पटना/ संजीव कुमार - बिहार विधानसभा चुनाव


संघर्ष 5 साल, बनाम 15 साल, बनाम 40 साल के बीच

बिहार में चुनावी शंख बच चुका है। 6 चरणों में बिहार विधानसभा का चुनाव होना है। मुख्य मुकावला जद (यू)-भाजपा गठबंधन एवं राजद-लोजपा गठबंधन के बीच होना है। कांग्रेस बिहार में त्रिकोणीय संघर्ष की जमीन तैयार करने में जुटी है। लेकिन आम जनता वोट देने के पहले तीनों घटकों के कार्यकाल की तुलना अवश्य करना चाहेगी।

लालू राज्य की तुलना कभी पटना उच्च न्यायालय ने जंगल राज से की थी। वाकई स्थिति भी वैसी ही थी। महिलाएं शाम के बाद घर से बाहर सुरक्षित नहीं थीं। जब तक बच्चे स्कूल से वापस घर नहीं आ जाते थे तब तक माता-पिता को चिंता लगी रहती थी। किस व्यक्ति की गाढ़ी कमाई, जमीन-जायदाद कब कौन ले भागेगा, कोई नहीं जानता था? लालू यादव के 15 साल में विकास ठप्प, आम जन भयभीत तथा भविष्य अंधकारमय था। यह पतन का दौर कांग्रेस के समय से ही प्रारंभ हो गया था।

प्रदेश में जब पहली बार चुनाव हुए थे तो बिहार भारत के अग्रणी राज्यों में से एक था। जवाहर लाल नेहरू ने राज्यों के विकास की अद्यतन स्थिति जानने के लिए "एपल बाई समिति" गठित की थी। इस समिति ने अपनी रपट में कहा था कि बिहार विकास एवं अन्य मापदंडों पर भारत का दूसरे नम्बर का राज्य है। लेकिन बाद में कांग्रेस ने अपने कुशासन से राज्य की हालत बिगाड़ दी। बिहार घोटालों का राज्य बन गया। सहकारिता घोटाला सरीखे कई घोटाले सामने आए। चारा घोटाले की शुरूआत भी कांग्रेस शासनकाल में ही हुई थी जो लालू राज में कई गुना बड़ा हो गया। बहुचर्चित बॉबी हत्याकांड भी कांग्रेस कार्यकाल में ही हुआ था। लोगों का ऐसा मानना है कि एक पत्रकार की सक्रियता से इस हत्याकांड का सच सामने आया। वास्तव में ऐसे कई घिनौने हत्याकांड कांग्रेस काल में हो चुके थे जिन्हें कांग्रेसियों ने अपने छल-बल से दबा दिया।

पापिया बोस अपहरण कांड को याद कर आज भी भागलपुर की जनता सहम जाती है। शिक्षा व्यवस्था भी कांग्रेसी शासनकाल से ही चौपट हो गयी थी। सभी विभागों का माफियाकरण कांग्रेस के शूरवीरों ने कर दिया था। शिक्षा माफिया, भू माफिया, को-आपरेटिव माफिया सरीखे कई माफिया कांग्रेस शासनकाल में ही पैदा हुए। चिकित्सा व्यवस्था भी कांग्रेस शासन में ही चौपट हुई। बिहार के अपराधियों को राजनीति में प्रवेश कांग्रेस ने ही देना शुरू किया था।

40 साल के कांग्रेसी शासन के बाद लालू राज में बिहार की स्थिति बद से बदतर हुई। कांग्रेस ने बिहार में जिस सड़न को प्रारंभ किया था उसे लालू ने बहुत ज्यादा फैला दिया। बिहार में वही रुका जिसके पास कोई विकल्प नहीं था। हालात ऐसे थे कि लगता ही नहीं था कि बिहार सुधर सकता है। बिहार से बाहर जाने वाले अधिक एवं आने वाले कम थे। प्रमुख व्यावसायिक प्रतिष्ठान या तो बंद हो रहे थे या अपना केन्द्र बिहार से बाहर ले जा रहे थे। पटना के प्रमुख डी. लाल एण्ड सन्स, पटना किराना स्टोर सरीखे प्रतिष्ठानों के मालिक पटना छोड़ने को विवश हो गए। स्कॉर्ट, भारत बैगन सरीखी कम्पनियों ने अपना पटना स्थित कार्यालय बंद कर दिया। लालू यादव की बेटी की शादी में मारुति शो रूम से कार यूं ही उठा ली जाती थीं और बाद में वापस दे दी जाती थीं। पटना का शायद ही कोई व्यवसायी होगा जिससे लालू के गुर्गों ने जबरन पैसे नहीं लिये होंगे। बिहार के प्रमुख चिकित्सक भी डरे-सहमे रहते थे। पटना के एक प्रख्यात चिकित्सक के अपहरण की मध्यस्थता मुख्यमंत्री आवास पर ही हुई थी। यह बिहार की आम दिनचर्या थी। शिल्पी गौतम हत्याकांड के छींटे लालू के दुलारे साले साधु यादव पर पड़े थे। हालांकि साधु यादव ने अब कांग्रेस का दामन थाम लिया है।

ऐसे माहौल में नीतीश कुमार के नेतृत्व में जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी गठबंधन सरकार ने सत्ता संभाली। सत्ता परिवर्तन के साथ ही लोगों ने बिहार में बदलाव देखना शुरू कर दिया। जहां कई वर्षों से सड़कें नहीं बन रही थीं वहां दिन-रात सड़कें बनने लगीं। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की संख्या कई गुना बढ़ गई जो सरकारी चिकित्सा व्यवस्था में आमजन की स्वीकार्यता की सूचक है। लालू राज में जो विकास दर 4 प्रतिशत थी, वही राजग काल में 11 प्रतिशत हो गयी। एक रपट के अनुसार सन् 2004-08 के बीच बिहार की साक्षरता दर में 7.7 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई जो देश के सभी राज्यों में सबसे अधिक है। बिहार में जहां पहले कुछ हजार विदेशी पर्यटक आते थे वहीं इस वर्ष साढ़े तीन लाख विदेशी पर्यटक बिहार घूमने आये, जो बिहार की बढ़ती हुई साख को बताता है। नीतीश कुमार का शासन आने के बाद युवतियां-महिलाएं रात में सात बजे के बाद भी घूमने में डर महसूस नहीं करती हैं। अपराधों में अप्रत्याशित कमी आयी है। लोग स्वयं को ज्यादा सुरक्षित मान रहे हैं। नये उद्योग बिहार में भले ही न लगे हों लेकिन कार्यरत उद्योगों में कई ने अपनी क्षमता का विस्तार किया है। सरकार ने उद्योगों के अनुकूल माहौल बनाने का प्रयास भी किया है।

इन पांच वर्षों में जनता का खोया हुआ विश्वास लौटा है। परन्तु कई मोर्चों पर अभी कार्य करना बाकी है। शिक्षा के क्षेत्र में कोई विशेष बदलाव नहीं देखने को मिल रहा है। निरक्षरता दूर करने में सरकार भले ही सफल हुई हो परन्तु उच्च एवं माध्यमिक शिक्षा की स्थिति जस की तस है। शैक्षणिक सत्र आज भी सही नहीं है। पढ़ने वाले छात्र बिहार से बाहर जाना ज्यादा उचित समझते हैं। सरकारी विद्यालयों में गरीब परिवार के बच्चे ही पढ़ने को विवश हैं। अफसरशाही का रवैया नीतीश शासनकाल का काला अध्याय है।

बिहार का चुनाव जात-पांत पर लड़ा जाता है। लालू और रामविलास पासवान ने जातीय समीकरणों को ध्यान रखकर ही गठबंधन बनाया है। कांग्रेस की मंशा बिहार में त्रिकोणीय संघर्ष बनाने की है। कांग्रेस 30-35 सीटें जीत कर सबका गणित बिगाड़ने की कोशिश में है। राहुल के धुआंधार प्रवास का एक मात्र मकसद यही है। लालू और रामविलास अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं। परन्तु बिहार की जनता राजनीतिक रूप से सबसे समझदार मानी जाती है। वह इन सबका खेल और अतीत देख चुकी है, इसलिए वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मारेगी।

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