कैलास-मानसरोवर यात्रा जीवन सफल करने वाली वह डुबकी शान्ति प्रसाद अग्रवाल


72 वर्ष की आयु में इस वर्ष 2010 में मुझे कैलास-मानसरोवर की यात्रा का अनुपम सौभाग्य मिला। विदेश मंत्रालय की योजना के पांचवें दल में समन्वय अधिकारी 35 वर्षीय मेजर समीर कुमार सिंह सहित 51 सदस्य थे। हमारी यात्रा की कुल अवधि 26 दिन थी जिनमें 14 दिन भारत में और 12 दिन चीन-अधिकृत तिब्बत में थे। 25 जून की प्रात: दिल्ली से चल कर 3 जुलाई की प्रात: 7 बजे जब हम तिब्बत में प्रवेश करने के लिये लिपूलेख दर्रे की ओर बढ़ रहे थे तो मेजर समीर कुमार सिंह के मुख से यह सुनकर रोमांच हो आया कि हमें अपने ही भूभाग में प्रवेश के लिये वीजा के सहारे जाना पड़ रहा है।

चीन की भूमि पर हमारा स्वागत करने वाले थे वहां के समन्वयक श्री लीमा, जिन्हें हिन्दी आती थी और सुश्री डोल्मा, जिन्हें अंग्रेजी आती थी। 3 और 4 जुलाई को तिब्बत के छोटे से सीमावर्ती नगर तकलाकोट, जो समुद्रतल से 4,112 मीटर की ऊंचाई पर है, में ठहरे। 5 जुलाई की सुबह 140 किलोमीटर दूर स्थित दारचेन के लिये प्रस्थान कर गए। इससे पिछली शाम चीन सरकार के प्रतिनिधि ने तिब्बत भाग के व्ययों के लिये प्रत्येक यात्री से 701 अमरीकी डॉलर ले लिये थे।

तकलाकोट के बाहर जिस सड़क पर हमारी गाड़ियां आर्इं वह 140 किलोमीटर लम्बी सड़क कहीं भी दिल्ली के मात्र 3 किलोमीटर लम्बे राजपथ से किसी भी हालत में कम नहीं थी। इस मार्ग पर हमें सबसे पहले बार्इं ओर मिला बहुत विशाल, अत्यन्त सुन्दर, बहुत गहरे नील वर्ण का राक्षस ताल जिसे रावण ताल भी कहा जाता है। इसमें कोई नहीं नहाता। प्रसिद्धि है कि इसमें वही नहा सकता है जिसमें रावण जैसी आध्यात्मिक और बौद्धिक शक्तियां हों। राक्षस ताल के बीच में एक द्वीप है जहां अब तक कोई नहीं जा सका है। इस ताल से थोड़ा ही आगे हमारी दाहिनी तरफ समुद्रतल से 25,242 फीट ऊंची स्वस्तिक जैसे आकार की गुर्ला मान्धाता पर्वत श्रेणी थी। गुर्ला मान्धाता को नन्दी भी कहा जाता है।

कुछ और दूरी तय करने पर मुख्य सड़क से दार्इं ओर उतर कर चलने पर दिखाई दिया नयनाभिराम नीले रंग का मानसरोवर। मैंने अपने कुछ साथी यात्रियों को देखकर बिना अधिक सोचे-विचारे कपड़े उतारे और केवल जांघिये और माला में मानसरोवर में घुस गया। जल बड़ा सुहाना। बिल्कुल ठण्डा नहीं। कोई तेज हवा नहीं। हाथों से सिर पर जल छिड़का, आíखों पर जल के छपके लगाये और प्रार्थना की कि सभी दुर्भावनायें दूर हों। लगभग छ: बजे शाम हम लोग समुद्रतल से 4,750 मीटर ऊंचाई वाले दारचेन पहुंचे।

6 जुलाई प्रात: 11 बजे हम लोगों ने डेराफुक के लिये प्रस्थान किया। कोई एक घण्टे के बाद यमद्वार आया। यहां से कैलास पर्वत के दक्षिणी भाग के भव्य दर्शन होते हैं। यमद्वार की परिक्रमा करने से यमराज अर्थात् मृत्यु का भय दूर होता है। सबने यमद्वार की आठ-आठ बार परिक्रमा की और उसके बाद यमद्वार के बीच से बाहर निकले। थोड़ी देर और चलने के बाद वह स्थान आ गया जहां हमें बसें और जीपें छोड़कर कुली और घोड़े लेकर आगे का मार्ग पैदल या घोड़ों से तय करना था। कुछ यात्रियों ने कुली और घोड़े नहीं लिये।

लगभग छ: किलोमीटर की घुड़सवारी के बाद डेराफुक पहुंचे। समुद्रतल से 4890 मीटर ऊपर। कुछ देर विश्राम के बाद काफी यात्री निकट ही स्थित चरणपादुका के लिये निकले। मैं भी चला किन्तु तीन किलोमीटर ऊपर चढ़ने की हिम्मत नहीं हुई। थोड़ा ऊपर एक समतल-सी भूमि थी। एक बड़े से पत्थर पर साथ लाये शालिग्राम जी को स्थापित किया, नहलाया, चन्दन घिसा। सामने इन्द्रधनुषी रंग की चट्टानों के एकान्तत: मनोरम समुद्रतल से 13,000 फीट की ऊंचाई वाले पठार पर समुद्रतल से 22,028 फीट की ऊंचाई वाली गुम्बदनुमा भव्य चोटी वाला कैलास पर्वत दिखाई दे रहा था। कुछ फोटो खीचे। पहले कैलास पर्वत पर विराजमान गौरी महादेव जी की ओर चन्दन अर्पित किया फिर शालिग्राम जी को लगाया। प्रात: मौसम काफी सुहावना था। हमें सबसे पहले 4-5 किलोमीटर की दूरी में लगभग 750 मीटर की ऊंचाई पर पहुंचना था। चढ़ाई बिल्कुल खड़ी थी। भारत तिब्बत सीमा पुलिस के कमाण्डेण्ट ने इस मार्ग को यात्रा के तीन कठिनतम टुकड़ों में से एक बताया था। मैंने यह चढ़ाई घोड़े पर लगभग डेढ घण्टे में तय की। समुद्रतल से 18,600 फीट ऊंचाई पर स्थित डोल्मा ला दर्रे का दृश्य सर्वथा अनुपम था। ठीक सामने था समुद्रतल से लगभग साढ़े बाईस हजार फीट ऊंचा पावन कैलास पर्वत जिस पर अब तक कोई नहीं पहुंच सका। हमें डोल्मा ला दर्रे तक पहुंचने में केवल कुछ मीटर बर्फ पर चलना पड़ा। सामने ही मां तारा देवी की शिला पर यात्रियों द्वारा चढ़ाई गई काफी झंडियां लगी हुई थीं। हवा काफी तेज चल रही थी परन्तु कड़ाके की धूप होने के कारण ठण्ड नहीं लग रही थी। लोग वहां ऑक्सीजन की कमी बताते हैं किन्तु मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लग रहा था। यह स्थान जैन धर्म के संस्थापक और उनके 24 तीर्थंकरों में सबसे पहले ऋषभदेव जी का निर्वाण-स्थल माना जाता है। बौद्धों का मानना है कि 11वीं शताब्दी के कवि-योगी मिलरेपा एकमात्र ऐसे प्राणी हुये हैं जो कैलास पर्वत की चोटी पर खड़े हुये। वह वहां उड़कर पहुंचे। हिन्दू अन्य सब पर्वतों से अलग दो छोटी चोटियों के मध्यवर्ती इस पर्वत पर भगवान् शंकर और जगज्जननी गौरी का निवास मानते हैं।

यहां पूजा-अर्चना के बाद सिलसिला शुरू हुआ उतराई का। जितनी खड़ी चढ़ाई थी उससे कहीं अधिक खड़ी उतराई। ऐसी उतराई पर घोड़ों का प्रयोग निषिद्ध। सबको पैदल ही उतरना था। काफी कठिनाई हो रही थी। लगभग एक किलोमीटर बाद गौरीकुण्ड के दर्शन। दाहिनी ओर कभी-कभी कैलास पर्वत के आंशिक दर्शन हो जाते थे। बादलों और पर्वतों की छटा अपूर्व थी। रात्रि विश्राम जोंगजेर्बू में हुआ।

आठ जुलाई को संक्षिप्त योगाभ्यास के बाद प्रात: आठ बजे प्रस्थान हुआ। लगभग दो किलोमीटर पैदल चले। आगे बस और जीपें हमारी प्रतीक्षा में थीं। प्रात: 10 बजे दारचेन वापस आ गये। भोजन के बाद दोपहर दो बजे के लगभग जीपों से अष्टपद के लिये निकले। कुछ ही देर बाद अष्टपद का समतल स्थान आ गया। दूरी तीन किलोमीटर से कम निकली। कैलास पर्वत के दक्षिणी छोर से भव्य दर्शन। पहले कैलास पर्वत के इर्द-गिर्द बादल थे, फिर कुछ देर के लिये बिल्कुल छंट गये। अष्टपद के लिये जीपों का किराया पड़ा 100 युआन प्रति यात्री। इस प्रकार कैलास पर्वत की परिक्रमा पूर्ण हुई।

9 जुलाई को प्रात: छ: बजे जबकि काफी अंधेरा था हम लोग अपनी बस और दो जीपों से दारचेन से चल दिये। कोई 45 मिनट के बाद हमारी गाड़ियां मानसरोवर के किनारे दौड़ रही थीं। लगभग 15 मिनट होरे नामक स्थान पर मानसरोवर के अपूर्व सौन्दर्य को आंखों में समेटते-समेटते चाय पी और फिर आधा घण्टे के अन्दर हम मानसरोवर के किनारे स्थित अपने अगले तीन दिनों के विश्राम-स्थल ट्रस घो मोनास्टरी के कामचलाऊ होटल के कमरों में पहुंच गये। दोपहर 12 बजे से पूर्व मानसरोवर में स्नान करने के लिये मना किया हुआ था क्योंकि उस समय मानसरोवर का जल काफी ठण्डा रहता है। भोजन हुआ और उसके एक घण्टा बाद हम सब छोटे-छोटे समूहों में मानसरोवर के अन्दर थे।

स्नान के बाद पूजन-हवन। 10 जुलाई, भोर के तीन बजे। हम सात लोग मानसरोवर के तट पर जाकर बैठ गये। आकाश में तारे ही तारे चमक रहे थे और उन तारों की छवि मानसरोवर के लगभग निश्चल जल में आलोकित हो रही थी। दोपहर के भोजन के बाद सबने पुन: बड़े उल्लास और उत्साह के साथ मानसरोवर के पावन जल में स्नान किया और अनेक यात्रियों ने अपने पितरों का तर्पण किया।

11 जुलाई को प्रात:काल सुभाष जाखेते ने बिहार योग विश्वविद्यालय के अनुसार योगनिद्रा कराई। उस दिन तीसरे पहर स्नान के समय हवा चल रही थी और तापमान था 15 डिग्री सेण्टीग्रेड। मानसरोवर के जल में तीन डुबकियां लगाकर यात्रा का अन्तिम स्नान किया।

अगले दिन 12 जुलाई को प्रात:काल नियमित योगाभ्यास और नाश्ते के बाद लगभग 9 बजे समन्वय अधिकारी ऋचा और दिलीप शर्मा के साथ कार में मानस-तट के विश्रामगृह से चल मार्ग में मानसरोवर में से जल भरा। तट से महादेव जी के प्रतिरूप पत्थर एकत्र किये और मानसरोवर की तलहटी में से उसकी पवित्र रेत ली। फिर जनरल जोरावर सिंह की समाधि पर गए। 13 जुलाई को हम लोग तकलाकोट से 966 ईसवीं में स्थापित कोर्किया मोनास्टरी देखने गए। यहां सीता जी, राम एवं लक्ष्मण जी का भव्य मन्दिर भी है, जिसकी देखभल बौद्ध लामाओं द्वारा की जाती है। 14 जुलाई को तकलाकोट में ही रहे। 15 जुलाई को प्रात: 6 बजे स्वदेश की ओर चले। धीरे-धीरे लिपूलेख चोटी तक आये। यहां "बम-बम भोले" और "ओ3म् नम: शिवाय" के जयनादों के साथ एक-दूसरे का स्वागत हुआ, गले मिले। भारत की ओर आकर मैंने स्वदेश की मिट्टी माथे पर लगाई। कुली और घोड़े वाले हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके साथ कुछ मीटर तक बफर्#ीले मार्ग के बीच से चलते हुए घरवापसी की डगर पर चल पड़े। द