चीन यूं भी अपनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को आधुनिकतम हथियारों और उपकरणों से लैस करने में कोर-कसर नहीं छोड़ता। इस साल तो हद ही कर दी उसने। चीन अपनी प्रतिरक्षा पर 115.7 अरब अमरीकी डालर खर्च करने जा रहा है। साल दर साल का आंकड़ा देखें तो चीन के रक्षा बजट में 2011 में 12.7 फीसदी, 2012 में 11.2 फीसदी की बढ़त हुई थी। 2012 में यह सकल घरेलू उत्पाद का 1.7 फीसदी था। चीन के अक्खड़ रवैए को देखते हुए उसके 115.7 अरब अमरीकी डालर के रक्षा बजट पर भारत सहित कई अमन पसंद देशों का बिफरना स्वाभाविक ही था। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फजीहत होती देख चीन की ओर से तड़ से सफाई पेश की गई। चीन के सरकारी मीडिया ने मासूमियत भरे अंदाज में लिखा- '700 अरब अमरीकी डालर के पेंटागन के बजट के मुकाबले तो यह बहुत कम है। उसका तो यह एक छठाई ही है।' विशेषज्ञ मानते हैं कि खुद को दुनिया की दूसरे नंबर की आर्थिक महाशक्ति मानने वाला चीन अमरीका के अलावा पड़ोसी जापान और फिलिपींस सरीखे देशों के तेवरों के चलते रक्षा में रत्ती भर गुंजाइश नहीं छोड़ना चाहता। भारत के रक्षा विश्लेषक, पीएलए के मंसूबों से पहले ही आगाह करते आ रहे हैं। रक्षा बजट तो महज एक पहलू है, चीन ने साल दर साल परमाणु क्षमता में भी दिन दूना रात चौगुना इजाफा कर लिया है।
अमरीका ने सम्मान किया, अपने देश ने ओछी राजनीति की
दिल्ली में सामूहिक बलात्कार कांड की शिकार युवती के सम्मान को अमरीका आतुर हो रहा था। क्यों? कारण की खोज जारी है। इस 8 मार्च को अमरीकी विदेश मंत्री का अंतरराष्ट्रीय साहसी महिला सम्मान उस साहसी लड़की को दिया जाना दुनियाभर में चर्चा का विषय बना। यह सम्मान दुनिया की कुछ साहसी महिलाओं को दिया जाता है जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों और सशक्तिकरण की पैरोकार के नाते अपनी जान जोखिम में डालकर असाधारण साहस दिखाया हो। 2007 में स्थापित यह सम्मान अब तक 45 देशों की 67 महिलाओं को दिया जा चुका है।
दिल्ली कांड की शिकार 'निर्भया' या 'दामिनी' को अमरीकी राष्ट्रपति की पत्नी मिशेल ओबामा और विदेश मंत्री जान कैरी ने मरणोपरांत यह सम्मान दिया। अमरीका के इस कदम पर भाजपा नेता नजमा हेपतुल्ला का कहना था कि युवतियों को उनकी बहादुरी और शौर्य के लिए सम्मानित किया जाना चाहिए न कि इस तरह की घटनाएं ऐसे सम्मान की वजह बननी चाहिए। विडम्बना ही कही जाएगी कि जिस देश की बेटी को उस तरह की पीड़ा उठानी पड़ी और अपनी जान गंवानी पड़ी उस देश के नेता महिलाओं की अस्मिता सुरक्षित रखने के लिए सख्त कानून बनाने की मांग को भी राजनीतिक चश्मे से देख रहे हैं, बलात्कार विरोधी कानून और ऐसे मामलों के तुरंत निपटान पर भी ओछे बहस-मुबाहिसे में उलझे हैं। एक सरकारी आंकड़ा है कि राजधानी दिल्ली में रोजाना सामूहिक बलात्कार के 5-6 मामले आज भी घट रहे हैं।
मालदीव का मलाल
नाशीद को पकड़ा, फिर छोड़ा भारत की साख को लगाया बट्टा
मालदीव में पूर्व राष्ट्रपति नाशीद 5 मार्च गिरफ्तार करके अगले दिन रिहा तो कर दिए गए, लेकिन इस नाटकीय घटनाक्रम से कई सवाल खड़े हो गए हैं। भारतीय दूतावास में पनाह लेकर कई दिन तक गिरफ्तारी टालते रहे नाशीद को मालदीव प्रशासन द्वारा हिरासत में लेने और अगली सुनवाई तक रिहा किए जाने के बाद भारत के लिए पड़ोसी मालदीव में उभर रही नई राजनीतिक चुनौती को संभालना टेढ़ी खीर साबित हो सकता है।
मालदीव में पहली बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया से राष्ट्रपति चुने गए नाशीद को पिछले साल तख्ता पलट में हटा दिया गया था। भारत तब भी ठगा सा देखता रहा था। मालदीव वही देश है जहां चप्पे-चप्पे पर भारत की छाप अंकित है और जो देश ऐतिहासिक रूप से भारत का करीबी माना जाता रहा है। लेकिन वहां पिछले साल भर से चली आ रही राजनीतिक उथल-पुथल भारत की कूटनीतिक बिरादरी को हकबकाए हुए है। बताते हैं, नाशीद को गिरफ्तार न किए जाने की बात रखते हुए भारत ने वहां के मौजूदा राष्ट्रपति वाहिद से बीच-बचाव करके करार कराया था, जो तार-तार कर दिया गया। नाशीद के मुद्दे पर भारत की कूटनीति बेअसर दिख रही है। माले में भारतीय दूतावास में 11 दिन तक पनाह में रहने के बाद 23 फरवरी को नाशीद तब अपने घर लौटे थे जब मालदीव ने उन्हें गिरफ्तार न करने और आने वाले सितम्बर में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव के लिए बेखटके प्रचार करने देने की भारत को एक तरह से गारंटी दे दी थी। लेकिन आखिर वह मुकर गया और नाशीद को धर लिया।
मालदीव के नासूर बनने का खतरा मंडरा रहा है। चीन और पाकिस्तान की वहां आहट सुनाई देने लगी है। जिहादी तत्वों ने दबे पांव वहां गुप्त ठिकाने तय किए हैं और खुफिया जानकारी है कि वे उसे जिहादी 'ट्रांजिट' केन्द्र की तरह इस्तेमाल करेंगे। 29 सितम्बर 2007 को वहां एक बड़ा जिहादी बम धमाका हुआ था जिसने 12 सैलानियों की जान ले ली थी। उसके बाद से मालदीव में वहाबियों की आवाजाही लगातार बढ़ती जा रही है। ऐसे में भारत की कूटनीति की धार में ऐसा पैनापन चाहिए जिससे कि मालदीव जिहादी शिकंजे में न जाए और भारत के लिए मुसीबत का नया मोर्चा न खोल दे।
कार्डिनल ने माना–बुरा बर्ताव किया
ब्रिटेन के सबसे बड़े वाले कैथोलिक कार्डिनल कीथ ओ ब्रियान को आखिर मानना पड़ा कि उन्होंने यौन संबंधी दुर्व्यवहार किया था। कार्डिनल कीथ ने यह साफगोई अपने पद से इस्तीफा देने के एक हफ्ते बाद 3 मार्च को दिखाई। अब नए पोप को चुनने के लिए होने वाली दुनियाभर के कार्डिनलों की गुप्त बैठक में वह भाग नहीं लेंगे, यह भी कीथ ने साफ कर दिया। कार्डिनल को यह साफगोई भी भारी दबाव के चलते दिखानी पड़ी क्योंकि तीन मौजूदा और एक पहले के पादरी ने उन पर अनैतिक यौनाचार के आरोप मढ़े थे।
स्कॉटलैंड में चर्च के मुखिया रहे कार्डिनल ब्रियान ने अपने बयान में कहा- 'इस मौके पर मैं यह स्वीकार करता हूं कि ऐसे अवसर आए जब मेरा यौन संबंधी बर्ताव उस स्तर से नीचे आ गया था जिसकी मुझसे पादरी, आर्चबिशप और कार्डिनल के नाते अपेक्षा की जाती थी। 74 साल के कार्डिनल ब्रियान चर्च के हाल के इतिहास के पहले सबसे ऊंचे ओहदे के अधिकारी हैं जिसने ऐसी बात स्वीकारी है। कार्डिनल पर जब उन पादरियों ने ऐसे आरोप लगाए थे, तो पहले पहल उन्होंने आरोपों को सिरे से खारिज ही कर दिया था। लेकिन बाद में उन्होंने वैसे सब चाल-चलन के लिए माफी मांगी। बयान में उन्होंने लिखा, 'मैंने जिनको ठेस पहुंचाई है उनसे मैं माफी मांगता हूं।'











