घाटी को पोसने वाली सेकुलर सरकार ने पैदा किए
ये पत्थरबाज
राज्य व केन्द्र सरकारों की तुष्टीकरण नीति ने बिगाड़े कश्मीर के हालात
-ले.जन.(से.नि.)एस.के.सिन्हा, पूर्व राज्यपालश्रावणी के दिन श्री अमरनाथ यात्रा तो सकुशल पूर्ण हो गई, लेकिन
हर वर्ष जैसे-जैसे श्री अमरनाथ यात्रा का समय निकट आता है, वैसे-वैसे घाटी के अलगाववादी नेता वहां के हालात बिगाड़ने के बहाने तलाशने लगते हैं। बीते दिनों की हिंसक घटनाएं इसकी पुन: पुष्टि करती हैं। घाटी के पाकिस्तानपरस्त अलगाववादी नेताओं के इसके पीछे दो उद्देश्य होते हैं। एक तो श्री अमरनाथ यात्रा में देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं के सामने कश्मीर के बारे में दुष्प्रचार किया जाए ताकि उनको राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर "कश्मीर समस्या" का ढिंढोरा पीटने का अवसर मिल सके। और दूसरा, घाटी में हालात खराब करके हिन्दू तीर्थयात्रियों की संख्या कम की जा सके।
आश्चर्य है कि अपने पाकिस्तानी आकाओं के इशारे पर नाचने वाले इन नेताओं को कश्मीर में आने वाले सैलानियों की कमी भी नहीं खलती, क्योंकि तीन-चार मास यानी मार्च से जून तक कश्मीर में आने वाले सैलानियों-श्रद्धालुओं से यहां के लोग ठीक-ठाक कमाई कर लेते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो सैलानियों से औनी-पौनी कीमतें वसूली जाती हैं। इस तथ्य को इस उदाहरण से समझा जा सकता है कि होटलों व सैलानियों के प्रयोग में आने वाली वस्तुओं के दाम शेष भारत के मुकाबले कश्मीर में सबसे अधिक हैं।
इसमें कोई शक नहीं कि कश्मीर में गजब की प्राकृतिक सुन्दरता है। परन्तु शेष देश में भी ऐसे कई सुन्दर पर्यटक स्थल हैं जो प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर हैं, परन्तु उन स्थानों के प्रति केन्द्र सरकार द्वारा कोई विशेष प्रयत्न/प्रचार नहीं किया जाता। जम्मू-कश्मीर राज्य के जम्मू संभाग में ही कई ऐसे क्षेत्र हैं जो कश्मीर से भी अधिक सुन्दर हैं, परन्तु राजनीतिक कारणों से इन क्षेत्रों की अवहेलना कर केवल घाटी के पर्यटन स्थलों को बढ़ावा दिया जाता है। यह इस बात से सिद्ध होता है कि प्रदेश का पर्यटन विभाग अपने कुल बजट का 80 प्रतिशत कश्मीर के पर्यटन-स्थलों को बढ़ावा देने पर खर्च करता है और केवल 20 प्रतिशत जम्मू संभाग के पर्यटन स्थलों के लिए रखता है। जबकि राज्य में आने वाले कुल पर्यटकों व तीर्थयात्रियों की संख्या में कश्मीर के पर्यटकों की संख्या 10 प्रतिशत से अधिक नहीं होती।
देखने में आ रहा है कि अलगाववादियों के भड़काऊ प्रचार का असर अब उन युवाओं पर पड़ रहा है, जिनकी आयु 15-20 वर्ष के बीच है। इन्होंने जन्म से आज तक कश्मीर में ऐसे ही हालात देखे हैं। ये युवक शीघ्र ही बहक जाते हैं और सड़कों पर उतर आते हैं। अलगाववादी नेता इनकी भावनाओं से खिलवाड़ करके इनका पूरा फायदा उठा रहे हैं, क्योंकि इसमें उनकी कोई व्यक्तिगत हानि नहीं है। उनकी अपनी सन्तानें विदेशों में शिक्षा ग्रहण कर रही हैं या व्यवसाय में लगी हैं। सड़कों पर मरने वाले गरीब व बेरोजगार युवक होते हैं। पाकिस्तान से व अन्य मुस्लिम देशों से अलगाववादियों को खुला पैसा मिल रहा है, जिसका कुछ ही हिस्सा अशान्ति फैलाने वालों व पत्थरबाजों के बीच बंटता है।
गत दिनों राज्य के पूर्व राज्यपाल ले.जनरल (से.नि.) एस.के. सिन्हा ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जम्मू-कश्मीर के हालात राज्य व केन्द्र सरकार की तुष्टीकरण नीति के कारण ही बिगड़े हैं। उनके विचार में मजहबी कट्टरता इस राज्य की मूल समस्या है। सीमा पार से यहां के अलगाववादियों को भरपूर समर्थन मिल रहा है जिसके दम पर ये नेता यहां अशान्ति फैलाने के लिए सदा प्रयत्नशील रहते हैं। ऐसे तत्वों के साथ सख्ती बरतने की आवश्यकता है न कि तुष्टीकरण की नीति पर चलने की। हमारा सेकुलर मीडिया और राजनीतिक लोग असलियत को जानते हुए भी तथ्यों को नकारते हैं। इस समस्या का समाधान यही है कि तुष्टीकरण की नीति को बंद किया जाए व अलगाववादी व विध्वंसक तत्वों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए।
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