21वीं शताब्दी के क्षितिज पर भारत से लुप्त होती पारसी सभ्यता


द मुजफ्फर हुसैन

2011 भारत की जनगणना का वर्ष है। इसका श्रीगणेश हो चुका है। प्रथम चरण पूर्ण होने के पश्चात यह विश्वास था कि भारत सरकार जाति आधारित जनगणना को स्थान देकर भारत को सौ साल पीछे नहीं धकेलेगी। लेकिन सरकार द्वारा जाति आधारित जनगणना के समर्थन से आशा निराशा में बदल गई है। जाति आधारित जनगणना के नुकसान को विदेशी सत्ताधारी समझ गए थे लेकिन वोट की राजनीति करने वाले लालची राजनीतिज्ञ नहीं समझ सके हैं, यह आजाद भारत की सबसे बड़ी शोकांतिका है।

जनसंख्या क्षरण चिंताजनक

लेकिन इस जनगणना के पश्चात एक ऐसा ऐतिहासिक तथ्य हमारे सम्मुख आकर खड़ा हो जाएगा जिस पर भारतीय सदियों तक आंसू बहाते रहेंगे। 2001 की जनगणना में बताया गया था कि पारसी समाज की जनसंख्या केवल 67000 रह गई है। अब यह कितनी घटी है इसका पता इस बार की जनगणना में लग जाएगा। लेकिन जो परिस्थितियां हमारे सम्मुख हैं उससे तो जान पड़ता है कि सन् 2021 की जनगणना में पारसी भारत में उंगलियों पर गिने जाने लायक ही रह जाएंगे। एक समय था कि भारत के हर प्रदेश में कुछ न कुछ पारसी दिखाई पड़ते थे लेकिन अब तो केवल गुजरात के कुछ नगरों में और विशेष रूप से मुम्बई में ही यह ऐतिहासिक कौम दिखाई पड़ती है। जनसंख्या पर नजर रखने वालों का कहना है कि पारसी परिवार जिस तरह से सिकुड़ रहे हैं उससे तो लगता है कि यह सदी पारसियों की भारत में अंतिम सदी होगी। पारसियों की उन्नत विरासत से प्रेम करने वाले हर भारतीय के लिए यह स्थिति चिंताजनक है।

इस देश की भूमि पर अनगिनत सभ्यताएं आर्इं और काल कवलित हो गर्इं। अभी कल ही की बात है, इस देश में ब्रिाटिश, फ्रेंच और पुर्तगालियों ने झंडे फहराए थे। हूण और शक का नाम तो अब केवल इतिहास के पन्नों में है। अमरावती स्थित मेलघाट के जंगलों में कुकरी बोली से मिलती-जुलती बोली बोलने वाले केवल चार वनवासी शेष रह गए हैं फिर भी हम उन्हें भूतकाल की वस्तु मानने के लिए तैयार नहीं हैं तब तो पारसियों को हम इतना जल्द कैसे भुला देंगे? स्वस्थ और युवाशक्ति के प्रतीक टाटा ने पिछले दिनों जब अपने औद्योगिक साम्राज्य से सेवानिवृत्त होने और अपने उत्तराधिकारी की तेजी से तलाश करने की घोषणा की तो पारसी समाज को जानने वाले लोगों ने एक मुख से कहा कि यही वह भावना है जो पारसियों के इतिहास को याद दिलाती रहेगी। पारसी मतांतरण में विश्वास नहीं रखते। उनके यहां विवाह और अज्ञारी के नियम इतने कड़े हैं कि वे किसी कीमत पर उसे तोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए उनके धर्मगुरू इस बात में विश्वास रखते हैं कि हर धर्म को ईश्वर ने एक विशेष उद्देश्य से जन्म दिया है इसलिए यदि परमात्मा की नजरों में वह उद्देश्य पूर्ण गया है तो फिर हमें उसके बीच में आने की क्या आवश्यकता है? पारसी अग्निपूजक होते हैं। कृषि प्रधान देशों में भारत का सनातन धर्म, चीन का कन्फ्यूशियस पंथ जिस तरह से प्रख्यात है उसी प्रकार ईरान का अति प्राचीन पंथ जरथ्रुत द्वारा प्रचारित जोराष्थ्रीयन पंथ है जिसे हम सरल भाषा में पारसी पंथ के नाम से जानते हैं।

जब भारत आए थे पारसी...

सातवीं शताब्दी में जब ईरान पर अरबों ने हमला किया तो उसे बुरी तरह से बर्बाद कर दिया। लूट में जो मिला उसे लेकर वे चले गए। लेकिन जब ईरान के प्राचीन पंथ जोराष्थ्रीयन पर उन्होंने हमला किया और उन्हें तलवार के बल पर मतान्तरित करने का प्रयास किया तब वे अपनी पवित्र अग्नि यानी नवज्योति को लेकर भारत की ओर चल पड़े। ईरान से पलायित होकर पारसी जलमार्ग द्वारा भारत के समुद्र तट पर पहुंचे और गुजरात के बंदरगाह संजान पर उतरे। उस समय वहां एक गुजराती हिन्दू राजा का राज था। राजा को बताया गया कि लाल चेहरे वाले गोरे चिट्टे कुछ विदेशी हमारे समुद्र तट पर उतरे हैं। राजा ने जब उनकी मंशा जानी तो पता लगा कि उनका पंथ खतरे में है इसलिए वे अपनी पवित्र ज्योति को लेकर यहां पहुंचे हैं। उनका आग्रह है कि वे हमें अपने इस राज्य में शरण दें। हिन्दू राजा ने पहले तो मना कर दिया लेकिन बहुत आग्रह के साथ पारसियों के प्रमुख ने कहा कि हम पर विश्वास कीजिए। हमें यहां आकर किसी साम्राज्य की स्थापना की भूख नहीं है। दूरदर्शी हिन्दू राजा ने इन नव आगंतुकों के साथ एक अनुबंध करवाया। इसमें तीन शर्तें मुख्य थीं कि "पहली यह कि तुम हमारे सामने कभी हथियार नहीं उठाओगे। दूसरी शर्त थी कि तुम अपने सभी ग्रंथों का गुजराती में अनुवाद करवाओगे। तीसरी शर्त यह होगी कि तुम्हारी महिलाएं हमारी महिलाओं के समान साड़ी पहनेंगी।" छोटे से इस राजा ने उस समय इतना बड़ा काम किया जो आजादी के बाद हमारी भारत सरकार नहीं कर सकी। इन तीन शर्तों द्वारा राजा ने इन पारसियों का सम्पूर्ण रूप से भारतीयकरण कर दिया। इसका नतीजा यह आया कि पारसी समाज का टकराव यहां के बहुसंख्यक समाज से कभी नहीं हुआ।

दूध में चीनी हैं पारसी

उक्त अवसर पर ईरान से पारसियों के साथ आए बुजुर्ग दस्तूर जी ने कहा था कि राजा हम तो दूध में शक्कर बनकर रहेंगे। शक्कर दूध में अपना कभी अलग अस्तित्व नहीं रखती। हम देख रहे हैं कि 1300 वर्ष व्यतीत हो जाने के बाद भी पारसी इस देश के लिए कभी समस्या नहीं बने। उन्होंने भारत को अपना घर माना और मां भारती ने उन्हें अपने बेटे की तरह हर प्रकार के अधिकार प्रदान किये। पारसियों की पांथिक भाषा केवल अज्ञारियों तक सीमित रही। पारसियों ने गुजरात में पहला कदम रखा और उसी दिन से गुजराती भाषा ही नहीं बल्कि सम्पूर्ण गुजराती संस्कृति को अपना लिया। ब्रिाटिश साम्राज्य में पारसियों का बड़ा दबदबा था लेकिन एक भी ऐसी घटना पढ़ने को नहीं मिलती है जिससे उनका वैमनस्य या अलगाव दिखाई पड़ता हो। एक समय था कि पारसी दक्षिण गुजरात में वडोदरा, गोधरा, भरूच, सूरत, नवसारी और बिल्लीमोरिया में बड़ी संख्या में रहते थे लेकिन ज्यों-ज्यों मुम्बई का विकास होता गया वह बड़ी संख्या में मुम्बई में ही आकर अपना व्यवसाय और नौकरी करने लगे। अंग्रेजों के साथ उनके मधुर संबंध रहे। 1640 में दोराब जी नाना भाई पटेल और फिर 1735 में लोवजी नसरवान ने जो ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारंभिक दौर में समुद्री जहाज का प्रथम उद्योग प्रारंभ किया और वाडिया के नाम से प्रख्यात हुए। 17वीं शताब्दी से आज तक मुम्बई को पारसियों से और पारसियों को मुम्बई से अलग करके उसका इतिहास नहीं लिखा जा सकता है। भारत में जब स्वतंत्रता आंदोलन प्रारंभ हुआ उसमें पारसियों की नई और पुरानी पीढ़ी ने साथ मिलकर अग्रणी रूप से भाग लिया। क्या भारत दादाभाई नौरोजी के समकालीन पारसी राष्ट्रवादियों को भूल सकता है? वीर सावरकर ने जब लंदन में प्रथम भारतीय तिरंगा फहराने का संकल्प लिया था उस समय मैडम कामा ने इस भगीरथ कार्य को अंजाम देकर यह विश्वास व्यक्त किया था कि भारत तो एक दिन आजाद होकर ही रहेगा और यह लहराता हुआ ध्वज मां भारती की अल्पसंख्यक वर्ग की एक पुत्री का नाम याद दिलाता रहेगा। जब अंग्रेजी अखबार स्वतंत्रता सेनानियों के समाचार प्रकाशित नहीं करते थे उस समय 1822 में फरदून जी मर्ज़बान ने गुजराती में मुम्बई समाचार दैनिक प्रारंभ करके सबको चौंका दिया था। बाद में उन्होंने मुम्बई क्रोनीकल नामक अंग्रेजी दैनिक भी प्रकाशित किया था। मुम्बई समाचार आज भी नियमितता से प्रकाशित होता है। यह एशिया के अति प्राचीन अखबारों में से एक है। भारत में औद्योगिक क्रांति का तो नाम ही पारसियों से जुड़ा हुआ है। टाटा शब्द सारी दुनिया में प्रख्यात है। लोकोमोटिव रेलवे इंजन से लगाकर हमारे दैनिक जीवन की वस्तुओं में टाटा हर जगह दिखाई पड़ते हैं। इतने बड़े परिवार में कोई स्पर्धी नहीं और भाईयों के बीच कोई ऊंच नीच नहीं। भारत में शायद ही कोई घर होगा जिस पर गोधरा से आए गोदरेज का आधिपत्य ताले के रूप में नहीं दिखाई पड़ता हो। आजाद भारत को बलवान बनाने का सवाल आया तो होमी जहांगीर भाभा भारत की परमाणु शक्ति के पितामह बनकर उभरे। पाकिस्तान ने जब अपनी अकड़ नहीं छोड़ी तो जनरल मानिक शॉ भारत के सरसेनापति बनकर विजय पताका फहराने के लिए ढाका की ओर चल पड़े। कानून की दुनिया में नानी पालकीवाला को कौन भूल सकता है। क्या गुजराती साहित्य और क्या क्रिकेट, हर जगह पारसी चौके और छक्के मारते दिखाई पड़े हैं।

कभी कुछ नहीं मांगा

भारत की आजादी के बाद जब संविधान बना तो उन्हें अल्पसंख्यक वर्ग का स्थान दिया गया। इन अल्पसंख्यकों में मुस्लिम, ईसाई और सिखों को भी शामिल किया गया। भारतीय संविधान सभा में भी पारसी सदस्य थे उन्होंने कहा कि हमें इसकी आवश्यकता महसूस नहीं होती है। यह बात केवल कहने की नहीं थी उन्होंने उसे करके दिखाया। किसी क्षेत्र में उन्होंने कोई विशेष रियायत नहीं मांगी बल्कि अपनी क्षमतानुसार उन्होंने हर क्षेत्र में काम करके दिखाया। दुनिया में आज पारसी एक ऐसे अल्पसंख्यक हैं जो न तो शिक्षा में, न ही रोजगार में और न ही राजनीति के किसी क्षेत्र में कोई मांग रखते हैं। वे अपने हाथ-जग के नाथ में विश्वास रखते हैं। उन्होंने न तो केन्द्र सरकार से और न ही किसी राज्य सरकार से कोई अधिकार मांगे। इसके बावजूद वे आज भारत में सबसे प्रतिष्ठित अल्पसंख्यक वर्ग के रूप में याद किये जाते हैं। ऐसा समुदाय यदि भारत की धरती से नामशेष हो जाएगा तो किसे दुख नहीं होगा? ग़्

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