जन का रोष - डा. दयाकृष्ण विजयवर्गीय "विजय"


कभी न जन स्वातंत्र्य को छीने शासन धूर्त, करने दे कर्तृव्य को मन में सपने मूर्त।

सर्जक पूर्ण स्वतंत्र हो नहीं किसी का दास, प्रतिभा प्रज्ञा ने किया जग का सदा विकास।

पूंजी से पूंजी बढ़े अर्थशास्त्र का शोध, खो न जाए इस लोभ में पावन नैतिक बोध।

है प्रतीक तप त्याग का पावन भगवा वेष, दुष्ट पहन पहुंचा रहे संतों तक को ठेस।

ध्यान योग की सिद्धि में झोंके जिसने भोग्य, सिद्ध पुरुष ही वे हुए भगवा धारण योग्य।

छद्म रूप नाटक मिटें, मिटें मुखौटी पंथ, शासन आगे बढ़ रचे सार्थक युक्ति तुरंत।

गहरे भ्रष्टाचार की खोली जिसने पोल, तंग उसी को कर रहे सत्तावादी टोल।

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