भारत में दिशाहीन होती उच्च शिक्षा - डा.ओम प्रभात अग्रवाल


पिछले एक वर्ष से उच्च शिक्षा के विकास एवं प्रबंधन के क्षेत्र में बहुत बड़े स्तर पर उथल-पुथल मची हुई है। नगाड़ा तो इस बात का पीटा जा रहा है कि पुनर्गठन के फलस्वरूप आगे के कुछ वर्षों में भारत विश्व के सर्वाधिक विकसित देशों के समकक्ष हो जाएगा, परंतु गंभीर विश्लेषण करने पर कम से कम अभी तो यही लगता है कि दिशाहीनता ही बढ़ती जा रही है।

आ रहे नव विश्वविद्यालय

अभी तक विश्वविद्यालयों की स्थापना केवल केन्द्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा संसद अथवा विधायिकाओं द्वारा पारित "एक्ट" के माध्यम से ही हो पाती है। पिछले कुछ वर्षों में "डीम्ड" विश्वविद्यालयों का चलन भी जोर पकड़ने लगा था यद्यपि अब इसे रोक दिया गया है। नये तंत्र में अब भारत में विदेशी विश्वविद्यालय भी खुल सकेंगे, 14 नवाचार (इनोवेटिव) विश्वविद्यालयों की स्थापना होगी तथा विज्ञान एवं तकनीकी के अत्युच्च प्रशिक्षण एवं शोध के लिए भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के सहयोग से एक अकादमी का भी गठन किया जाएगा जिसका कार्य भी लगभग विश्वविद्यालय जैसा ही होगा।

विदेशी विश्वविद्यालयों के भारतीय परिसरों की कल्पना के पीछे उद्देश्य यह बताया गया है कि उनसे प्रतियोगिता होने पर हमारे विश्वविद्यालयों में भी शिक्षा एवं शोध का स्तर ऊंचा उठेगा। प्रश्न केवल यह है कि कुछेक विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान किसी न किसी रूप में वर्तमान में भी इस देश में कार्यरत हैं, फिर यह प्रतियोगिता अभी तक क्यों नहीं जन्मी और हमारे संस्थानों के स्तर में कोई अंतर क्यों नहीं आया? यह भी समझ में न आने वाली बात है कि अल्प समय में ही विदेशी परिसर इतना ऊंचा अकादमिक स्तर कैसे प्राप्त कर लेंगे कि काफी पहले से स्थापित भारतीय विश्वविद्यालयों को प्रतियोगिता की आवश्यकता पड़ जाय। ज्ञातव्य है कि कुछ समय पूर्व ही इंग्लैंड के विश्व प्रसिद्ध कैम्ब्रिाज विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा था कि विश्वविद्यालय कोई "हैम्बर्गर" (एक लोकप्रिय व्यंजन) तो है नहीं कि केवल "फ्रैंचाइजी" के माध्यम से उनकी हुबहू अनुकृति झटपट दूसरे देश में स्थापित की जा सके। आशय स्पष्ट है कि शीर्ष स्थान प्राप्त करने के लिए स्थापना के पश्चात किसी भी विश्वविद्यालय की देखरेख दीर्घकाल तक कुछ उसी प्रकार से करनी पड़ती है जैसी कि एक शिशु का व्यक्तित्व संवारने के लिए की जाती है। यह भी एक सर्वमान्य सत्य है कि प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने वाली शिक्षा तो वही हो सकती है जिसकी जड़ें उस देश की अपनी संस्कृति में हों। लगभग बीस वर्ष पूर्व की यूनेस्को की एक रपट भी बेलाग शब्दों में यही कहती है। परंतु क्या विदेशी परसरों में दी जाने वाली शिक्षा से ऐसी आशा रखना दिवास्वप्न न होगा? वे तो हमारे देश में आएंगे धनोपार्जन करने और वहां से निकलेंगे ऐसे मैकाले पुत्र जो उस संस्थान के मूल देश के व्यापारिक और राजनीतिक हितों का ही संवर्धन करेंगे न कि हमारे देश की प्रगति का पथ आलोकित करेंगे। देश में हल्का सा बदलाव आया है। कृषि, जल प्रबंधन, औषधि शास्त्र तथा पशुपालन के क्षेत्र में शोध की दृष्टि से कुछ वैज्ञानिकों का ध्यान हमारे पारंपरिक ज्ञान को खंगालने की ओर आकृष्ट हुआ है। क्या ये परिसर ऐसे कार्य को गति देना चाहेंगे क्योंकि ऐसा कार्य तो उनके देश के व्यापारिक हितों पर सीधी चोट करेगा? यही नहीं, अधिक वेतनमान आदि देने की क्षमता के कारण वे हमारे संस्थानों में प्रतिभा दोहन भी करेंगे और इस प्रकार उनकी स्थिति बदतर बना देंगे। संभवत: इसी कारण यशपाल सरीखे शिक्षाविद् एवं वेंकटरमण रामकृष्णन जैसे नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक भी इन विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत आगमन के संबंध में उत्साहित नहीं दिखते।

"डीम्ड" से "नावाचार" की ओर!

केवल विदेशी विश्वविद्यालयों को आमंत्रण देकर ही सरकार संतुष्ट नहीं है। निर्णय किया गया है कि 14 नवाचार विश्वविद्यालय भी खोले जाएंगे जो इस समय कार्यरत विश्वविद्यालयों के लिए "मॉडल" की भांति कार्य करेंगे। ये सभी निजी क्षेत्र में होंगे और प्रत्येक एक विशिष्ट विषय को केन्द्र में रखकर स्थापित किए जाएंगे। ये पूरी तरह स्वायत्त होंगे, देशी-विदेशी संस्थानों से सहयोग कर सकेंगे, नियुक्तियों में इन्हें पूर्ण स्वतंत्रता होगी और अपने द्वारा प्रदान की जाने वाली उपाधियों का नामकरण तक स्वयं ही कर सकेंगे। वे अपने संचालन के लिए धन भी स्वयं ही जुटाएंगे यद्यपि कभी-कभी सरकार से भी अनुदान प्राप्त कर सकेंगे।

इस प्रस्ताव में देश के शिक्षाशास्त्रियों को बहुत से खोट नजर आ रहे हैं और इसीलिए प्रखर विरोध हो रहा है। कहीं यह पीछे के दरवाजे से बदनाम "डीम्ड" विश्वविद्यालयों को पुन:आमंत्रित करने का षड्यंत्र तो नहीं है? सरकारी दृष्टि में इनका स्तर बिना किसी ठोस आधार के उच्चतर (मॉडल) होने के कारण आज के पारंपरिक विश्वविद्यालय निराशा के गर्त में तो नहीं डूब जाएंगे? यदि इतनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता वर्तमान विश्वविद्यालयों को ही मिल जाए और वे लालफीताशाही एवं दृश्य तथा अदृश्य सरकारी हस्तक्षेप से पूर्णरूपेण मुक्त हो जाएं तो क्या वे भी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उच्चतम मानदंड स्थापित नहीं कर सकते? क्या यह सत्य नहीं है कि आज कुलपति जैसे उच्च पद पर बहुधा मूर्धन्य शिक्षाविदों को दरकिनार कर केवल राजनेताओं से निकटता के आधार पर जिस प्रकार के व्यक्तियों को नियुक्त किया जा रहा है, उनसे यह आशा करना भी व्यर्थ है कि वे संस्थान के अति प्रबुद्ध आचार्य वर्ग को अकादमिक नेतृत्व प्रदान कर सकते हैं। फिर नवाचार विश्वविद्यालयों को स्थापित कर पहले वालों को अपमानित करने जैसा प्रयास क्यों? यह तो प्रत्येक विश्वविद्यालय से सदैव ही अपेक्षित है कि वहां नये से नये विचार पनपेंगे, उन पर शोध होगा और इस प्रकार वे समाज के लिए दीप स्तंभ का कार्य करेंगे। इतना अवश्य है कि इसके लिए परिस्थितियां ऐसी होनी चाहिए कि वहां घुटन न हो जिसके चलते आज के अनेक विश्वविद्यालय उखड़ी सांस ले रहे हैं।

एक खतरा और भी है। पूर्णतया निजी हाथों में होने के कारण क्या नवाचार विश्वविद्यालय शिक्षा के खुले और निर्लज्ज बाजारीकरण के माध्यम नहीं बन जाएंगे? फिर ऐसे संस्थानों में भारत जैसे देश का गरीब किन्तु प्रतिभाशाली विद्यार्थी प्रवेश कैसे पा सकेगा? उसकी नियति तो फिर दोयम दर्जे के संस्थानों में शिक्षा प्राप्त करने की रह जाएगी। इससे देश में सम्पन्न तथा विपन्न वर्ग के बीच खाई और चौड़ी होगी। प्रश्न यह भी है कि किसी "थीम" को केन्द्र बिन्दु बनाए बिना क्या उच्चतम श्रेणी का शोध संभव नहीं है? याद करें अमरीका को जहां एक सामान्य प्रकार के "मल्टी फैकल्टी" विश्वविद्यालय में कार्य करते हुए ही सीबोर्ग ने लगभग पूरी की पूरी परायूरेनियम तत्वों की श्रेणी का अनुसंधान कर लिया था।

हमारे विश्वविद्यालय क्या करेंगे?

मानव संसाधन मंत्रालय का तीसरा प्रस्ताव है भारतीय वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) के सहयोग से एक अकादमी की स्थापना जो परिषद् की प्रयोगशालाओं में उपलब्ध सुविधाओं का उपयोग करते हुए इन विषयों के असामान्य से पहलुओं के प्रशिक्षण की व्यवस्था करेगी तथा शोध के माध्यम से स्थापना के पांचवें वर्ष से प्रति वर्ष विज्ञान में एक हजार तथा तकनीकी में 120 विद्यार्थियों को पीएचडी उपाधि प्रदान करेंगी। प्रस्ताव आकर्षक लगता है, परंतु क्या यही कार्य अनुदान देकर वर्तमान विश्वविद्यालयों में नहीं किया जा सकता? अभी भी परिषद की प्रयोगशालाओं के साथ सहयोग चलता ही रहता है तथा विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिक अपनी अनेक शोध योजनाओं को परिषद से पारित कराकर कार्यान्वित करते रहते हैं। फिर अकादमी में नया और क्रांतिकारी क्या होगा? इतना अवश्य होगा कि अकादमी बन जाने पर विश्वविद्यालयों के वैज्ञानिकों को परिषद की सुविधाओं का लाभ कम से कम मिलने लगेगा। कुल मिलाकर यह प्रस्ताव भी अकारण ही वर्तमान विश्वविद्यालयों का अकादमिक महत्व घटाने वाला सिद्ध हो सकता है।

उच्च शिक्षा के इस भावी चित्रपटल में अराजकता ही दिखाई पड़ती है। जरूरत तो है वर्तमान संस्थानों के ईमानदार, चुस्त और राजनीतिज्ञों के चंगुल से सर्वथा मुक्त प्रबंधन की, परंतु भाग रहे हैं हम मृगतृष्णा के पीछे। सच बात तो यह है कि भांति-भांति के विश्वविद्यालयों का प्रस्ताव विभ्रम की स्थिति उत्पन्न कर रहा है। यह आत्मविश्वास की कमी का द्योतक है और ऐसी कमी तब उपजती है जब देश की संस्कृति, इतिहास एवं परंपराओं का अभिज्ञान घटने लगता है।

(पूर्व अध्यक्ष-रसायन शास्त्र विभाग, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय, रोहतक एवं पूर्व अध्यक्ष-रसायन इंडियन साइंस कांग्रेस)

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