हत्यारे के लिए हाय-तौबा?
श्री देवेन्द्र स्वरूप के आलेख "जिहाद, राजनीति और सी.बी.आई." से एक ऐसी साजिश का पता चलता है, जो इस देश के लिए बहुत ही खतरनाक है। ऐसा लगता है कि जो भी भारतीय अपनी जन्मभूमि की वन्दना की बात करता है, वह जिहादियों और सेकुलरों के निशाने पर आ जाता है। क्योंकि जिहादियों को पता है कि जब तक लोगों में भारत-भक्ति की भावना रहेगी तब तक उनका उद्देश्य पूरा नहीं होगा।
-चन्द्रशेखरचावला कालोनी, बल्लभगढ़ (हरियाणा)
द सी.बी.आई. कांग्रेस का खिलौना बन चुकी है। देश में ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमें कांग्रेसी नेता संलिप्त हैं, पर उन मामलों की जांच सी.बी.आई. से नहीं कराई जा रही है। कांग्रेस अपने सहयोगियों को भी समय-समय पर बचाती रही है। वहीं दूसरी ओर अपने विरोधियों को पछाड़ने के लिए कांग्रेस सी.बी.आई. जैसी संस्था की विश्वसनीयता को खत्म कर रही है।
-गणेश कुमारपुनाईचक, पटना (बिहार)
द जिस सोहराबुद्दीन के खिलाफ म.प्र., महाराष्ट्र, राजस्थान और गुजरात में हत्या के अनेक मामले दर्ज हों, उसकी हत्या की जांच के नाम पर करोड़ों रु. खर्च करना पैसे की बर्बादी है। यह अलग बात है कि किसी की भी हत्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन एक हत्यारे के लिए इतनी हाय-तौबा भी नहीं मचनी चाहिए।
-ब्राजेश कुमारगली सं. 5, आर्य समाज रोड, मोतीहारीपूर्वी चम्पारण (बिहार)
देश का दुर्भाग्य
देश में व्याप्त सभी समस्याओं को बनाए रखने और बढ़ाने में कांग्रेस ही जिम्मेदार है। भारतीय समाज को प्रांत, भाषा, जाति और मजहब के आधार पर कांग्रेस ने ही विभाजित किया है। वस्तुत: कांग्रेस की नीति अंग्रेजों वाली फूट डालो, राज करो और मामलों या समस्याओं को लटकाए रखने की रही है। वह दिन देश का सौभाग्य होगा जब देश की जनता कांग्रेस के इस दुष्चक्र को समझकर अच्छा निर्णय लेगी।
-डा. उमेश मित्तलगंगोह रोड, सहारनपुर (उ.प्र.)
सामयिक सुझाव
श्री नरेन्द्र सहगल का यह सुझाव कि संत शक्ति एवं धार्मिक संगठन हिन्दुत्व, हिन्दू-संस्कृति और राष्ट्र, राष्ट्रीयता जैसे शब्दों का उद्घोष करें उत्तम है, सामयिक है। श्री देवेन्द्र स्वरूप की पीड़ा सबकी व्यथा को उजागर कर रही है, जो सी.बी.आई. के कांग्रेस का "खिलौना" बन जाने से पैदा हुई है। किसी भी समस्या का हल वर्तमान सरकार निकाल नहीं पा रही है। बंगलादेश में अब्दुल्ला मौदूदी की पुस्तकें गैर इस्लामी मानी गयी हैं। वहां की सरकार ने उन पर प्रतिबंध लगा दिया है, खुशी की बात है। भारत सरकार यहां के मदरसों पर प्रतिबंध लगायेगी, यह सोचा भी नहीं जा सकता।
-क्षत्रिय देवलालउज्जैन कुटीर, अड्डी बंगला, झुमरी तलैया कोडरमा (झारखण्ड)
घोटालों का "खेल"
श्री तरुण सिसोदिया की रपट "खेल और खिलाड़ियों के साथ खिलवाड़" पढ़ी। ऐसा लगता है कि खेल आयोजन समिति ने जमकर "आर्थिक खेल" किया है। छोटी मछलियों को पकड़ने से नहीं, बड़ी मछलियों को पकड़ने के बाद असलियत पता चलेगी। खेल के नाम पर महाघोटाला किया गया है। इसमें कौन लोग शामिल हैं, इसकी जानकारी देश के लोगों को मिलनी ही चाहिए।
-राममोहन चंद्रवंशीविट्ठल नगर, टिमरनी, हरदा (म.प्र.)
द खेल के नाम पर भारत ने पानी की तरह पैसा बहाया, किन्तु दु:ख की बात है कि अभी भी पूरी तैयारी नहीं हो पाई है। आए दिन मीडिया में समाचार आ रहे हैं कि निर्माण कार्य बड़ा घटिया हो रहा है, अनावश्यक चीजें खरीदी जा रही हैं। जिस वस्तु की कीमत बाजार में एक लाख रु. है, उसे किराए पर करोड़ों रु. में लाया जा रहा है। यह तो भ्रष्टाचार ही है।
-उत्सव वर्मासी-20, पूर्वी विनोद नगर(दिल्ली)
बंगलादेश का साहसिक कार्य
श्री मुजफ्फर हुसैन का आलेख "आतंकवाद के विरुद्ध बंगलादेश की साहसिक पहल" सरकार चलाने वाले हर भारतीय नेता को पढ़ना चाहिए। बंगलादेश की सरकार ने मौलाना मौदूदी की पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाकर सराहनीय कार्य किया है। यह भारत के सेकुलर नेताओं के लिए एक नसीहत भी है। मुस्लिम कट्टरवाद एक पुराना रोग है। सर्वप्रथम कमाल पाशा ने इसका इलाज कर तुकर्#ी को सेकुलर घोषित किया था। किन्तु अब वहां भी आतंकवाद पनपने लगा है।
-ठाकुर सूर्यप्रताप सिंह सोनगराकांडरवासा, रतलाम (म.प्र.)
स्वतंत्रता या स्वच्छन्दता
हमारा देश 63 वर्ष से स्वतंत्र है, परन्तु दुर्भाग्य ही कहेंगे कि स्वतंत्रता का आशय लोग स्वच्छन्दता मान बैठे हैं। शासकीय अधिकारी, कर्मचारी हों या हमारे राजनेता एक बड़ी संख्या में सभी नैतिक बोधों से दूर रहकर नीति-अनीति सभी तरीकों से धन- संग्रह करने में लगे हुए हैं। सम्पन्न होना कोई बुरी बात नहीं, परन्तु राष्ट्र-समाज का ध्यान रखे बिना केवल व्यक्तिगत स्वार्थों की पूर्ति के लिए धन-संग्रह अपराध ही है। जब हम मर्यादित रहते हुए नैतिकता से भरे रहेंगे तभी हम विमुक्त भाव से स्वतंत्रता का आनन्द ले सकते हैं।
-प्रमोद कुमार गुप्ता1590 न्यू रायगंज, सीकरी बाजार, झांसी (उ.प्र.)
द आजादी का यह मतलब कतई नहीं है#े कि आप भ्रष्टाचार में लिप्त रहिए, देश-विरोधी बातें करिए, आतंकवादियों के अधिकारों की बात कीजिए, कहीं भी थूकें या गंदगी फैलाएं, कहीं भी गाड़ी खड़ी करिए, रेलगाड़ी में बेटिकट चलिए, सड़क या सार्वजनिक स्थान का अतिक्रमण करिए। किन्तु दुर्भाग्यवश इस देश के कुछ लोग इसी को आजादी मान रहे हैं। ऐसे लोगों को आजादी का अर्थ बताने की जरूरत है।
-संदीप कुमार गिरीगांव- ममुरा, सेक्टर-66, नोएडा (उ.प्र.)
कांग्रेस की घिनौनी हरकत
ऐसा प्रतीत होता है कि वर्तमान संप्रग सरकार की दिशा तय करने वाला कांग्रेस का नेतृत्व देश-विदेश के हर मोर्चे पर अपनी कारगुजारियों की भारी विफलता से घबराकर कुंठित हो गया है। इस अवसादपूर्ण स्थिति से निकलने व भारतीय राजसत्ता पर आसीन रहने की अपनी स्वप्न-कामना की पूर्ति हेतु यह नेतृत्व देश-विरोधी घिनौनी तिकड़मबाजियों में संलिप्त हो गया है। येन-केन-प्रकारेण मुस्लिम वोट बैंक को अब पूर्णतया व एकाधिकार रूप में अपनी मुट्ठी में करने के लिए उस बहुसंख्यक हिन्दू समाज को बदनाम करने पर उतर आया है जिस समाज में "जीओ और जीने दो" व "सभी जीवों पर दया करो" के नीति वाक्य सैद्धान्तिक रूप से अंगीकार किये गये हैं। जिस समाज में चर-अचर, वृक्ष-पाषाण, खग-मृग सभी को या तो पूजनीय और रक्षा करने के योग्य माना गया। आज उसी हिन्दू समाज को वर्तमान संप्रग सरकार अपने घिनौने उद्देश्यों को साधने हेतु "हिन्दू आतंकवादी" की अपमानजनक संज्ञा प्रदान करने के खतरनाक खेल को खेलने पर उतर आई है।
-आनन्द मेहता13/740, सर्राफा बाजार, सहारनपुर (उ.प्र.)
राष्ट्रमण्डल और भारत
अक्तूबर 2010 में कामनवेल्थ (राष्ट्रमण्डल) खेलों का आयोजन भारत की राजधानी दिल्ली में होने जा रहा है। इस निमित्त आजकल ब्रिटेन की रानी एलिजाबेथ का "बैटन" भारत के अनेक राज्यों में समारोहपूर्वक घुमाया जा रहा है। किन्तु क्या किसी ने सोचा कि यह "बैटन" क्या होता है और इंग्लैण्ड की रानी का नाम इससे क्यों जोड़ा जाता है? वास्तव में "बैटन" एक डण्डे को कहते हैं, जो पुलिस या सेना का बड़ा अधिकारी अपनी सत्ता और अधिकार के रूप में साथ रखता है। किन्तु अपने राष्ट्रपति की बजाय इंग्लैण्ड की रानी का "बैटन" भारत में घुमाया जाना अंग्रेजों के लिए गौरव की बात है, पर हम भारतीयों के लिए नहीं।
राष्ट्रमण्डल अंग्रेजों के गुलाम रहे देशों की संस्था है, जिसका प्रमुख ब्रिटेन का राजा या रानी होते हैं। राष्ट्रमण्डल का सदस्य होने का अर्थ है कि हम किसी न किसी रूप में ब्रिटेन की अधीनता स्वीकार करते हैं। कामनवेल्थ का पूरा नाम है (ब्रिटिश कामनवेल्थ ऑफ नेशन्स) किन्तु मात्र कॉमनवेल्थ शब्द का प्रयोग भी 1947 के पश्चात् स्वीकार्य कर लिया गया ताकि भारत की देशभक्त जनता को न अखरे।
कॉमनवेल्थ देशों के नागरिकों का दर्जा ब्रिटिश सब्जेक्ट्स (ब्रिटेन की प्रजा) का होता है। कॉमनवेल्थ देशों के लिए अंग्रेजी भाषा, अंग्रेजी कानून और परम्पराओं को वरीयता देने का प्रावधान भी है। इंग्लैण्ड में कॉमनवेल्थ से बाहर के देशों रूस, जर्मनी, फ्रांस, चीन आदि को विदेशी माना जाता है, किन्तु भारत तथा कॉमनवेल्थ के अन्य किसी देश के नागरिक को विदेशी या परराष्ट्रीय न मान कर ब्रिटिश प्रजा ही माना जाता है। इसी प्रकार दूसरे राष्ट्रों में भेजे गये राजदूत को "एम्बेसडर" कहा जाता है, किन्तु कॉमनवेल्थ के देशों में जो राजदूत भेजते हैं उन्हें "हाई कमिश्नर" कहा जाता है।
अंग्रेजों की नौ सेना का ध्वज ही भारत की नौ सेना का ध्वज है जोकि सफेद जमीन पर लाल रंग का क्रॉस है। इस ध्वज के एक कोने में भारत का तिरंगा लगाया जाता है जो भारत की अलग पहचान का द्योतक है। वैसे ही आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड आदि कॉमनवेल्थ के अन्य देश भी ब्रिटिश नौ सेना के ध्वज के एक कोने में अपना-अपना राष्ट्र ध्वज लगाकर कॉमनवेल्थ के अधीन अपनी अलग पहचान दर्शाते हैं।
स्वतंत्र होकर भी अंग्रेजों के प्रभुत्व वाली कॉमनवेल्थ का सदस्य बना रहना भारत के लिए शर्म की बात है। किन्तु यह अंग्रेजों की कूटनीति और चतुराई का ही कमाल है कि उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री को कॉमनवेल्थ में रहने के लिए मना लिया। पाकिस्तान व भारत 15 अगस्त को अंग्रेजों के आधिपत्य से स्वतंत्र हुए। पर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के कारण भारत का सर्वोच्च अधिकारी लार्ड माउंटबेटन को ही अपनाया गया, जबकि पाकिस्तान ने मोहम्मद अली जिन्ना को अपना गर्वनर जनरल बनाया, किसी अंग्रेज को नहीं। भारत के स्वाभिमान के साथ यह खिलवाड़ क्या इसलिए हुआ कि जवाहरलाल नेहरू अंग्रेजी परिवेश में पले-बढ़े और उनके लार्ड माउंटबेटन और लेडी माउंटबेटन के साथ घनिष्ठ संबंध थे?
-कैलाश चन्द्र333, सुनहरी बाग अपार्टमेन्टसेक्टर-13, रोहिणी (दिल्ली)
पञ्चांगवि.सं.2067 - तिथि - वार - ई. सन् 2010
भाद्रपद कृष्ण
12
रवि
5 सितम्बर, 2010
"
13
सोम
6 "
"
14
मंगल
7 "
भाद्रपद अमावस्या
-
बुध
8 "
भाद्रपद शुक्ल
1
गुरु
9 "
"
2
शुक्र
10 "
"
3
शनि
11 "
सिर्फ खाने को मेवा
चार गुना वेतन हुआ, मगर नहीं संतोष जनता में है इसलिए, नेताओं पर रोष। नेताओं पर रोष, भूख से बचपन रोता पर इनकी मोटी चमड़ी पर असर न होता। कह "प्रशांत" थी पहले राजनीति इक सेवा पर अब धन्धा बनी, सिर्फ खाने को मेवा।।
-प्रशांत
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