सम्पादकीय - विषधरवदनाद्विषमन्तरेण किमन्यन्निष्क्रामति। विषधर के मुख से विष के अतिरिक्त और क्या निकलता है? -हर्ष (नागानन्द, पंचम अंक)


कुचलो अलगाववाद को!

जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की अनुभवहीनता और लचर नीतियों ने कश्मीर घाटी में जो हालात बना दिए हैं, गत 3 माह से वहां हो रही भीषण हिंसा और पाकिस्तान प्रेरित देशद्रोही अलगाववादियों का खुलकर भारत विरोधी रवैया व इसके सामने पंगु हुआ प्रशासन इसका प्रमाण है। पूरे देश में कश्मीर की लगातार बिगड़ रही स्थिति से बेहद असंतोष व रोष है। लेकिन राहुल गांधी कह रहे हैं कि उमर अब्दुल्ला युवा हैं, वे राज्य में कठिन काम कर रहे हैं, उन्हें और समय व समर्थन दिया जाना चाहिए। जो उमर कश्मीर घाटी में "आजादी", "स्वायत्तता" की मांग व खुलेआम पाकिस्तानी झंडा फहराने व "इस्लामी कैलेंडर" लागू करने की हरकतों के मूकदर्शक बने हुए हैं और दबे-छिपे स्वर में राज्य में 1953 से पूर्व की विभाजनकारी स्थितियों को मौन समर्थन देते हैं, उनके शासन सूत्र संभाले रहते और राहुल गांधी व उनकी पार्टी कांग्रेस नीत केन्द्र सरकार की वोट की राजनीति के चलते कश्मीर की लगातार बिगड़ रही स्थिति के प्रति निरपेक्षभाव के रहते तो न राज्य में हालात को गंभीर रूप से बिगाड़ रही अलगाववादी जमात के हौसले पस्त किए जा सकेंगे और न वहां शांति स्थापित कर राष्ट्रीय एकता-अखंडता और भारत राष्ट्र की संप्रभुता के प्रति अनुकूल भाव निर्माण किया जा सकेगा। राहुल गांधी की टिप्पणियां मौजूदा स्थिति में शुतुरमुर्गी मानसिकता की ही द्योतक हैं कि सरकार दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए कश्मीर में देशद्रोही अलगाववादी व आतंकवादी तत्वों का मूलोच्छेदन करने की बजाय हालात का सामना करने से बचते हुए अपने राजनीतिक हितों के लिए हालात से नजरें चुराती रहे। प्रकारांतर से यह अराजक तत्वों के सामने घुटने टेकने की स्थिति ही है।

राहुल गांधी उमर के युवा होने की बात कहकर क्या संदेश देना चाहते हैं? उनकी "युवा अपील" की हवा तो दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ के चुनावों ने निकाल दी, जब वहां राहुल की सीधी दखल के बावजूद कांग्रेस के पोषित छात्र संगठन को बुरी तरह पराजय का सामना करना पड़ा और राष्ट्रवादी छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के प्रत्याशियों ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की। राहुल गांधी को यह समझ लेना चाहिए कि वोट राजनीति के खेल में संलिप्त सोनिया पार्टी घाटी में उपद्रवियों व अलगाववादियों से सख्ती से निपटने व सुरक्षाबल विशेषाधिकार अधिनियम खत्म न करने का दो टूक निर्णय लेने में भले ही दुविधा में पड़ी हो, परंतु कश्मीर में भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल राष्ट्रघातक तत्व किसी दुविधा में नहीं हैं। वे खुलेआम चुनौती दे रहे हैं। सैयद अली शाह गिलानी ने अब घाटी में लगातार कफ्र्यू का दंश झेल रही जनता को उकसाया है कि वह भीड़ के रूप में सैन्य व सुरक्षाबलों के शिविरों की ओर कूच करे ताकि टकराव बढ़े, गोलियां चलें, निर्दोष लोग मारे जाएं और इन अलगाववादियों को फिर सेना के खिलाफ शोर मचाने का मौका मिले। कश्मीर घाटी में जिहादी आतंकवादियों से लोहा ले रही सेना ही उनके मुख्य निशाने पर है। पाकिस्तान की शह पर सेना व सुरक्षा बलों के खिलाफ जनता को उकसाना, मानवाधिकार हनन का दुष्प्रचार व ऐसे झूठे मामलों का दबाव अलगाववादियों के हथकंडे हैं ताकि वहां पाकिस्तानी मंसूबों को पूरा किया जा सके। दुर्भाग्य से भारत की केन्द्रीय सत्ता राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने की बजाय राजनीति के लाभालाभ के द्वंद्व में उलझी रहकर कड़े फैसले लेने से बच रही है और भारत का मुकुटमणि कश्मीर लहूलुहान है। आखिर कश्मीर के नाम पर कांग्रेस और कितनी "राजनीति" करेगी? कश्मीर संकट की जड़ धारा 370 उसी "राजनीति" की देन है जो शेख अब्दुल्ला के गलबहियां डाले हुए नेहरू करते रहे। अब राहुल गांधी उमर को लेकर वही राग अलाप रहे हैं। देश और राष्ट्रहित राजनीति से ऊपर होता है, आवश्यकता है कि मनमोहन सरकार और कांग्रेस इसे गंभीरता से समझे और कश्मीर में शांति व राष्ट्रवाद की बयार बहे।

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