हिन्दी की दुर्दशा
केवल हिन्दी ही ऐसी भाषा है, जिसने भारतीय संस्कृति को एकसूत्र में पिरोया है। विभिन्न भाषा-भाषी लोग इसी के माध्यम से एक दूसरे से अपने विचार व्यक्त करते हैं। यह सीखने में सरल एवं देश में सर्वसाधारण की बोलचाल की भाषा है। इसका साहित्य अत्यंत समृद्ध है। स्वतंत्रता के पश्चात् इसे राष्ट्रभाषा तथा राजभाषा का रूप देने के लिए महात्मा गांधी, डा. राजेन्द्र प्रसाद, पुरुषोत्तम दास टंडन, सेठ मालपाणी, डा. राममनोहर लोहिया जैसे नेताओं ने अथक परिश्रम करके संविधान में इसे राजभाषा के पद पर आसीन कराया था, किन्तु मुट्ठीभर अंग्रेजी समर्थकों की सोची-समझी रणनीति के कारण संविधान में संशोधन किया गया कि जब तक देश के सभी राज्य राजभाषा के रूप में इसे लागू करने में सहमत नहीं होते, तब तक अंग्रेजी ही राजभाषा के रूप में प्रयोग की जायेगी। इस प्रकार अनिश्चित काल के लिए हिन्दी को उसके पद से हटा दिया गया और आज तो अंग्रेजी ही स्थायी रूप से "राजभाषा" बन गई है। उस समय अगर हिन्दी भाषियों द्वारा इसका विरोध किया जाता, तो इस संशोधन का स्वरूप बदला जा सकता था, किन्तु ऐसा नहीं हुआ।
आज तो अन्य प्रांतों को छोड़िये, स्वयं हिन्दी भाषी प्रान्त ही अपने राज्यों में सैकड़ों कॉन्वेंट स्कूल खोलकर बच्चों को शुरू से अंग्रेजी पढ़ाने में लगे हुए हैं। हिन्दी समाचार पत्र-पत्रिकाएं सैकड़ों अंग्रेजी शब्दों को हिन्दी में लिखकर छापने में व्यस्त हैं। यहां तक कि हिन्दी सिनेमा के नाम भी अंग्रेजी में रखे जाने लगे हैं। इससे अधिक किसी भाषा की दुर्दशा और क्या हो सकती है? इस स्थिति में भारतीय सभ्यता और संस्कृति को एक ओर रखकर अंग्रेजी सभ्यता और संस्कृति में देश के लोग रंग नहीं जाएंगे तो क्या होगा?
मानो हमारे देश की कोई भाषा ही नहीं है। विदेशी अंग्रेजी भाषा ही हमारे देश की भाषा बन गई है। अपने बच्चों को कम से कम प्राथमिक तक मातृभाषा में शिक्षा देने की जरूरत भी लोग नहीं समझते। आज भारतीय सभ्यता और संस्कृति को जीवित रखना है तो हिन्दी को उसका उचित स्थान दिलाना होगा। यदि सब हिन्दीभाषी जनता, हिन्दी के पक्षधर राजनीतिक दल और समाजसेवी संगठन गहराई से सोचकर इस विषय पर अपना प्रयत्न शुरू करें और सरकार से हिन्दी की प्रगति के प्रयत्न कराकर इसे राजभाषा का स्थान दिलाने के लिए आंदोलन करें तो भारतीय सभ्यता और संस्कृति को एक कड़ी में बांधने वाली इस भाषा को उसका उचित स्थान दिलाया जा सकता है।
-एस.के. तिवारी
46, योगक्षेम कालोनी, स्नेहनगर, वर्धा रोड, नागपुर (महाराष्ट्र)
शत्रु सम्पत्ति पर श्री अरुण कुमार सिंह की रपट "तुष्टीकरण की पराकाष्ठा" आने वाले संकट की चेतावनी है। "शत्रु सम्पत्ति विधेयक-2010" में संशोधन खुला देशद्रोह है। दुखद स्थिति तो यह है कि सरकार ही इसे शह देने पर उतारू है। जो सरकार पाकिस्तान से आने वालों को उनकी सम्पत्ति लौटा रही है, क्या उसने कभी यह सोचा कि पाकिस्तान से हिन्दू किस दशा में भारत आए थे? क्या हिन्दुओं को पाकिस्तान में उनकी सम्पत्ति मिल सकती है? कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार देश को बर्बाद करने में लगी हुई है।
-ठाकुर सूर्यप्रताप सिंह सोनगरा
कांडरवासा, रतलाम (म.प्र.)
द 1947 में भारत विभाजन के दौरान पाकिस्तान में लाखों हिन्दू-सिख ही नहीं मारे गये, बल्कि हजारों मन्दिर, गुरुद्वारे और हिन्दुओं की हवेलियां पाकिस्तानियों ने नष्ट कर दी थीं। उ.प्र. और बिहार के मुसलमानों ने पाकिस्तान और मुस्लिम लीग का 1939-1947 तक सबसे अधिक समर्थन किया था। जबकि वर्तमान पाकिस्तानी इलाकों से मुस्लिम लीग और जिन्ना को कभी भी समर्थन नहीं मिला। इसलिए इनके वंशजों को इनकी सम्पत्ति किसी भी रूप में वापस करना 1947 में देश को तोड़ने वालों को पुरस्कार देने के बराबर होगा।
-डा. सुशील गुप्ता
शालीमार गार्डन कालोनी, बेहट बस स्टैण्ड,
सहारनपुर (उ.प्र.)
द जो लोग शत्रु सम्पत्ति लौटाने की बात कर रहे हैं, वे आज के "जयचन्द" हैं। यह कैसा सेकुलरवाद है, जिसकी आड़ में अपनी मातृभूमि को ही सेकुलर नेता दु¶मन के हवाले करने जा रहे हैं? शत्रु सम्पत्ति किसी भी स्थिति में न लौटाई जाए। अगर यह सम्पत्ति लौटा दी गई तो देश में अराजकता की स्थिति पैदा हो जाएगी, जिसको संभाल पाना आसान नहीं होगा।
-हरीश अवस्थी
सी-5/111, सेक्टर-11, रोहिणी (दिल्ली)
द संप्रग सरकार का एकमात्र लक्ष्य, सोनिया-राहुल के अरमानों को पूरा करना है। "शत्रु सम्पत्ति विधेयक-2010" में संशोधन भी इसीलिए किया जा रहा है। यह तुष्टीकरण नहीं, बल्कि राष्ट्र पर आघात है। वस्तुत: कांग्रेस मुसलमानों को सिर्फ "वोट बैंक" के रूप में ही देखती है। कांग्रेस तो अपना असली शत्रु उन राष्ट्रवादियों को मानती है, जो उसके मंसूबों को पूरा नहीं होने देते हैं।
-डा. उमेश मित्तल
गंगोह रोड, सहारनपुर (उ.प्र.)
ह्मदय में मन्दिर बन चुका
आवरण कथा "भव्य मंदिर निर्माण का संकल्प" पढ़ी। दरअसल भगवान श्रीराम का मन्दिर तो हर भक्त के ह्मदय में बन चुका है। आवश्यकता है, भक्तों को एक करने की। इसके लिए व्यापक आन्दोलन चलाया जाना चाहिए। पहले राजा-महाराजा होते थे, व्यवस्था बदली तो एक साधारण व्यक्ति भी विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री बन रहा है। इसी तरह हिन्दू समाज के अन्दर भी कई ऐसी कमजोरियां हैं, जिन्हें समाप्त कर हिन्दुओं को एक करना होगा।
-बी.आर. ठाकुर
सी-115, संगम नगर, इन्दौर (म.प्र.)
द अयोध्या में भगवान श्रीराम का भव्य मंदिर बनना बहुत आवश्यक है। जब विश्व में राम मंदिर विदेशियों द्वारा बनवाये जा रहे हैं, तो भारत में प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान पर मंदिर क्यों नहीं बन सकता? बाबर से पहले अयोध्या में श्रीराम मंदिर था, ऐसा पुरातत्व विभाग भी कहता है। बाबर तो 1526 में भारत को लूटने के उद्देश्य से आया था। सबसे पहले उसने भारत के पूजाघरों को नष्ट कराया। इसके पीछे उसका इरादा भारत की संस्कृति को नष्ट कर देना था।
-प्रदीप सिंह राठौर
2 जी, ब्लाक नं. 3, मेडिकल कालेज,
कानपुर (उ.प्र.)
द श्रीराम किसी एक व्यक्ति, वर्ग, जाति, सम्प्रदाय के नहीं हैं। किसी एक देश और क्षेत्र के साथ भी नहीं हैं और न ही वे केवल मनुष्य के ही हैं। वे तो पशु-पक्षी, पेड़-पौधे और समग्र सृष्टि के हैं। उनके अयोध्या में आते ही लोक जीवन में सुख का रास्ता खुल गया। ध्वंस और विनाश छंटने लगा। निर्माण और विकास फैलता गया। अयोध्या तो "अयोध्या" है। जहां युद्ध नहीं होता, जहां वध नहीं होता। इसलिए अयोध्या में प्रभु श्रीराम का मंदिर अवश्य बनना चाहिए।
-डा. ब्राहृदत्त अवस्थी
1/239, नगला दीना, फतेहगढ़,
फर्रुखाबाद (उ.प्र.)
द सम्पादकीय "मदनी की गिरफ्तारी से जुड़े सवाल" से स्पष्ट संकेत मिलता है कि देश में एक ऐसा वर्ग पैदा हो गया है, जो सोच-समझकर देशद्रोहियों का समर्थन करता है। मदनी वर्षों से विवादास्पद बना हुआ है। कई बम-विस्फोटों में उसका हाथ बताया जा रहा है। साक्ष्यों के आभाव में वह एक बार आदालत से छूट भी चुका है। गुप्तचर एजेंसियों की मानें तो उसकी करतूतें अभी भी जारी हैं। इसके बारे में स्थिति इतनी स्पष्ट होने के बाद भी सेकुलर जमात उसे पाक-साफ बता रही है।
-गणेश कुमार
पुनाईचक, पटना (बिहार)
बधाई के पात्र
भारत और विश्व के मुसलमान उन सभी लोगों को काफिर मानते हैं, जो उनके खिलाफ होते हैं। उन्हें उनकी हां में हां मिलाने वाले या उनके हितों का पोषण करने वाले या उनके उद्देश्य में आड़े न आने वाले लोग प्रिय हैं। भारतीय राजनीति में भी यही हो रहा है। भारत में सही बात को कहने, समझने वाले बहुत कम मुसलमान हैं। पाञ्चजन्य के स्तंभ लेखक श्री मुजफ्फर हुसैन बधाई के पात्र हैं, जो सच लिखने का साहस करते हैं। लेकिन क्या मुस्लिम समाज के नेता और मुस्लिम वोट बैंक को हड़पने वाले तथाकथित सेकुलर नेता कुछ समझेंगे?
-डा. उमेश मित्तल
गंगोह रोड, सहारनपुर (उ.प्र.)
देशद्रोहियों का मौन समर्थन?
गुजरात एवं नरेन्द्र मोदी के बारे में बढ़-चढ़कर आलोचना करने वाले लालू यादव, मुलायम सिंह यादव, रामविलास पासवान तथा वामपंथी नेता कश्मीर के मामले में खामोश कैसे हैं? इशरत जहां और सोहराबुद्दीन के लिए जमीन-आसमान एक कर देने वाले नेताओं को कश्मीर के मुसलमानों की देशद्रोही हरकतें कैसे हजम हो रही हैं? मतान्तरण का दबाव डालकर कश्मीर घाटी को हिन्दुओं से खाली करा लिया गया। अब उसी प्रकार का दबाव सिखों पर डाला जा रहा है। ऐसे समय में हमारे देश के सेकुलर नेता क्या पाताल लोक में आराम कर रहे हैं? हिन्दुओं के विरुद्ध दहाड़ने वाले ये नेता कश्मीर के मामले में मिमिया रहे हैं या कश्मीर के देशद्रोहियों का मौन समर्थन कर रहे है? देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ करने वालों का मौन समर्थन सेकुलरों को बहुत महंगा पड़ सकता है। देश की जनता "सौ सुनार" की बात के साथ-साथ "एक लुहार" की बात भी अच्छी तरह से जानती है और धैर्य समाप्त हो जाने पर उसे अपना भी सकती है। अत: सभी सावधान होकर देश की अस्मिता के साथ यह नंगा नाच शीघ्र बंद करायें। इसी में सबकी भलाई है।
-परमानंद रेड्डी
डी/19, सेक्टर-1, देवेन्द्रनगर
रायपुर (छत्तीसगढ़)
पञ्चांग
वि.सं.2067 - तिथि - वार - ई. सन् 2010
आ• कृष्ण 3 रवि 26 सितम्बर, 2010
"" 4 सोम 27 ""
"" 5 मंगल 28 ""
"" 6 बुध 29 ""
"" 7 गुरु 30 ""
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(जीवत्पुत्रिका व्रत) 8 शुक्र 1 अक्तूबर, 10
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(गांधी जयंती) 9 शनि 2 ""
पाठकों से निवेदन
अनेक पत्र ऐसे प्राप्त होते हैं, जिनमें केवल नाम लिखा होता है। इस स्थिति में उन पत्रों को प्रकाशित करने में कठिनाई होती है। अत: पाठकों से निवेदन है कि वे अपना पूरा नाम और पता अवश्य लिखें। अंक से संबंधित पत्र समय पर भेजेंगे तो उन्हें स्थान देने में हमें सुविधा होगी। -सं.
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