राजधानी दिल्ली के एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर कृषि और व्यापार की नीतियां बनाने वाले नौकरशाहों पर अमरीका और यूरोप की मॉल संस्कृति का जादू इस कदर छा गया है कि वे भारत की परंपरागत सीढ़ीनुमा विकेन्द्रित एवं स्वावलम्बी अर्थव्यवस्था को नष्ट करने पर तुल गये हैं। शायद वे नहीं जानते या जानकर भी अनजान बने रहना चाहते हैं कि पिछले दो वर्षों में अमरीका और यूरोप के तथाकथित समृद्ध देश मंदी की जिस चपेट में फंस गये थे, उससे भारत इसी परंपरागत अर्थव्यवस्था के कारण बचा रह गया था। अमरीका में बेरोजगारी की जो बाढ़ आयी, जिसके कारण राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भारत और चीन को अमरीका का मुख्य प्रतिद्वंद्वी घोषित कर दिया और अमरीका में रोजगार के अवसरों की बाड़ाबंदी शुरू कर दी, उसका श्रेय भारत की इस परंपरागत विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था को ही जाता है।
खेती पर निर्भरता
भारत की जनसंख्या का सबसे बड़ा भाग आज भी खेती से जुड़े अवसरों पर निर्भर है। उसके बाद दूसरे नम्बर पर वह विशाल वर्ग आता है जो खुदरा बाजार से अपनी जीविका कमाता है। सर्वेक्षणों के अनुसार इन खुदरा व्यापारियों और उन पर निर्भर कर्मचारियों की संख्या चार करोड़ से अधिक है, कम नहीं। सोलह करोड़ प्राणियों का भरण पोषण इस खुदरा व्यापार पर निर्भर है। इस खुदरा व्यापार पर चार लाख करोड़ रुपये की पूंजी लगी हुई है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का साढ़े सात प्रतिशत भाग खुदरा व्यापार से आता है। पर, इस विशाल पूंजी पर अमरीका की तरह कुछ मुट्ठीभर फर्मों या घरानों का कब्जा नहीं है, वह करोड़ों छोटे बड़े खुदरा व्यापारियों में बिखरी हुई है। अपनी अपनी हैसियत के अनुसार कम अधिक पूंजी से छोटी सी दुकान या खोमचा लगा कर वे अपना पेट पालते हैं, पर वे स्वतंत्र हैं, स्वावलम्बी हैं। हमारे देश ने स्वावलंबन को सबसे अधिक महत्व दिया है। इसके आधार पर ही जीविका के साधनों का वर्गीकरण किया है। भारत के देहातों में अभी भी यह पुरानी कहावत दोहरा दी जाती है-
उत्तम खेती, मध्यम बान। निकृष्ट नौकरी, भीख निदान।
अर्थात् पहला स्थान खेती को, दूसरा स्थान व्यापार (बान) को दिया गया, नौकरी को निकृष्ट माना गया और भीख तो सर्वथा त्याज्य है। पर अब नौकरी को ही प्रथम स्थान दिया जा रहा है। लोग खेती या स्वतंत्र व्यापार के बजाय सफेदपोश नौकरी पाने के लिए ललक रहे हैं। भारत की विशाल जनसंख्या की वृद्धि के अनुपात में खुदरा व्यापार में नौ प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जबकि अमरीका और यूरोप के बाजारों पर जड़ता छा गयी है, उनकी वृद्धि लगभग थम गयी है। इसलिए वालमार्ट, टेस्को, केरेफोर आदि-आदि विशाल पूंजीपति कंपनियां भारत के इस वर्धमान बाजार को ललचाई दृष्टि से देख रही हैं। और बिकाऊ नौकरशाहों के माध्यम से खुदरा बाजार के क्षेत्र में प्रवेश पाने के लिए भारत सरकार पर दबाव बना रही हैं। इसी 6 जुलाई को भारत सरकार के औद्योगिक नीति एवं प्रोत्साहन विभाग (डीआईपीपी) ने वाणिज्य मंत्रालय से सिफारिश की है कि किराना या खुदरा बाजार में 51 प्रतिशत विदेशी प्रत्यक्ष निवेश अविलम्ब लागू कर दिया जाए और आगामी पांच वर्षों में उसे शत प्रतिशत कर दिया जाए। इस विभाग ने अपनी सिफारिश के समर्थन में जो विचार पत्र सार्वजनिक चर्चा के लिए जारी किया है उसे इन विदेशी पूंजीपतियों का प्रचार पत्र कहना अधिक उचित होगा।
यथार्थ से परे
खुदरा व्यापार में विदेशी कंपनियों के प्रवेश के पक्ष में जो तर्क दिये गये हैं उनका भारत के यथार्थ से कुछ लेना देना नहीं है। कहा गया है कि इससे ग्राहकों को कम कीमत पर अच्छी किस्म के उत्पाद उपलब्ध होंगे। किसानों को उनके उत्पादन की अधिक कीमत मिलेगी क्योंकि ये विदेशी कंपनियां खेत से रसोई तक माल पहुंचाने के एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक तंत्र को खड़ा कर देंगी। उनके प्रवेश से आधुनिकतम तकनालॉजी और उत्पादों का भारत में प्रवेश होगा। इन तकर् को भारत सरकार और देश के पश्चिमाभिमुखी शहरी मध्यम वर्ग के गले उतारने के लिए खूब लेख लिखे जा रहे हैं, आंकड़ें गढ़े जा रहे हैं। "लाबिंग" पर करोड़ों रुपया खर्च किया जा रहा है। अमरीकी सीनेट के समक्ष पेश एक रिपोर्ट के अनुसार वालमार्ट भारत के खुदरा बाजार में पूंजीनिवेश की अनुमति पाने के लिए दो साल में 52 करोड़ रुपये "लाबिंग" पर खर्च कर चुकी है। चालू वर्ष 2010 की पहली तिमाही में ही उसने "लाबिंग" पर छह करोड़ रुपये खर्च कर दिये हैं। यह रुपया कहां गया? किसकी जेब में गया? कामनवेल्थ गेम्स के आयोजन में भ्रष्टाचार का जो विकराल रूप सामने आया है उसे देखकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि भ्रष्टाचार का घुन हमारे राजनीतिक व प्रशासन तंत्र की रग-रग में घुस चुका है और कोई भी विदेशी कंपनी हमारे नौकरशाहों का इस्तेमाल कर सकती है, शायद वालमार्ट जैसी बड़ी विदेशी कंपनियां भी यही कर रही हैं।
झूठी आंकड़ेबाजी
इस झूठी आंकड़ेबाजी और तर्कजाल का सर्वाधिक प्रभाव विदेशी कंपनियों में नौकरी पाने वाले नव धनाढ्य शहरी मध्यम वर्ग पर पड़ रहा है। वह क्रेडिट कार्ड वाली मॉल संस्कृति को अपने अनुकूल पाता है। पर वह भूल रहा है कि जितनी मात्रा और तेज गति से गरीबी रेखा के नीचे जीने को मजबूर परिवारों की संख्या भी बढ़ रही है, उनकी दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति कैसे होगी? कौन करेगा?
अभी तो भारत की पारंपरिक सीढ़ी नुमा अर्थव्यवस्था में एक कम पढ़ा, गरीब आदमी भी सड़क किनारे चाय का खोमचा लगाकर अपना गुजारा कर लेता है। गांव की बुढ़िया भी ताजी सब्जी टोकरे में रखकर सड़क के किनारे बैठ जाती है। खोमची रेहड़ी वाले मध्यम वर्गीय बस्तियों में माल लेकर पहुंच जाते हैं। एक निम्न मध्यम वर्ग की महिला अपने घर के एक कोने में रोजमर्रा की जरूरतों का खोमचा लगाकर मुहल्लेवालों को तुरंत उत्पाद सुलभ करा देती है। साप्ताहिक बाजारों में पहुंचकर ग्रामवासी और मध्यम वर्गीय महिलाएं "मल्टी ब्राांड मॉल" की सुविधा पा जाती हैं। एक ही बाजार में उन्हें सब स्तर का सब कुछ मिल जाता है। हरेक को अपनी हैसियत और रुचि के अनुसार वस्तुएं मिल जाती हैं। मैंने स्वयं अनुभव किया है कि उसी वस्तु का दाम पटरी बाजार से सदर बाजार, करोलबाग और साउथ एक्सटेंशन के स्टोर्स पर बढ़ता चला जाता है। पटरी पर बैठने वाले का खर्च कुछ नहीं है, साउथ एक्सटेंशन तक पहुंचते-पहुंचते दुकान के किराये और ठाठबाट का खर्चा उसमें जुड़ता जाता है और वही वस्तु महंगी होती जाती है। वालमार्ट की एक खुदरा दुकान के लिए 85000 वर्ग फुट जमीन चाहिए जबकि भारत में डेढ़ करोड़ खुदरा दुकानों में से केवल 4 प्रतिशत दुकानों के पास 500 वर्गमीटर या थोड़ा अधिक स्थान होगा। अधिकांश तो बहुत थोड़ी जगह में काम चला लेती हैं। विदेशी पूंजी से खुले मॉल में कर्मचारियों की फौज होगी, ग्राहकों को लुभाने के लिए सुंदर कन्याओं को खड़ा किया जाएगा, मॉल की जगमग पर बिजली का भारी खर्च होगा, क्रेडिट कार्ड की सुविधा होगी। यह सब खर्चा ग्राहक की जेब से नहीं तो कहां से आयेगा? मॉल की दर में नहीं जुड़ेगा तो कैसे होगा? प्रारंभ में ये कंपनियां पुराने दुकानदारों को उखाड़ने के लिए सस्ती दरों पर बेचेंगी, 50 से 90 प्रतिशत तक रियायत घोषित करेंगी। पर पुराने दुकानदार के उखड़ जाने पर वे अपना असली रंग दिखाएंगी। अपनी विशाल पूंजी के कारण अपने छोटे प्रतिद्वंद्वी को उखाड़ने तक घाटा सहन करने की क्षमता उनके पास है। पर उसका अंतिम परिणाम पूंजी के एकत्रीकरण और आर्थिक विषमता को बढ़ाने में होगा। इस दृष्टि से जरा वालमार्ट को देखो। उसकी सालाना आमदनी 350 अरब डालर से अधिक है। दुनिया के 88 देशों में उसके 4800 से अधिक स्टोर हैं। उसके पास 14 लाख कर्मचारियों की फौज है।
निराधार बात
किसानों को उनके उत्पादन का अधिक मूल्य मिलने की बात तो बिल्कुल निराधार है। प्रारंभ में अधिक भाव देकर वो किसानों को ठेके के अनुबंध में बांध देगी। किसान उनका गुलाम हो जाएगा। अठारहवीं शताब्दी का ईस्ट इंडिया कंपनी का इतिहास फिर से दोहराया जायेगा। पर यह आर्थिक गुलामी को न्योता देने के समान है।
अनाज के भंडारण में भारत सरकार की विफलता का लाभ उठाने के लिए ये विदेशी कंपनियां अनाज और सब्जी की अपनी भंडारण क्षमता का प्रचार कर रही हैं। यह स्थिति अनाज के व्यापार में सरकार के प्रवेश के कारण पैदा हुई है। मुझे अपने बचपन की याद है। तब अनाज का पूरा व्यापार स्थानीय दुकानदारों के पास था। हमारे कस्बे में आसपास के गांवों से किसान लोग बैलगाड़ियों व घोड़ों पर लादकर अपना अनाज लाते थे। मंडी में उनके उत्पादन पर भाव की बोली लगती थी। सबसे अधिक बोली लगाने वाले को किसान अपना माल बेचता था। अनाज के भंडारण के लिए हमारे यहां कई अहातों में जमीन के भीतर गहरी खत्तियां बनी थीं। प्रत्येक आढ़ती की खत्ती सुनिश्चित थी। वह अनाज खरीदकर उस खत्ती में डालता जाता था। खत्ती नीचे चौड़ी होती थी, ऊपर उसका छोटा सा मुंह होता था। अंदर अनाज को सुरक्षित रखने के लिए धान की भूसी का अस्तर लगाया जाता था। नीम की पत्तियां उसमें छोड़ी जाती थी और खत्ती के मुंह को हवा बंद कर दिया जाता है। जब से सरकार अनाज की खरीददार बनी, अनाज सड़ने लगा, पर गरीबों के लिए दुर्लभ हो गया।
भारत की प्राणशक्ति
विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था में ही भारत की प्राणशक्ति है। पूंजी केन्द्रित पश्चिमी मॉडल को अपनाकर हम कहीं के नहीं रहेंगे। पर हमारी सरकार आंख मूंदकर अर्थव्यवस्था के पश्चिमीकरण एवं पूंजीकरण की ओर दौड़ रही है। विदेशी पूंजी के दबाव में आकर वह 1997 में कैश एंड कैरी (थोक व्यापार) में शत प्रतिशत विदेशी निवेश का द्वार खोल चुकी है, 2006 में एकल ब्रांड खुदरा व्यापार में 50 प्रतिशत निवेश की अनुमति दे चुकी है। इसका लाभ उठाकर वालमार्ट ने एक भारतीय कंपनी भारती के साथ मिलकर अमृतसर, जालंधर और चंडीगढ़ के निकट स्टोर स्थापित कर लिये हैं। अब खुदरा किराना मार्केट में घुसने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। इस अभियान में नौकरशाही आगे है, नव धनाढ्य शहरी मध्यम वर्ग उसकी ओर आकर्षित है और विचारक व राजनेता वर्ग उदासीन है। डेढ़ करोड़ खुदरा व्यापारी वर्ग पूरी तरह असंगठित है, वह किसानों की तरह तोड़ फोड़ की आक्रामक नीति अपनाने में अक्षम है। इसलिए राजनेता वर्ग उसकी ओर से उदासीन है। वह किसान आंदोलन को तो लपककर पकड़ रहा है। अलीगढ़ जिले में किसानों द्वारा की गयी तोड़फोड़ से उत्साहित होकर अजीत सिंह, मुलायम सिंह से लेकर राहुल तक वहां पहुंच गये, उड़ीसा, कर्नाटक आदि राज्यों में किसान आंदोलन की आग पर अपनी राजनीति की रोटियां सेंकने की प्रतिस्पर्धा में लग गये हैं। पर पटरी या रेहड़ी पर खोमचा लगाने से लेकर एक छोटी सी दुकान पर बैठकर पेट भरने वाले खुदरा व्यापारियों के भविष्य की किसी को चिंता नहीं। वे आईटी को ही जीविकार्जन का मुख्य साधन मानने लगे हैं। वे भूल जाते हैं कि इस देश में बहुत बड़ा वर्ग ऐसे लोगों का है जो कम पढ़े लिखे, कम पूंजीवाले होकर भी खुदरा व्यापार से अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं। आश्चर्य तो उस बुद्धिजीवी वर्ग पर होता है जो वेश्याओं और विकलांगों की दुर्दशा पर तो घड़ियाली आंसू बहाता है पर समूचे व्यापारी वर्ग को शोषक व पूंजीपति समझने का भ्रम पाल बैठा है। कम से कम स्वदेशी जागरण मंच और भाजपा को जो विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था में विश्वास करते हैं, इस प्रश्न को पूरी शक्ति के साथ उठाना चाहिए। हम पांचजन्य (24 दिसंबर, 2006 व 2 सितम्बर, 2007) में इस खतरे के प्रति चेतावनी का स्वर उठा चुके हैं। आर्थिक स्वावलम्बन के लिए विदेशी पूंजी के प्रवेश को रोकना आवश्यक है। भारतीय कुटीर उद्योगों व संयमित उपभोग की परंपरागत जीवनशैली को बचाने का भी यही एक मार्ग हो सकता है। इस दृष्टि से इकानॉमिक टाइम्स (23 अगस्त) में आईआईएम बंगलूरु के प्रोफेसर जानतशाह एवं स्वतंत्र शोधकत्र्ता एम.जी.सुब्राहृण्यम ने एक संयुक्त लेख में खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के पक्ष में प्रचारित सब मिथकों का तथ्यपूर्ण खंडन किया है। अर्थशास्त्री कमलनयन काबरा और आनंद प्रधान ने भी इसके खतरों का तथ्यात्मक विवेचन किया है। अच्छा हो कि स्वदेशी जागरण मंच इस महत्वपूर्ण विषय पर थाईलैंड जैसे देशों के अनुभवों को समेटते हुए शोधपरक पुस्तिका तैयार करे। द (26-8-2010)
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