थ्"श्रीनगर एवं कश्मीर के अन्य शहरों में सिख समुदाय के 60 हजार लोग रहते हैं। उन्हें धमकी दी जा रही है कि वे इस्लाम अपनाएं या घाटी छोड़ दें। सिख समाज देशभक्त कौम है। वे जान दे देंगे लेकिन इस्लाम कबूल नहीं करेंगे।"
-अकाली सांसद रतन सिंह अजनाला
सात सौ वर्ष पूर्व विदेशी मुस्लिम आक्रमणकारियों द्वारा प्रारंभ किए गए महर्षि कश्यप निर्मित कश्मीर के इस्लामीकरण का जिहादी सिलसिला अपने अंतिम दौर में पहुंच रहा है। बीस वर्ष पूर्व चार लाख कश्मीरी पंडितों का जबरदस्ती पलायन करवाकर कश्मीर घाटी को पूर्णतया हिन्दूविहीन करने के पश्चात अब वहां रह रहे साठ हजार से भी ज्यादा सिखों को इस्लाम कबूल करने अथवा कश्मीर से निकल जाने का जिहादी फरमान जारी कर दिया गया है। कश्मीर समस्या को "राजनीतिक" मानने वाले कांग्रेसी एवं साम्यवादी संगठनों एवं इनके कथित प्रगतिशील नेताओं की मुस्लिम तुष्टीकरण की "सनक" अगर अब भी खत्म नहीं हुई तो कश्मीर को दूसरा पाकिस्तान बनने से कोई नहीं रोक सकेगा। बहुमत के आधार पर "मुस्लिम राष्ट्र" के निर्माण का इतिहास फिर दोहराया जाएगा और हम भारतवासी कारवां निकल जाने के बाद गुबार देखते रह जाएंगे।
हमलावरों की जिहादी परंपरा
पाकिस्तानपरस्त आतंकवादियों ने "हिन्दू कश्मीर" को मुस्लिम कश्मीर बना डालने वाले विदेशी हमलावरों की जिहादी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए सिखों को इस्लाम कबूल करने की जो धमकी दी है उसका सीधा अर्थ है कि कश्मीर में केवल इस्लाम को मानने वाले ही रह सकते हैं। यदि कश्मीर घाटी में सिखी का पालन करते हुए रहने का दुस्साहस किया तो छतीसिंह पुरा (कश्मीर) में किए गए एकतरफा कत्लेआम की तरह सिख पंक्तियों में खड़े करके गोलियों से भून दिए जाएंगे। इस खतरनाक धमकी का उत्तर शिरोमणि अकाली दल के नेता सरदार रतन सिंह अजनाला ने गत 20 अगस्त को लोकसभा में दिया है कि, "श्रीनगर में सिख समुदाय के 60 हजार लोग रहते हैं। अब उन्हें धमकी दी जा रही है कि वे इस्लाम अपनाएं या घाटी छोड़ दें। सिख समुदाय देशभक्त कौम है। वे जान दे देंगे लेकिन इस्लाम कबूल नहीं करेंगे।" यद्यपि सिख नेताओं ने अपने भाई कश्मीरी सिखों को धर्म और धरती न छोड़ने के "सिखी उसूलों" पर कायम रहते हुए अंतिम श्वास तक इस्लाम न कबूल करने की प्रेरणा दी है परंतु केन्द्र की सरकार ने कांग्रेसी उसूलों का पालन करते हुए एक बार फिर हवाई घोड़े दौड़ा दिए हैं।
राज्यसभा में बयान जारी करके गृहमंत्री पी.चिदम्बरम ने अपना पल्लू इस तरह झाड़ लिया, "सिखों को मिली कथित धमकी की पूरी जानकारी सरकार को है, लेकिन उसे लेकर डरने व चिंता करने की कोई बात नहीं। इस बारे में मैंने जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री से बात कर ली है।" इसी तरह लोकसभा में गुस्साए भाजपा एवं अकाली सांसदों से अपनी जान छुड़ाकर भागने से पहले वित्तमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रणव मुखर्जी ने कहा, "कश्मीर में आतंकियों का एक छोटा सा समूह सांप्रदायिक अशांति पैदा कर रहा है। लेकिन सरकार भरोसा देती है कि ऐसी घटनाएं दोहराए जाने से रोकने के लिए हर जरूरी कार्रवाई की जाएगी। कश्मीर ही नहीं पूरा देश सिख समुदाय के साथ है। इस प्रकार वक्तव्य देकर मुस्लिम तुष्टीकरण की कांग्रेसी परपंरा का निर्वाह किया है। वित्तमंत्री महोदय को यह कौन समझाए कि कश्मीर घाटी में मुस्लिम बहुमत के आधार पर आजाद इस्लामिक राष्ट्र की स्थापना के लिए लड़ाई लड़ी जा रही है।
इस्लाम अथवा मौत
प्रश्न उठता है कि यदि यह वास्तव में "आतंकवादियों के एक छोटे से समूह की करतूत ही है तो भारत की सरकार, प्रदेश की सत्ता, भारतीय फौज, अद्र्धसैनिक बल और जम्मू-कश्मीर पुलिस मिलकर भी इस छोटे से समूह को पिछले बीस वर्षों से काबू क्यों नहीं कर सकी? स्पष्ट है कि केन्द्र सरकार की लड़खड़ाती राजनीतिक इच्छाशक्ति, सुरक्षा बलों को सख्त कार्रवाई के पूरे अधिकार न देना, प्रदेश सरकार की अलगाववादियों के साथ हमदर्दी, प्रदेश के शासन और प्रशासन में पाकिस्तानी तत्वों की भरमार, कश्मीरी जनता में भरा जा रहा भारत विरोधी जुनून और एक विशेष समुदाय को प्रसन्न करने की कांग्रेसी राजनीति इत्यादि ऐसे ठोस कारण हैं जिनकी वजह से प्रारंभ में (1989) सक्रिय हुए आतंकियों का एक छोटा सा समूह आज एक बहुत बड़े भारत विरोधी हिंसक आंदोलन में बदल चुका है जिसे "जंगे आजादी" कहा जा रहा है। इसी उद्देश्य के लिए हिन्दू/सिखों को इस्लाम कबूल करने, कश्मीर छोड़ने या फिर मरने के लिए तैयार रहने के फरमान जारी किए जा रहे हैं।
इस तरह के आदेश कश्मीर में सक्रिय पृथकतावादी तत्वों ने पहली बार जारी नहीं किए। 1989-90 में भी इसी तरह से "इस्लाम अथवा मौत" के फतवे जारी किए गए थे। उस समय भी कश्मीर घाटी में रहने वाले हिन्दुओं/सिखों को तुरंत कश्मीर छोड़ने या फिर इस्लाम कबूल करने के दो विकल्पों में से एक को चुनने के लिए कहा गया था। श्रीनगर अनंतनाग, सोपुर, बारामूला इत्यादि शहरों की मस्जिदों पर लगे लाउडस्पीकरों से ऐलान किए गए कि "काफिरों को मार दिया जाएगा, कश्मीर इस्लामिक मुल्क है। इसे न मानने वालों को "गद्दार समझा जाएगा। भारत के एजेंट हिन्दुओं को हम नहीं छोड़ेंगे" इस घोषणा के तुरंत बाद ही सामूहिक हत्याएं, बलात्कार, आगजनी और लूट-खसोट का जिहादी सिलसिला प्रारंभ हो गया। परिणामस्वरूप चार लाख से ज्यादा कश्मीरी हिन्दुओं को अपने व्यापार, कारोबार, घर, जमीन-जायदाद और सरकारी नौकरियां छोड़कर अपने घरों से भागना पड़ा। उस समय भी दिल्ली सरकार और कई राजनीतिक दलों के नेताओं ने हर संभव तरीके से कश्मीरी पंडितों के पलायन को रोकने, उन्हें घाटी में सुरक्षा देने की घोषणाएं की थीं।
इस्लामीकरण की हिंसक प्रक्रिया
इस प्रकार की सभी घोषणाएं गीदड़ भभकियां साबित हुयीं। कश्मीर घाटी में पाकिस्तानी तत्वों की दखलअंदाजी बढ़ती गई। सीमाओं पर होने वाली सशस्त्र घुसपैठ में बेहिसाब वृद्धि हुयी। आतंकी हिंसा का पूरे जम्मू-कश्मीर में तेज गति से विस्तार हुआ। भारतीय सुरक्षा बलों पर गुरिल्ला एवं फिदायीन हमलों की तादाद बढ़ी और धीरे-धीरे कश्मीर घाटी से "भारत" समाप्त होने लगा। इसी कड़ी में आज कश्मीर घाटी में रहने वाले देशभक्त सिखों को धमकियां दी जा रही हैं ताकि कश्मीर घाटी में भारत की यह अंतिम निशानी भी समाप्त हो जाए। उल्लेखनीय है कि भारत के सुरक्षा बलों को निकालने, मंदिरों/गुरुद्वारों को बर्बाद करने, तीर्थस्थलों और हिन्दू यात्रियों पर हिंसक हमले करने, भारतीय पर्यटकों को रोकने जैसी भारत/हिन्दू विरोधी जघन्य हरकतों से घाटी के इस्लामीकरण का मार्ग पहले से ही प्रशस्त किया जा रहा है।
वस्तुत:कश्मीर घाटी के पूर्ण इस्लामीकरण के मार्ग में जो भी व्यक्ति, संगठन, जाति और विचार बाधक है, उन्हें समाप्त करना जिहादी अलगाववादियों की मुख्य गतिविधियां हैं जिन्हें वे अल्लाह का हुक्म मानते हैं। इस तरह के कट्टरपंथी अलगाववादियों, उनके समर्थक राजनीतिक दलों, पाकिस्तान समर्थक इस्लामिक संगठनों और आटोनॉमी/सैल्फरूल" की आवाज बुलंद करने वाली प्रादेशिक सरकारों के आगे राजनीतिक/आर्थिक पैकजों का दाना फेंकना कहां की बुद्धिमत्ता है। विदेशों से धन, हथियार और नैतिक समर्थन लेकर भारत के विरोध में खड़े जिहादी युवक यदि इस्लाम अथवा मौत का नारा लगा रहे हैं तो इसके पीछे एक निश्चित विचार-दर्शन, भारत विरोधी मानसिकता और एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। इसे समझना अत्यंत आवश्यक है।
इस्लामीकरण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
हिन्दू कश्मीर को मुस्लिम कश्मीर में बदलने के लिए धर्मांतरण, मौत और पलायन की जो क्रूर चक्की सात सौ वर्षों तक चली उसका उद्देश्य समझे बिना कश्मीर की वर्तमान गुत्थी को सुलझाया नहीं जा सकता। संक्षेप में कुछ उदाहरणों से इस पृष्ठभूमि और वर्तमान जिहाद के चरित्र को समझा जा सकता है। मुस्लिम इतिहासकार हसन ने, अपनी पुस्तक "हिस्ट्री आफ कश्मीर" में लिखा है "सुल्तान सिकंदर बुतशिकन (सन् 1339) ने हिन्दुओं को सबसे ज्यादा दबाया। शहरों में यह घोषणा कर दी गई थी कि जो हिन्दू मुसलमान नहीं बनेगा, वह या तो देश छोड़ दे, या मार डाला जाए।
परिणामस्वरूप कई हिन्दू कश्मीर छोड़कर भाग गए और कई ने इस्लाम कबूल कर लिया। एक अंग्रेज इतिहासकार डा.अर्नेस्ट ने अपनी पुस्तक "बियोंड द पीर पंजाल" में लिखा है "दो दो हिन्दुओं को जीवित ही एक बोरे में बांधकर डल झील में फेंक दिया जाता था। उनके सामने केवल तीन मार्ग शेष थे। या तो वे मुसलमान बनें या मौत को स्वीकार करें या फिर संघर्ष करें। सुल्तान सिकंदर ने सरकारी आदेश जारी कर दिया-इस्लाम, मौत अथवा देश निकाला।"
कश्मीर घाटी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक ग्रंथ राजतरंगिणी के दूसरे लेखक जोनराज के अनुसार "कोई भी ऐसा नगर, कस्बा, गांव और वन नहीं बचा जहां हिन्दू देवी देवताओं के मठ-मंदिर टूटने से बचे हों। इन अमानवीय जुल्मों के सामने अनेक हिन्दुओं ने हार मानी और मतांतरित हो गए। बहुत सारे हिन्दुओं ने आत्महत्याएं कीं और कई ने कश्मीर छोड़ दिया।" इस्लाम, मौत या पलायन का यह खूनी चक्र सात सौ वर्षों तक चला। यह आज भी चल रहा है। यही वर्तमान कश्मीर समस्या का असली चेहरा है। यह चेहरा आज दुनिया के सामने नंगा हो चुका है। भारत की राष्ट्रवादी जनता, राष्ट्रवादी राजनीतिक दल और भारतीय सुरक्षा बल इस चेहरे को पहचान गए हैं। बस अपवाद हैं तो कांग्रेस, साम्यवादी और कुछ समाजवादी नेता जो सत्ता के नशे में चूर होकर मुस्लिम तुष्टीकरण की राष्ट्रघातक परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।
राष्ट्रवादियों को खुली चुनौती
आज सिखों को इस्लाम कबूल करने अथवा कश्मीर घाटी छोड़ने की जो धमकियां दी जा रही हैं वह उस इतिहास की पुनरावृत्ति है जिसका पहला अध्याय विदेशी आक्रांताओं ने कश्मीर की धरती पर लिखा था। यह धमकियां समस्त देश की राष्ट्रवादी शक्तियों के लिए एक प्रबल चुनौती बनकर सामने आई हैं। भारत सरकार सहित सारे देश को अकाली नेता सरदार रतन सिंह अजनाला द्वारा लोकसभा में की गई घोषणा का पुरजोर समर्थन करना चाहिए। "सिख समुदाय देशभक्त कौम है। वे जान दे देंगे लेकिन इस्लाम कबूल नहीं करेंगे।" इसी तरह भारत की सरकार को भी अपने वित्तमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के इस बयान का महत्व समझना चाहिए कि "कश्मीर ही नहीं, पूरा देश सिखों के साथ है।"
अत:आवश्यकता इस बात की है कि कश्मीर समस्या के वास्तविक आधार और स्वरूप को समझकर तद्नुसार रणनीति तैयार की जाए। अपने दलगत स्वार्थों से ऊपर उठकर एक ऐसी राष्ट्रीय सहमति तैयार की जाए जिसके अंतर्गत देशद्रोहियों पर सख्त कार्रवाई हो और कश्मीर घाटी में थोड़ी बहुत बची परंतु सहमी हुयी राष्ट्रवादी शक्तियों को बल मिले। सिख समाज को मिली चुनौती के पीछे छिपी हुई पाकिस्तान प्रेरित साजिश को भी समझा जाए। यदि भारत की सरकार अब भी न चेती और देश की राष्ट्रवादी शक्तियों ने संगठित होकर साजिश का प्रतिकार न किया तो कश्मीर को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का अलगाववादियों का उद्देश्य पूरा होने में देर नहीं लगेगी।
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