महानीतिज्ञ विदुर का जीवन चरित


पुस्तक : छिलके वाली का पति लेखक : विष्णुदत्त शर्मा प्रकाशक : पीक मीडिया प्रा. लि., 24 आयकर कालोनी, सिविल लाइन्स, जयपुर (राज.) पृष्ठ : 312, मूल्य : 140 रु.मात्र

भारतीय अतीत के गौरवमयी पौराणिक ग्रंथ महाभारत के विलक्षण पात्र रहे महान नीतिज्ञ विदुर की नीतियां और उनके उपदेश हमेशा से जनमानस में पूजनीय और अनुकरणीय रहे हैं। शूद्रकुल में उत्पन्न होने के बाद भी उच्च नौतिक मूल्यों के ज्ञाता और उनके पालनकर्ता विदुर और उनकी धर्मपरायण पत्नी पारंशवी के जीवन चरित्र को विस्तार से वर्णित करती पुस्तक "छिलके वाली का पति" इसी वर्ष प्रकाशित होकर आई है। उपन्यास के कलेवर में प्रकाशित हुई इस पुस्तक में महाभारत के संपूर्ण घटनाक्रम को संक्षेप में प्रस्तुत किया गया है। इसके साथ ही उन कारणों और लोगों की भी पहचान की गई है जो महाभारत जैसे अभूतपूर्व युद्ध के लिए जिम्मेदार थे।

पांच खण्डों में विभाजित इस पुस्तक में वेद व्यास के अवतरण से लेकर श्रीकृष्ण के महात्मा विदुर के अतिथि बनने तक की कथा का वर्णन किया गया है। पुस्तक के आरंभ में अपने प्राक्कथन में लेखक विष्णुदत्त शर्मा ने अन्यायपूर्ण और दूषित वर्ण व्यवस्था पर प्रहार किया है तथा अनेक प्रमाणों और उद्धरणों के आलोक में लेखक ने प्राचीन भारत के कई महान ऋषियों, चिंतकों और रानियों को निम्न कुल से संबंधित बताया है। पंच महाभूतों के आधार पर विभाजित की गई इस पुस्तक के पहले अध्याय "पृथ्वी" में हस्तिनापुर के सम्राट शांतनु और सत्यवती प्रसंग से लेकर विदुर के अवतरण तक की कथा का वर्णन किया गया है।

पुस्तक के अगले अध्याय "अग्नि" में धृतराष्ट्र, पाण्डु के साथ विदुर के शैशवकाल, बाल्यकाल, युवाकाल और अधेड़ावस्था का वर्णन किया गया है। हमेशा धर्म और नीति का पालन करने वाले विदुर ने पाण्डु-पुत्रों का साथ दिया और कई बार उनके प्राणों की रक्षा भी की। यानी इस खण्ड में विदुर की कर्तव्यनिष्ठा उजागर होती है। इसी प्रकार तीसरे खण्ड "जल" में पांडवों के वनवास और अज्ञातवास का वर्णन किया गया है। और चौथे खण्ड "वायु" में पांडवों और कौरवों के बीच युद्ध को रोकने के लिए किए गए प्रयासों का वर्णन है। इस खण्ड में विदुर ने धृतराष्ट्र का अत्यंत मूल्यवान उपदेश देते हुए उन्हें सन्मार्ग पर लाने का प्रयास किया है। पुस्तक के अंतिम खण्ड "आकाश" में भगवान श्रीकृष्ण के विदुर प्रेम और उनकी पत्नी पारंशवी के पारलौकिक संबंध को वर्णित किया गया है। इस खण्ड का वह प्रसंग अत्यंत मार्मिक, पठनीय और आत्मिक सुख देने वाला है, जब पारंशवी श्रीकृष्ण प्रेम में डूबकर उन्हें केले का छिलका खिलाने लगती है, और वह उसे भी सहर्ष ग्रहण कर लेते हैं। अर्थात इस पुस्तक में विदुर के जीवन चरित के साथ उनकी पत्नी पारंशवी के विलक्षण ईश्वर प्रेम का भी वर्णन है। इसके साथ ही स्त्री मनोविज्ञान का भी विश्लेषण गहनता से किया गया है।

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