उत्तराखण्ड को देवभूमि माना जाता है। पर जिसने भी सुमगढ़ में सरस्वती शिशु मंदिर में हुई दुर्घटना को देखा, वह यही कहेगा कि कुदरत के कहर के आगे देवताओं का भी बस नहीं चलता। सुमगढ़ में 18 अगस्त की सुबह का उजाला अंधेरे में तब्दील हो गया। सभी घरों में मातम ही मातम। कल्पना करें उस क्षण की जब 18 बच्चों को एक साथ भूमि में दफनाया गया हो, जो मासूम थे, अभी राह पर चलना सीख ही रहे थे।
नंद किशोर मिश्र अपने तीन बच्चों को इस हादसे में खो चुके हैं। उनकी पत्नी गंगा होश में आती है, बच्चों की तस्वीरें देखकर फिर गश खाकर गिर जाती है। इस घटना में सदा के लिए "खुशबू" भी सो गई। उसकी मां देवकी का भी रो-रोकर बुरा हाल है। घटना में घायल मुकेश भी बात करते-करते डर जाता है। उसके पूरे शरीर में चोट लगी है। मुकेश का इलाज चल रहा है। वह कहता है, "अंकल, मिट्टी आयी, पता नहीं फिर क्या हुआ?"
सरस्वती शिशु मंदिर के प्रधानाचार्य बालक सिंह भण्डारी बताते हैं, "उस दिन विद्यालय में कुल 35 बच्चे ही आये थे। 24 बच्चे कक्षा के भीतर थे, शेष बाहर थे जो कि प्रथम व द्वितीय कक्षा के थे। जो बाहर थे वे सकुशल बच गए।" नम आंखों से श्री भण्डारी कहते हैं "मेरा तो परिवार ही खत्म हो गया।" यही हाल सभी आचार्यों का था, जो कि इस हादसे के बाद से लगातार रोये ही जा रहे थे।
उस समय काल कवलित हो गए बच्चों के परिवारों के बीच जाने में हर कोई सहम जाता है। वहां जाकर क्या बोलें? कैसे दिलासा दें, किसी के समझ में नहीं आ रहा था। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद शायद यह पहली ऐसी घटना हुई थी जिसमें बच्चों की इतनी बड़ी संख्या में दर्दनाक मौत हो गई। छोटी-सी खुशबू के साथ उसकी सहेलियां दीपा, भारती, योगिता, प्रेमा, प्रीति, नेहा भी इस दुनिया से चली गर्इं। मासूम से रमेश गाड़िया की मां का बुरा हाल है। वह दृश्य देखा नहीं जाता। घरों में विलाप की गूंज और ईश्वर से सवालों का सिलसिला कि "इन नौनिहालों को किस्म जुर्म की सजा मिली।" रमेश के साथी मुन्ना, चंद्रशेखर, उर्मिला, तारा, पंकज, खीमा सिंह, मनीषा, करन, गौरव, मोहित भी अपनी जिंदगी खो बैठे। आसमान से गिरी प्रलय ने सभी को एक साथ लील लिया। कुदरत का कहर देखिए, प्रलय आनी थी, वह भी इसी स्कूल में। जबकि स्कूल आसपास के स्थानों में सबसे सुरक्षित स्थान पर बना दिखाई देता है और कक्षा की वही छत ढह गई, जिसमें ज्यादा बच्चे पढ़ रहे थे।
उत्तराखण्ड के बागेश्वर जिले की कपकोट तहसील के गांव सुमगढ़ में 18 अगस्त की सुबह करीब साढ़े नौ बजे कुदरत ने अपना कहर ढाया। एक पहाड़ी दरक कर यहां सरस्वती शिशु मंदिर की छत पर आ गिरी। घटना के समय चौबीस बच्चे भीतर थे, जोकि छत गिरने से मलबे के ढेर में दब गये। इस हादसे में 18 नौनिहालों की जान चली गई जबकि 6 बच्चों की जान बच गई। इस ह्मदय विदारक घटना का कारण क्षेत्र में बीते कई दिनों से हो रही लगातार वर्षा के बीच बादल फटना रहा।
यह क्षेत्र इतना पिछड़ा है कि जिला मुख्यालय को इस घटना की जानकारी मिलने में दो घंटे लग गए। यहां न तो दूरसंचार की कोई व्यवस्था थी और न ही पुलिस के वायरलैस सैट काम कर रहे थे। हादसा जहां हुआ वह स्थान सड़क से करीब तीन किमी. की दूरी पर था। सड़क से विद्यालय के बीच बना सरयू नदी का पुल भी बह गया। गांव वालों ने करीब पांच घंटों की कड़ी मेहनत के बाद मलबा हटा पाने में सफलता प्राप्त की। भारी वर्षा की वजह से भी राहत कार्यों में रुकावट आयी। बचाव कार्यों के लिए अल्मोड़ा से भेजे गए भारत-तिब्बत सीमा पुलिस के जवान भी शाम सात बजे तक घटनास्थल तक पहुंचे। तब तक सभी बच्चों के शव निकाले जा चुके थे। घटनास्थल पर पहुंचे जिलाधिकारी डी.एस.गब्र्याल स्वयं राहत कार्यों में हाथ बंटाते दिखे।
मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल "नि:शंक" एवं आपदा प्रबंधन मंत्री श्री खजान दास मौसम की खराबी की वजह से उसी दिन घटनास्थल तक नहीं जा सके। ये सभी अगली सुबह ट्रेन से हल्द्वानी पहुंचे। उनके साथ पूर्व मुख्यमंत्री व राज्यसभा सदस्य श्री भगत सिंह कोश्यारी भी थे, जो कि लेह का दौरा बीच में छोड़कर यहां आये। श्री कोश्यारी का यह चुनाव क्षेत्र भी रहा है। अगले दिन देर शाम ये सभी घटनास्थल तक पहुंचे व मृत बच्चों के परिजनों से मिलकर उन्हें ढांढस बंधाया।
मुख्यमंत्री डा.रमेश पोखरियाल "नि:शंक" ने मृतक बच्चों के परिजनों को एक-एक लाख व घायलों के लिए पच्चीस-पच्चीस हजार रु.की धनराशि दी। डा. "नि:शंक" ने इन बच्चों की स्मृति में एक स्मारक पार्क भी बनाए जाने की घोषणा की। पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी अपने इस गृहक्षेत्र की घटना पर बेहद भावुक नजर आये। उन्होंने कहा, "कई घरों के चिराग रोशन होने से पहले ही बुझ गए।" सुमगढ़ में हुए इस हादसे पर प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह ने भी शोक जताया। लोकसभा की अध्यक्ष श्रीमती मीरा कुमार की पहल पर संसद में दो मिनट का मौन रखकर दिवंगत बच्चों को श्रद्धाञ्जलि दी गई।
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