स्वायत्तता प्रदान करने की आवश्यकता -विजय देवांगन


अ.भा. संगठन मंत्री, सहकार भारती

सहकार भारती सहकार क्षेत्र में कार्य करने वाली एक संस्था है। जोकि सहकारिता जगत को पूर्णतया समर्पित है। सहकारिता, भारत की जीवनशैली रही है। प्राचीन काल में इसी शैली के आधार पर अर्थव्यवस्था चला करती थी। आर्थिक दृष्टि से गांव का प्रत्येक परिवार अपनी सालभर की उपज का एक हिस्सा गांव के अन्न भंडार में देता था, उसी से गांव में किसी परिवार पर आए संकट की स्थिति में मदद की जाती थी। ऐसी अपने देश की परम्परा रही है। भारत में सन् 1904 में सहकारिता का कानून बनने के बाद से ही अनेक पंजीकृत संस्थाएं सहकार क्षेत्र में काम करने लगीं। सहकार भारती भी विभिन्न क्षेत्रों में सहकारिता की पंजीकृत संस्थाएं बनाकर कार्य करती है। सहकार भारती ऐसे सहकारी क्षेत्रों का निर्माण करना चाहती है, जो पारदर्शिता और विश्वास के आधार पर देश के निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों की समृद्धि को रेखांकित कर सकें। साथ ही ऐसे कार्यकर्ता तैयार करना चाहती है, जो सहकारिता जगत के लिए अपनी सम्पूर्ण शक्ति लगाकर सहकारिता की शुद्धि, वृद्धि एवं समृद्धि के माध्यम से भारत को विकसित और समृद्धशाली बनाने में अपना योगदान दे सकें। इन सबके जरिए सहकार भारती देश के निम्न और मध्यम वर्ग के लोगों को आत्मनिर्भर और स्वावलंबी बनाना चाहती है। वर्तमान में सहकारिता के कानून में परिवर्तन की बहुत आवश्यकता है। सामान्यत: सहकारिता स्वायत्त नहीं है, इसे स्वायत्त होना बहुत आवश्यक है। जब तक सहकारिता स्वायत्त नहीं होगी, तब तक यह जन-सामान्य की नहीं हो सकती। द

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