ऐसे-ऐसे मामले


हाल के वर्षों में सबसे ज्यादा मुठभेड़ की घटनाएं उ.प्र. में हुई हैं। बिहार, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश में भी मुठभेड़ की काफी घटनाएं हुई हैं। इन राज्यों की अपेक्षा गुजरात में मुठभेड़ की घटनाएं बहुत कम हुई हैं। फिर भी गुजरात के सोहराबुद्दीन मुठभेड़ काण्ड को लेकर सी.बी.आई. कुछ ज्यादा ही सक्रिय है। धड़ाधड़ वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी हो रही है। सूत्रों का कहना है यह सब केन्द्र सरकार के इशारे पर गुजरात की नरेन्द्र मोदी सरकार को गिराने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि कांग्रेस वहां पिछले कई चुनावों में हार रही है।

उ.प्र. की मुख्यमंत्री मायावती को लपेटने का प्रयास किया गया। आय से अधिक सम्पत्ति रखने के मामले पर सी.बी.आई. से न्यायालय में कहवाया गया कि मायावती के खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं। फिर सी.बी.आई. ने कहा कि इस मामले में कोई दम नहीं है। इन विरोधाभासी बयानों से साफ झलकता है कि केन्द्र सरकार ने कटौती प्रस्ताव में बसपा का समर्थन हासिल करने के लिए मायावती के मामले को जानबूझकर खुलवाया।

सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव, उनके बेटे अखिलेश यादव, प्रतीक यादव एवं उनकी पुत्रवधू डिम्पल यादव के आय से अधिक सम्पत्ति रखने के मामले में भी सरकार की मंशा सपा का समर्थन प्राप्त करना था। 2007 में जब सरकार को लगा कि परमाणु समझौते पर वामपंथी उसके साथ नहीं रहेंगे तो एक कांग्रेसी कार्यकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी के माध्यम से एक जनहित याचिका दायर करवाई गई। इसके बाद मुलायम सिंह एवं उनके सांसदों ने विश्वासमत प्रस्ताव पर सरकार के पक्ष में वोट किया।

कहा जाता है कि राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद को भी सरकार ने सी.बी.आई. के माध्यम से बचाया। आय से अधिक सम्पत्ति रखने का मामला लालू प्रसाद पर भी चला। बिहार सरकार के आरोप पर पटना उच्च न्यायालय की देखरेख में सी.बी.आई. ने मुकदमे की जांच की। जब निर्णय अन्तिम पड़ाव पर था तभी इस मामले से जुड़े कार्यकारी न्यायाधीश का तबादला कराया गया। सूत्रों के अनुसार बाद में कोलकाता में इस मामले को लेकर आयकर विभाग की एक बैठक हुई। कहा जाता है कि बैठक में मामले को हल्का किया गया और उसी आधार पर पटना उच्च न्यायालय ने मुकदमे का निपटारा किया। इस निर्णय के खिलाफ बिहार सरकार सर्वोच्च न्यायालय पहुंची तो सी.बी.आई. ने कहा अपील करने का अधिकार सी.बी.आई. को है। फिर सी.बी.आई. ने इस मामले में कुछ नहीं किया। इस तरह लालू प्रसाद को पिछली सरकार में साथ रहने का लाभ मिला।

बोफर्स काण्ड के आरोपी एवं गांधी परिवार के नजदीकी क्वात्रोकी को भी इस सरकार ने बचाया। सी.बी.आई. को बिना बताए सरकार ने लंदन वकील भेजा और क्वात्रोच्ची को पैसा दिलाया, जबकि यह पूरा मामला सी.बी.आई. के पास था।

प्रधानमंत्री नरसिंह राव के समय हर्षद मेहता ने शेयर घोटाला किया। उस समय सी.बी.आई. न केवल रिश्वत लेने वालों को बचाने में, बल्कि विपक्ष के दो प्रमुख नेताओं श्री लालकृष्ण आडवाणी एवं डा. मुरली मनोहर जोशी को फंसाने में लगी रही। इसके विरुद्ध श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में आवाज उठाई थी।

हवाला काण्ड में श्री लालकृष्ण आडवाणी को फंसाने की असफल कोशिश की गई।

बोफर्स का मुद्दा उठाने पर श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के खिलाफ विदेश में झूठे खातों की साजिश रची गई।

1984 के सिख नरसंहार के आरोपी एवं कांग्रेस नेता जगदीश टाइटलर को सी.बी.आई. द्वारा बचाये जाने का आरोप।

छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री एवं कांग्रेस नेता अजीत जोगी पर विपक्षी विधायकों को खरीदने का आरोप लगा। पर्याप्त सबूत होने के बावजूद उनका कुछ नहीं बिगड़ा।

पूर्व केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री एवं गांधी खानदान के चहेते सतीश शर्मा के खिलाफ भी सी.बी.आई. ने 1996 में 12 मुकदमे दर्ज किए थे। उन्हें भी आसानी से छोड़ा गया।

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