अंग्रेजी दैनिक "हिन्दू" के 31 अगस्त 2010 के अंक में प्रोफेसर विमल प्रसाद के शोधग्रंथ "पाथवे टु इण्डियाज पार्टीशन" (भारत विभाजन का यात्रापथ) पुस्तक की विस्तृत समीक्षा पढ़कर आनंद और आश्चर्य दोनों हुए। 1433 पृष्ठों का यह विशाल शोध ग्रंथ तीन खंडों में प्रकाशित हुआ। 319 पृष्ठों का पहला खंड 1999 में बाजार में आ गया था। 469 पृष्ठों का दूसरा खंड एक वर्ष बाद सन् 2000 में प्रकाशित हुआ और 645 पृष्ठों का तीसरा खंड 21 मार्च 2009 को मुझे मिल गया था। 24 मई 2009 के पांचजन्य में मैंने भारत विभाजन की वैज्ञानिक कारण मीमांसा शीर्षक से पाठकों का ध्यान इस महत्वपूर्ण ग्रंथ की ओर आकर्षित किया। उसके पूर्व भी बार-बार मैं उसके संदर्भ देता रहता था। लेकिन मुझे आश्चर्य और दुख होता था कि इतने श्रेष्ठ ग्रंथ की विद्वत्जगत में लगभग पूर्ण उपेक्षा हुई। एकाध को छोड़कर उसकी समीक्षा किसी शोध पत्रिका या व्यापक प्रसार वाले दैनिकों-साप्ताहिकों में पढ़ने को नहीं मिली। प्रो.विमल प्रसाद से पूछने पर पता चला कि प्रकाशक ने समीक्षार्थ प्रतियां कई जगह भेजीं, ए.जी.नूरानी जैसे नियमित समीक्षा लेखक तो विमल बाबू से प्रति मांगकर ले गये किंतु उन्होंने समीक्षा नहीं लिखी। शायद इस शोध ग्रंथ में प्रस्तुत तथ्य और निष्कर्ष उनकी अपनी धारणाओं से मेल नहीं खाते थे। बौद्धिक जगत पर "वामपंथी प्रभाव" के कारण स्वाभाविक ही यह भी लगा कि वामपंथी बौद्धिकों ने जो मुस्लिम समर्थक नीति अपना रखी है, उस कारण उन्हें लगा होगा कि समाजवादी पृष्ठभूमि के एक शीर्ष प्रतिष्ठित विद्वान द्वारा अब तक प्रचारित माक्र्सवादी दृष्टि के सप्रमाण खंडन को जनदृष्टि में लाना उनके हित में नहीं होगा। शायद इसीलिए उन्होंने जानबूझकर उसकी "उपेक्षा द्वारा हत्या" की नीति अपनायी।
उपेक्षा करने में कुशल वामपंथी
वामपंथी बौद्धिक इस कला में बहुत कुशल हैं। उसके अनेक उदाहरण दिये जा सकते हैं। इस दृष्टि से अपना एक व्यक्तिगत अनुभव भी झिझक के साथ हम आपको बता दें। 2007 में हमने एक छोटी सी पुस्तक लिखी जिसका शीर्षक था "डिड मास्को प्ले फ्राड ऑन माक्र्स? (क्या मास्को ने माक्र्स के साथ छल किया?) इस पुस्तक में हमने प्रमाणों और संदर्भों के साथ यह छानबीन की कि 1857-58 की भारतीय महाक्रांति के समय अमरीका के एक दैनिक पत्र "न्यूयार्क डेली ट्रिब्यून" में इस क्रांति के बारे में जो लेख, सम्पादकीय और रपटें लेखक या संवाददाता का नाम दिये बिना छपीं, उन्हें सौ साल बाद 1959 में मास्को से प्रकाशित "इंडियन वार आफ इंडिपेंडेंस" में माक्र्स और एंजिल का लेखन किस आधार पर बताया गया? क्या वे लेख और रपटें सचमुच इन दोनों की लिखी हुई थीं या मास्को ने उन्हें माक्र्स और एंजिल पर थोप दिया था? यह पुस्तक 2007 में दिल्ली में आयोजित भारतीय इतिहास कांग्रेस अधिवेशन में वितरित व प्रदर्शित की गयी। कई प्रमुख माक्र्सवादी इतिहासकारों को हमने स्वयं उसकी प्रति भेंट की इस प्रार्थना के साथ कि इस पुस्तक में जो तथ्य गलत हों, या जो साक्ष्य छूट गये हों अथवा जो विकृतियां हों, उन्हें बताने की कृपा करें। किंतु आज तक किसी माक्र्सवादी बौद्धिक ने उस पर कोई टिप्पणी नहीं की। यदि उस पुस्तक में कोई जान नहीं थी तो वे उसका मजाक तो उड़ा ही सकते थे।
प्रो. पणिक्कर की व्यास दृष्टि
वैसे भी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने ही मुस्लिम लीग की देश विभाजन की मांग का खुला समर्थन किया था। इसलिए उस ग्रंथ के प्रथम खंड के प्रकाशन के ग्यारह वर्ष बाद उसके कवर के चित्र के साथ प्रो.के.एन.पणिक्कर जैसे जाने माने माक्र्सवादी बौद्धिक के द्वारा लिखी इस समीक्षा को पढ़कर बहुत आनंद हुआ। प्रो.पणिक्कर जे.एन.यू.में प्रोफेसर पद से सेवानिवृत्त हुए। केरल की वामपंथी सरकार ने उन्हें आदि शंकराचार्य के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय का कुलपति बना दिया। वह "केरल हिस्टॉरिकल रिसर्च काउंसिल" के अध्यक्ष रहे। "इंडियन काउंसिल आफ हिस्टॉरिकल रिसर्च" द्वारा प्रायोजित "टूवड्र्स फ्रीडम" प्रकल्प के सन् 1940 वर्ष पर केन्द्रित खंड 4 के वे संपादक हैं। दो वर्ष पूर्व "इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस" के वे अध्यक्ष रहे। तथाकथित हिन्दू सम्प्रदायवाद के विरुद्ध एक जुझारू योद्धा की छवि उन्होंने अर्जित की।
समीक्षा के लेखक के रूप में उनका नाम देखकर आश्चर्य और आनंद तो हुआ ही, थोड़ी शंका भी हुई। किंतु समीक्षा के शीर्षक "पालिटिक्स आफ पार्टीशन" के नीचे एक पंक्ति के इंट्रो ने शंका को निर्मूल कर दिया। यह पंक्ति कहती है "राष्ट्रीय आंदोलन और मुस्लिम पृथकतावादी राजनीति की भूमिका के दौर पर एक उपयोगी प्रकाशन"। अंदर उन्होंने माना कि गांधी जी के नेतृत्व में राष्ट्रीय कांग्रेस विभाजन को रोकने के लिए प्रयत्नशील थी तो मुस्लिम लीग एक पृथक सार्वभौम राज्य पाने के लिए कटिबद्ध थी। उन्होंने स्वीकार किया कि ब्रिाटिश-पूर्व काल में हिन्दू मुस्लिम एकता का जो मोहक चित्र प्रस्तुत किया जाता है, वह सत्य नहीं है। वस्तुत: उस काल में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच धार्मिक और सामाजिक दूरियां विद्यमान थीं। उनके बीच अविश्वास और घृणा का अस्तित्व मध्यकाल से ही चला आ रहा था और वही अंतत: देश विभाजन में प्रतिफलित हुआ। इस दृष्टि से प्रो.विमल प्रसाद के ग्रंथ के प्रथम खंड में "मुस्लिम राष्ट्रवाद" की विचारधारात्मक आधार भूमि का अध्ययन नयी दृष्टि प्रदान करता है और प्रो. इरफान हबीब जैसे वामपंथी बौद्धिकों द्वारा हमारे मन-मस्तिष्क पर आरोपित मिथकों को धराशायी कर देता है।
दूसरे और तीसरे खंडों में यह मुस्लिम राष्ट्रवाद अपने धार्मिक-सामाजिक आधारों से आगे बढ़कर राजनीतिक आयाम ग्रहण कर लेता है और "राष्ट्र के भीतर राष्ट्र" की विभाजक भूमिका अपना लेता है। प्रो.पणिक्कर जिन्ना से पहले ही द्विराष्ट्रवाद की विचारधारा के अस्तित्व के प्रमाण स्वरूप 1908 में मुस्लिम लीग के अध्यक्ष सैयद अली इमाम के मुसलमानों को विजेता और हिन्दुओं को विजित जैसे कथनों का उल्लेख करते हैं, द्विराष्ट्रवाद की इस भाषा को वे 1933 में रहमत अली द्वारा वितरित पाकिस्तान पत्रक तक ले जाते हैं। पता नहीं क्यों वे सर सैयद अहमद के 1887 में लखनऊ और 1888 में मेरठ भाषणों का जिक्र तक नहीं करते जबकि द्विराष्ट्रवाद का सबसे स्पष्ट प्रतिपादन इन भाषणों में उपलब्ध है। और प्रो. विमल प्रसाद ने अपने ग्रंथ में न केवल इस तथ्य को प्रमुखता से रेखांकित किया है, बल्कि सर सैयद के उन भाषणों को भी अविकल दिया है। प्रो.पणिक्कर ने सर सैयद का उल्लेख अनजाने में छोड़ा है या विचारपूर्वक, यह कहना हमारे लिए कठिन है।
प्रो. विमल प्रसाद का अद्भुत अध्ययन
इस शोध ग्रंथ के पीछे प्रो.विमल प्रसाद के परिश्रम और व्यापक अध्ययन की सराहना करते हुए प्रो.पणिक्कर लिखते हैं कि इस विषय के साथ उनके जीवन व्यापी जुड़ाव का परिणाम है यह विशाल ग्रंथ। मुस्लिम राजनीति और मजहबी राष्ट्रवाद की विजय का यह सुसंदर्भित अध्ययन है। वे लिखते हैं कि इस ग्रंथ को लिखने के लिए प्रो.प्रसाद ने सरकारी संस्थात्मक एवं निजी श्रेणी के बहुविध स्रोतों का बहुत व्यवस्थित अध्ययन एवं धैर्यपूर्वक मनन किया है। मुस्लिम राजनीति पर इन तथ्यपूर्ण खंडों को प्रामाणिक संदर्भग्रंथ का स्थान प्राप्त होगा। अध्येता और शोधकर्ता भारत के राष्ट्रीय आंदोलन विशेषकर मुस्लिम पृथकतावादी राजनीति की भूमिका के रूप में इन खंडों को बहुत ही उपयोगी पाएंगे।
प्रो.पणिक्कर ने इस समीक्षा में जिस दृष्टि और शब्दावली को अपनाया है वह भारत के माक्र्सवादी इतिहासकारों द्वारा अब तक प्रस्तुत दृष्टि और भाषा से बिल्कुल विपरीत है। तो क्या यह माना जाय कि प्रो.पणिक्कर का वैचारिक परिवर्तन हुआ है और दलीय अनुशासन की डोर में बंधे माक्र्सवादी बौद्धिकों ने हिन्दू विरोध की भावना से भरकर अब तक मध्य काल के इतिहास के साथ जो खिलवाड़ किया, मुस्लिम पृथकतावाद की वकालत की, गांधी प्रणीत भारतीय राष्ट्रवाद का विरोध किया, उस सबसे प्रो.पणिक्कर का मोहभंग हुआ है, संजय के समान उन्हें भी व्यासदृष्टि प्राप्त हो गयी है या उनका यह आकस्मिक वैचारिक परिवर्तन भी किसी तात्कालिक राजनीतिक मजबूरी का परिणाम है?
वामपंथ का मुस्लिम वोट-बैंक ढहा
प.बंगाल और केरल में माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उसका वाममोर्चा इस समय मुस्लिम वोट बैंक को अपने हाथ से खिसकता देखकर बहुत चिंतित है। बंगाल में 20 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं के सहारे ही वह अब तक चुनाव जीतता आया था। पर नंदीग्राम में भूमि अधिग्रहण के प्रश्न को लेकर वहां के 65 प्रतिशत मुस्लिम निवासी जमीयत उल उलेमा के सिद्दीकुल्लाह के नेतृत्व में माकपा के विरुद्ध खम ठोक कर खड़े हो गये और ममता बनर्जी के साथ चले गये। इसलिए माकपा बार-बार ममता पर मुस्लिम साम्प्रदायिकता को भड़काने का आरोप लगा रही है। हिन्दू वोट बैंक को अपने पीछे खड़ा करने के लोभ में हिन्दू-मुसलमान दंगे भी भड़का रही है। उसी प्रकार केरल में माकपायी मुख्यमंत्री अच्युतानंदन आजकल केरल में जिहादी खतरे पर लगातार बोल रहे हैं। केरल की चुनावी राजनीति का ध्रुवीकरण मुस्लिम, ईसाई और हिन्दू आधार पर होता आया है। इधर, चर्च भी वाममोर्चे के विरुद्ध खम ठोककर खड़ा हो गया है, इसलिए वाममोर्चा अपनी स्थिति को बहुत डांवा-डोल पा रहा है। उन्हें आशा थी कि चर्च द्वारा संचालित न्यूमैन कालेज में 25 वर्ष से पढ़ा रहे प्रो.टी.जे.जोसेफ पर मुस्लिम अतिवादियों के सशस्त्र आक्रमण के बाद चर्च मुस्लिम आक्रामकता के खतरे के प्रति चिंतित होगा। किंतु उलटा हो रहा है। पहले तो चर्च के आदेश पर कालेज ने मुस्लिम गुंडों के हमले में अपना पंजा कटाने वाले प्रो.जोसेफ को न केवल नौकरी से निकाल दिया, बल्कि घोषणा की कि जब तक मुस्लिम समाज की ओर से उन्हें दोबारा नौकरी में रखने की मांग नहीं उठायी जाएगी तब तक हम पुनर्विचार नहीं करेंगे। यह एक प्रकार से असंभव शर्त है। जिन मुस्लिम संगठनों ने एक प्रश्नपत्र में केवल एक प्रश्न में "मुहम्मद" नाम आने पर दिन दहाड़े उस प्रोफेसर की कलाई काट ली, वे उनको दोबारा नौकरी में रखने की मांग क्यों करेंगे? चारों ओर से निंदा होने के बाद भी यदि चर्च अपने इस निर्णय पर डटा हुआ है तो उसके पीछे कोई विशेष कारण अवश्य है। कल के "हिन्दू" (15सितम्बर) में प्रो.पणिक्कर ने मुस्लिम कट्टरवाद के समक्ष चर्च की इस घुटना टेक नीति पर भारी चिंता प्रगट की है। उन्होंने इस नीति को आत्मघाती बताया है। उनका यह लेख प्रदर्शित करता है कि अब वे मजहबी कट्टरवाद को सबसे बड़ा खतरा मानने लगे हैं। यदि उनका यह वैचारिक परिवर्तन स्थायी बने तो बहुत लाभदायक होगा। वस्तुत: बुद्धि मात्र एक वकील की भूमिका निभाती है। दृष्टि परिवर्तन के साथ वह नये तकर्#ो#ं और कई बार परस्पर विरोधी तकर्#ो#ं को गढ़ने में सक्षम है। सक्षम हिन्दू मेधा माक्र्सवादी प्रवाह में बह जाने के कारण अपनी ही संस्कृति और पूर्वज परंपरा की निंदा करने में लग गयी। उसने अपना पूरा तर्क बल राष्ट्रीय आंदोलन के विरुद्ध और पृथकतावादी विघटनकारी प्रवृत्तियों के पोषण में लगा दिया।
भारत में माक्र्सवादी मुखौटा
विश्वभर में माक्र्सवाद की विफलता के बाद भी भारतीय माक्र्सवादी उस मुखौटे से चिपके रहे यद्यपि उनकी प्रेरणा अब विचारधारा न रहकर केवल सत्ता पाना और सत्ता में टिके रहना बन गयी। यदि ऐसा न होता तो 33 वर्ष तक समान कार्यक्रम के आधार पर मिलकर चुनाव लड़ने, सत्ता भोगने के बाद भी वाममोर्चा के चारों दल (माकपा, भाकपा, फार्वड ब्लाक और आर.एस.पी.) अलग अस्तित्व क्यों बनाये रखते? "दुनिया के मजदूरो एक हो जाओ" का आह्वान करते हुए आपस में एक क्यों नहीं हो पाते? कौन सी चीज उन्हें अलग रखती है-क्या विचारधारा? क्या कार्यक्रम? क्या रणनीति? यदि ये तीनों ही कारण नहीं हैं तो नेतृत्व और सम्पत्ति के अलावा क्या कारण हो सकता है? उनके साप्ताहिक मुखपत्रों को पढ़ने पर लगता है कि माक्र्सवाद भले ही दुनिया में मिट गया हो पर भारत में इन कम्युनिस्ट अखबारों के पन्नों पर जीवित है।
रूस ने, चीन ने, पूर्वी यूरोप के सब देशों ने माक्र्सवाद की विफलता की घोषणा कर दी है। इसी सप्ताह क्यूबा के जिन फीदेल कास्त्रो को माक्र्सवाद के अंतिम दुर्ग के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा था उन्होंने भी सार्वजनिक घोषणा कर दी कि क्यूबा का मॉडल विफल हो चुका है। पर जोड़-तोड़ से सत्ता पाने की कोशिशों में लगे भारतीय कम्युनिस्ट अभी भी माक्र्सवाद की कसमें खा रहे हैं, लेनिन और स्तालिन की पूजा कर रहे हैं, माओ के नाम पर निर्दोष, निरीह नागरिकों की हत्या कर रहे हैं। सोनिया के युवराज राहुल के बंगाल दौरे के लिए जो भाषण लिखकर दिये गये हैं उसके कुछ वाक्य तो सटीक हैं। आज ही टेलीविजन चैनलों पर राहुल का यह कथन सुनकर अच्छा लगा कि "बंगाल का सबसे बड़ा शत्रु माक्र्सवाद है जो सब जगह विफल हो चुका है पर बंगाल के माक्र्सवादी उस विफल विचारधारा के नाम पर हत्याएं कर रहे हैं, लूट मचा रहे हैं।" राहुल ने यह भी कहा कि मेरी चीन यात्रा के समय वहां के नेताओं ने भारतीय कम्युनिस्टों का बहुत मजाक बनाया। इस पृष्ठभूमि में प्रो.के.एन.पणिक्कर की नयी इतिहास दृष्टि और वैचारिक परिवर्तन सचमुच स्वागत योग्य है।द (16-9-2010)
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