श्री रामजन्मभूमि आंदोलन के धुर विरोधी भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि अब श्री रामजन्मभूमि पर अवस्थित मंदिर को हटाया नहीं जा सकता। वे केवल भव्य मन्दिर के निर्माण को कुछ समय के लिये टाल सकते हैं, परन्तु हमेशा के लिये इस विषय को कोई भी स्थगित नहीं कर सकता। भव्य मन्दिर के निर्माण के लिये हिंदू समाज की प्रतिबद्धता स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। श्री रामजन्मभूमि आंदोलन का लक्ष्य वहां भव्य राममंदिर निर्माण होते हुए भी इस आंदोलन के परिणाम इससे कहीं अधिक व्यापक एवं चमत्कारिक हैं जिन्हें सूक्ष्मता के साथ विश्लेषण करने वाले साफ-साफ देख रहे हैं तथा सम्पूर्ण विश्व महसूस कर रहा है।
अंग्रेजों ने रचा षड्यंत्र
वस्तुत: श्री रामजन्मभूमि आन्दोलन ने भारत की राष्ट्रीयता को पुन:प्रतिष्ठित किया है। अंग्रेजों के समय से ही भारत की राष्ट्रीयता के सम्बन्ध में कुछ भ्रम निर्माण किये गये। भारत का स्वरूप एक राष्ट्र का है या यह एक निर्माणाधीन राष्ट्र है? यदि यह राष्ट्र है तो यह प्राचीन राष्ट्र है या नवोदित राष्ट्र? यदि यह राष्ट्र है तो इसकी राष्ट्रीयता क्या है? आदि ऐसे और भी कई प्रश्न थे जो अंग्रेजों के आने से पहले इस राष्ट्र के मानस में कभी नहीं रहे थे। भारतीय जनमानस अपने राष्ट्र और राष्ट्रीयता के विषय में हमेशा से ही नि:शंक रहा है। परन्तु भारत को कमजोर व विभाजित रखने के अपने घोषित लक्ष्य के कारण अंग्रेजों ने इन भ्रमों का निर्माण किया और दुर्भाग्य से भारत के कुछ राजनेताओं ने अपने निहित स्वार्थों के कारण अंग्रेजों के इस षड्यंत्र में सहयोग दिया। इन दोनों की दुरभिसंधि के कारण भारत का प्रबुद्ध वर्ग इस भ्रमजाल में फंस गया। भारत के एक प्रमुख नेता ने वाग्जाल रचा, "काफिले आते गये, कारवां बसता गया।" एक अन्य ने "गंगा-जमुनी तहजीब" के नाम पर राष्ट्रीयता की मनमानी व्याख्या की। इन सब भारतीय नेताओं को यह ध्यान नहीं रहा कि वे भारत के साथ कितना बड़ा अनाचार कर रहे हैं। राष्ट्रीयता केवल बौद्धिक बहस का विषय नहीं, यह राष्ट्र की आत्मा है। इसकी पहचान को भुलाकर वे सम्पूर्ण देश को अज्ञान के अंधकार में ही नहीं डुबोते आ रहे, बल्कि भारत की जनता में एक ऐसा हीन भाव निर्माण कर रहे हैं, जो भारत को कभी स्वाभिमानी राष्ट्र के रूप में खड़ा नहीं कर पायेगी। जिन जीवन-मूल्यों को यह समाज हमेशा से अपनाकर एक सभ्य समाज के रूप में अपनी पहचान बनाये रखे था, जिन राष्ट्र-पुरुषों से प्रेरणा प्राप्त कर यहां का जनमानस अपने समाज को प्रगति के मार्ग पर ले जाया करता था, इस भ्रम में उलझाकर उसे यह सब भूलने के लिये विवश किया गया। बाद में सेकुलरवाद के थोथे नारे के आधार पर इस भ्रम को न केवल गहरा किया गया, अपितु देशभक्तों को अपमानित व हमलावर आतंकवादियों को महिमामंडित करने का एक देशघाती षड्यंत्र किया गया। छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोबिन्द सिंह जैसी विभूतियों को अपमानित किया गया तथा बर्बर हमलावर एवं हिन्दुओं के हत्यारे बाबर, औरंगजेब जैसों को ऊंचा दिखाने के लिये नए-नए शब्दों की रचना की गई। इन दुर्दांत आतंकवादियों के नाम पर देश की सड़कों के नाम रखकर इन्हें सम्मानित किया गया। जिन हमलावरों ने भारत व यहां की जनता को रौंदा है वे देश को कैसी प्रेरणा देंगे? गौरी, गजनी, बाबर, औरंगजेब जैसे बर्बर हमलावरों को "प्रेरणा पुरुष" मानने वाले देशभक्त कैसे हो सकते हैं? हर देश की सेना की परम्परा रहती है कि सैनिकों को उस धरती के महापुरुषों की याद दिलाकर उत्साहित किया जाता है। क्या भारत की सेना को "गजनी व बाबर जिंदाबाद" के नारे लगाकर देश की रक्षा के लिये प्रेरित किया जा सकता है?
देशभक्तों पर अत्याचार
आजादी के बाद के इतिहास लेखन, शिक्षा नीति व वोट-बैंक की राजनीति ने न केवल इन प्रश्नों को खड़ा करने वालों को "साम्प्रदायिक" कहकर अपमानित करने का पाप किया, अपितु भारत के देशभक्त समाज को सब प्रकार के अत्याचार सहते हुए भी चुप रहने के लिये विवश कर दिया। 1947 के बाद 1,50,000 से अधिक हमले झेलने, कश्मीर घाटी में अमानवीय अत्याचार सहने वाला हिंदू सहम कर अपनी आवाज तक नहीं उठा पाता जबकि गजनी, गोरी को आदर्श मानने वाला वर्ग सेकुलरवाद की दुहाई देकर अपने अत्याचारों की भीषणता को और तेज करता जा रहा है। भारत की सेकुलर सरकारें भारत के करदाता का पैसा उन पर पानी की तरह बहाती हैं।
इन सभी प्रश्नों का उत्तर महर्षि अरविंद ने उत्तरपाड़ा के अपने सुप्रसिद्ध भाषण में दिया था, "सनातन धर्म ही राष्ट्रीयता है। हिंदू जाति उसी धर्म को लेकर पैदा हुई, उसी को लेकर चलती है व पनपती है। जब धर्म की हानि होती है तो जाति की भी अवनति होती है।" इसका स्पष्ट अर्थ है कि यदि हिंदू समाज का पतन होता है तो राष्ट्र का भी पतन निश्चित है। हिंदू हमेशा से ही इस देश के पुत्र-समाज के रूप में इस देश का रक्षण-पोषण करता रहा है। वही अपनी मनीषा व पुरुषार्थ के कारण भारत को गौरवान्वित करता रहा है। इसलिए हिन्दुत्व भारत की राष्ट्रीयता का पर्यायवाची बन गया। हिंदू किसी पूजा-पद्धति का नाम नहीं अपितु उन जीवन मूल्यों का नाम हैं जो इस देश की पहचान हैं तथा इस समाज ने उन जीवन मूल्यों के अनुसार न केवल अपना जीवन जिया है अपितु इनका संवद्र्धन भी किया है। यह तथ्य भारत के मनीषी और दार्शनिक ही नहीं, भारत के माननीय सर्वोच्य न्यायालय ने भी कई मामलों में स्वीकार किया है। परन्तु दुर्भाग्य से "सेकुलरवाद" के नाम पर इस उदात्त व गौरवशाली दर्शन व इतिहास के स्वामी को एक हीन भावना से ग्रस्त होने के लिये विवश किया गया। यदि हिंदू निराश हो गया तो भारत अपने भविष्य के प्रति कैसे आशान्वित हो सकता है? यदि हिन्दू में हीन भावना आ गई तो भारत कैसे गौरवयुक्त हो सकता है? जिन जीवन मूल्यों के कारण भारत महान बना था, अब उनकी चर्चा करना भी अपराध बना दिया गया है।
इतिहास का महत्वपूर्ण अध्याय
श्री रामजन्मभूमि आंदोलन के कारण भारत में चर्चा चली कि भारत के राष्ट्र पुरुष कौन हैं? इस सशक्त आंदोलन के कारण ही सम्पूर्ण देश ने यह स्वीकार किया कि इस देश के राष्ट्र पुरुष भगवान श्रीराम, श्रीकृष्ण, शिवाजी, महाराणा प्रताप, गुरु गोबिन्द सिंह ही हो सकते हैं। गजनी, बाबर, औरंगजेब आततायी ही थे। वे केवल देशद्रोहियों के प्रेरणा-केन्द्र हो सकते हैं, देशभक्तों के नहीं। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप ही हिंदू आत्महीनता का भाव छोड़कर एक नये गौरव और स्वाभिमान के साथ खड़ा हो गया। वह केवल अपनी ही नहीं भारत के मान-बिन्दुओं, जैसे यहां के महापुरुष, साधु-संत, तीर्थस्थल, पवित्र नदियों, गाय माता आदि की रक्षा के लिए सन्नद्ध हो गया। इसलिए वर्षों से इतिहास की पुस्तकों में कलंकित किये जा रहे हमारे राष्ट्र-पुरुषों के सम्मान की रक्षा करते हुए इन पुस्तकों में आवश्यक परिवर्तन किये गये। अब भारत ही नहीं सम्पूर्ण विश्व को ध्यान में आ गया कि भारत की राष्ट्रीयता क्या है, कौन सा समाज भारत का राष्ट्रीय समाज है। इसीलिये एक विदेशी लेखक कॉनराड ऐल्ज ने अपनी एक पुस्तक में लिखा कि "अब हिंदू समाज खड़ा हो गया है इसलिये भारत के उत्थान को दुनिया की कोई ताकत नहीं रोक सकती।" नोबल विजेता वी.एस. नायपॉल ने लिखा कि श्री रामजन्मभूमि आंदोलन भारत के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अर्थात महर्षि अरविंद के द्वारा दी गई राष्ट्रीयता की परिभाषा अब मुखर होकर न केवल सामने आ गई अपितु उसे सबने स्वीकार किया।
अब पूरी दुनिया के विद्वान उन सब सिद्धांतों को ठुकरा रहे हैं जिनके कारण भारत के राष्ट्र होने या उसके प्राचीन राष्ट्र होने पर भ्रम निर्माण करने के षड्यंत्र किये गये थे। "आर्यों के आक्रमण" का सिद्धांत तथा "आर्य-द्रविड़ का भेद" केवल भारत के कुछ निहित स्वार्थों वाले तथाकथित इतिहासकारों व उनके लेखनों तक सीमित रह गया है। हमारे ज्ञान के आधार वेद, रामायण, गीता, उपनिषद आदि के बारे में निर्माण किये गये भ्रम समाप्त हो गये हैं। भारत के राष्ट्र-पुरुषों भगवान श्रीराम व भगवान श्रीकृष्ण की ऐतिहासिकता पर लगाये गये प्रश्नचिन्ह मिटते जा रहे हैं। अब एक बात स्पष्ट रूप से सामने आ चुकी है कि भारत एक प्राचीन राष्ट्र है। राम-कृष्ण, राणा प्रताप, शिवाजी, राजा भोज आदि इसके राष्ट्र-पुरुष हैं तथा इनको आदर्श मानने वाला ही यहां का राष्ट्रीय समाज है। भारत पर हमला करने वाले आक्रांता इस देश के राष्ट्र- पुरुष नहीं हो सकते तथा कोई भी समूह तब तक राष्ट्रीय नहीं हो सकता जब तक वह उन आक्रांताओं को अपना आदर्श मानता रहेगा। इसलिए इस प्रकार के समूहों को 6 दिसम्बर, 1992 के दिन को अपने लिए सौभाग्यशाली मानना चाहिये जिसने इनको बाबर की यादों से मुक्त होने का अवसर दिया।
नवजागरण का आंदोलन
यह घटनाक्रम भारत में एक नये राष्ट्रीय नवजागरण आंदोलन का आधार बना है। भारत में जब-जब संकट के बादल छाये हैं तब-तब एक नवजागरण आंदोलन खड़ा हुआ है, जिसके परिणामस्वरूप किन्हीं कारणवश सुस्त पड़ गया हिन्दू समाज एक नवचैतन्य के साथ खड़ा होता है तथा संकट के बादल छिटक जाते हैं। यूनानी, हूण, कुषाण, शक, मुस्लिम या अंग्रेजों के आक्रमणों के समय हर बार एक नवजागरण आंदोलन खड़ा हुआ और उसके परिणामस्वरूप इन विदेशी हमलावरों को अपनी पराजय स्वीकार करनी पड़ी। कभी-कभी इनके सामने भारत के कुछ राजा हार गये होंगे, परन्तु इस नवजागरण के कारण हिंदू समाज ने कभी पराजय स्वीकार नहीं की। इन सब नवजागरण आंदोलनों का आधार हमेशा भारत का अध्यात्म ही रहा है। कभी चाणक्य तो कभी श्री गुरुनानक, श्री गुरु तेगबहादुर, श्री गुरु गोबिन्द सिंह, समर्थ गुरु रामदास, स्वामी विद्यारण्य, स्वामी रामानन्द आदि सैकड़ों संत इनके सूत्राधार रहे। अंग्रेजों के समय पर भी वंदेमातरम्, रामराज्य, गोरक्षा जैसे संकल्प भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रेरणा रहे। आध्यात्मिकता इन आंदोलनों की ही नहीं, भारत की आत्मा रही है। आजादी के बाद सेकुलरवाद के नाम पर भारत की आत्मा को न केवल सुप्त कर दिया गया, अपितु उसे आत्मग्लानि के भाव से भरने का षड्यंत्र किया गया। श्री रामजन्मभूमि आंदोलन ने फिर से भारत की आत्मा को जगाया। कभी स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि "गर्व से कहो मैं हिन्दू हूं", परन्तु इसी नवजागरण का परिणाम था कि अब इस जयघोष के साथ करोड़ों हाथ एक साथ उठते हैं कि "गर्व से कहो हम हिन्दू हैं।" इसी नवजागरण का परिणाम है कि भारत के विकास की जो भविष्यवाणी चार सौ वर्ष से भी अधिक समय पहले की गई थी अब सामने लायी जा रही है। नॉस्त्रादामस, महाकवि सूरदास आदि की भविष्यवाणियां इस नवजागरण के बाद ही सामने लाई गर्इं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति डा. अब्दुल कलाम का यह वाक्य सबको ध्यान में रखना चाहिए कि भारत को यदि विकास करना है तो उसे गीता व उपनिषदों के मार्ग पर चलना होगा। इस आंदोलन का ही परिणाम है कि भारत एक नई अंगड़ाई लेकर प्रगति के मार्ग पर चल पड़ा है। उसका यह मार्ग उसकी आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा प्रशस्त किया गया है तथा उसकी पहचान श्रीरामजन्मभूमि आन्दोलन के कारण ही हुई है।द
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