...अब शादमां चौक बनेगा भगत सिंह चौक - मुजफ्फर हुसैन


प्रति वर्ष 23 मार्च को सम्पूर्ण भारतीय उपखण्ड में शहीद भगत सिंह के बलिदान को पूर्ण श्रद्धा के साथ याद किया जाता है। 23 मार्च, 1931 की उस घटना को कौन देशभक्त भूल सकता है जब भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को ब्रिटिश सरकार ने लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ा दिया था। इन तीन युवा क्रांतिकारियों की शहादत पर सम्पूर्ण भारत में शोक की लहर दौड़ गई थी। शायद ही ऐसा कोई भारतीय हो जिसकी आंखों से आंसू नहीं ढलके हों। विभाजन के पश्चात लाहौर की उस सेंट्रल जेल को पाकिस्तान सरकार ने किसी अन्य स्थान पर स्थानांतरित कर दिया। जहां जेल थी उस स्थान पर एक चौक बना दिया गया, जिसका नाम रखा गया शादमां चौक। तब पाकिस्तान के अनेक बुद्धिजीवियों ने पाकिस्तान सरकार के इस निर्णय की घोर निंदा की थी। उन्होंने मांग की थी कि भगत सिंह तो शहीदे आजम थे, उन्हें भारत और पाकिस्तान में नहीं बांटा जा सकता है, इसलिए इस चौक का नाम भगत सिंह चौक रखना श्रेयस्कर होगा। लेकिन पाकिस्तान की सरकार ने किसी की नहीं सुनी। चौक का नाम शादमां चौक रखे जाने से वहां की एक समझदार महिला सैयदा दीप को बड़ा कष्ट पहुंचा था। उन्होंने "इंस्टीट्यूट फार पीस एण्ड सेकुलर स्टडीज" नामक एक संस्था बनाई, जिसके अंतर्गत उन लोगों का आह्वान किया जो भगत सिंह के प्रति प्रेम और आदर रखते हैं। सैयदा दीप हर वर्ष मार्च का महीना प्रारंभ होते ही अपने साथियों को लेकर शादमां चौक पर आ जातीं। वह और उनके साथी तख्तियां एवं बैनर लेकर चौक का नाम भगत सिंह चौक रखने की अपनी मांग को दोहराते। हजारों लोग वहां से गुजरते और उस महिला के साहस और भगत सिंह के प्रति सम्मान की प्रशंसा करते। 2010 का मार्च आया और दीप हर साल की तरह अपने अभियान में जुट गर्इं। लेकिन उन्हें नहीं पता था कि इस बार उसका सपना साकार हो जाएगा।

जीवित हो उठा आजादी का इतिहास

पाकिस्तान के अंग्रेजी दैनिक डॉन के मुख पृष्ठ पर जब यह चौंका देने वाला समाचार प्रकाशित हुआ तो लाहौर में बहुत से लोगों को आनंद हुआ। समाचार में बताया गया कि पंजाब (पाकिस्तान) के मुख्यमंत्री शाहबाज शरीफ ने लाहौर महानगर पालिका को निर्देश दिए हैं कि शादमां चौक का नाम भगत सिंह चौक कर दिया जाना चाहिए। सैयदा दीप के अभियान की सफलता के बाद उन लोगों के नामों और कामों को याद करने की आवाज उठ रही है जिन्होंने आततायी ब्रिटिश सरकार से लोहा लिया था। इस घटना के पश्चात लाहौर में हिन्दुस्थान की आजादी का इतिहास एक प्रकार से फिर से जीवित हो उठा है। वहां के अखबारों में ऐसे आलेख प्रकाशित हो रहे हैं जिनकी कभी किसी ने कल्पना नहीं की थी। जागरूक पाकिस्तानी आजादी के इतिहास को दोहराते हुए कहते हैं कि भगत सिंह के निमित्त अब पाकिस्तान सरकार का यह संकल्प होना चाहिए कि वह अन्य शहीदों की भी सुध ले। दैनिक डॉन में ए.जी. नूरानी ने अपने लेख के माध्यम से लाहौर ही नहीं, सम्पूर्ण पाकिस्तान के उन शहीदों के नामों की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया है जिन्हें अब लोग भूल गए हैं। पाकिस्तान सरकार और वहां के पंजाब की सरकार अपनी राजनीतिक उठा-पटक में इतनी व्यस्त रहती हैं कि लगता है उन्हें इतिहास से कोई सरोकार नहीं है। लेकिन पंजाबी कांग्रेस और उसके अध्यक्ष फखर जमां ने पाकिस्तान सरकार से मांग की है कि भारत की आजादी के समय पंजाब के जिन क्रांतिवीरों ने अपना सर्वस्व अर्पित कर दिया, उन्हें इतिहास में स्थान दिया जाए। पंजाब के शहीदों का इतिहास फिर से लिखने की आवश्यकता है। हमारी वर्तमान पीढ़ी जानती ही नहीं कि अंग्रेजों से लोहा लेते समय पंजाब के सपूतों ने किस प्रकार के कारनामे किए। शादमां चौक का नाम जब भगत सिंह चौक करने का फैसला हो ही गया है तो पाकिस्तान सरकार यह भी बताए कि लाहौर में इस पर क्या प्रतिक्रिया हुई थी। एक चौक का नाम भगत सिंह के नाम पर रखना ही पर्याप्त नहीं है। पंजाब के जिन सपूतों ने इतिहास रचा है उनके लिए सरकार और जनता को बहुत कुछ करना शेष है।

पंजाबी कांग्रेस ने कहा है कि केवल पाकिस्तान सरकार ही नहीं, भारत की आजादी में पंजाब की क्या भूमिका रही है और किस-किस ने अपना रक्त बहाकर इस देश को आजाद करवाया है यह सामने लाने के लिए भारत सरकार को भी ईमानदारी से काम करना होगा। पंजाबी कांग्रेस चाहती है कि यह प्रयास दोनों देशों की सरकारें मिल कर करें। पंजाबी कांग्रेस का कहना है कि आजादी की जंग में पंजाब की भूमिका के सम्बंध में अब तक कोई विश्वसनीय इतिहास नहीं लिखा गया है। विभाजन के पश्चात् भारत सरकार ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया है। फखर जमां का कहना है कि आज सही अवसर है जब इतिहास का पुनर्लेखन होना चाहिए। फखर जमां ने कहा है कि पाकिस्तान सरकार ने वर्षों तक भगत सिंह की अवमानना की है तो क्या भारत सरकार भी कुछ शहीदों के मामले में ऐसा नहीं करती आई है? भगत सिंह की शहादत की बात को आगे बढ़ाते हुए फखर जमां ने कहा कि "क्या भारत इस बात को भूल गया कि भगत सिंह की शहादत के अगले दिन मौलाना जफर अली खान ने उनकी श्रद्धाञ्जलि सभा में सामूहिक प्रार्थना का नेतृत्व किया था। लाहौर षड्यंत्र केस में विशेष न्यायाधिकरण का गठन करने वाले अध्यादेश पर 19 जून, 1930 को जारी लाहौर उच्च न्यायालय की बार एसोसिएशन की रपट पर डाक्टर मोहम्मद इकबाल और दो अन्य लोगों के अतिरिक्त बरकत अली के हस्ताक्षर थे, जो कट्टर लीगी थे। जब एक कट्टर मुस्लिम लीगी भी भगत सिंह की शहादत पर दुख जताता है और ब्रिटिश सरकार को इस कुकृत्य के लिए लताड़ता है तब इस बात को समझा जा सकता है कि तत्कालीन पंजाब भगत सिंह की शहादत पर कितना दुखी था। पंजाब सूबे का हर नागरिक बुलंद आवाज में ब्रिटिश सरकार को चुनौती दे रहा था। भगत सिंह की शहादत पर सारा देश और सभी राजनीतिक पार्टियां स्तब्ध थीं। सभी के मन में ब्रिटिश सरकार के प्रति गुस्सा था और हर हिन्दुस्थानी एक ही बात पर अटल था कि अब इन नरभक्षी दरिंदों को सबक सिखाना होगा। पंजाबी कांग्रेस ने सवाल उठाया है कि भगत सिंह का सम्बंध किससे है.... भारत से या पाकिस्तान से?

मुशर्रफ की टिप्पणी

पंजाबी कांग्रेस यदि आज भी भारत सरकार से बात करे और इस बात का आश्वासन दे कि आजादी के इतिहास को भारत या पाकिस्तान का इतिहास नहीं बनाया जाएगा; उसे हिन्दू और मुसलमान की दृष्टि से नहीं देखा जाएगा तो भारत को इसे कार्यान्वित करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होगी। भारत तो आज भी पाकिस्तान की संस्कृति को भारतीय संस्कृति ही मानता है। भारत तो आज भी मुस्लिम लीग के काले कारनामों को भूलकर पुराने दिनों में लौटने का इच्छुक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या पंजाबी कांग्रेस के फखर जमां इस बात को पाकिस्तान सरकार के गले उतारने में सफल होंगे? जब भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन की 150वीं वर्षगांठ मनाई गई थी उस समय भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी पाकिस्तान यात्रा के समय तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से कहा था कि हम दोनों देश मिलकर इतिहास के इन क्षणों को याद करें। उस समय मुशर्रफ ने वाजपेयी के सम्मुख तो इसका उत्तर नहीं दिया था, लेकिन बाद में पत्रकारों से वार्ता करते हुए कहा था कि अटल बिहारी वाजपेयी दिन में सपने देखना छोड़ दें। इस टिप्पणी का क्या अर्थ है और इससे कौन सी भावना व्यक्त होती है, यह समझते देर नहीं लगती। पंजाबी कांग्रेस ने यदि इस मसले को फिर से उठाया है तो वह भारत सरकार से बातचीत करे और उससे पहले स्वयं अपनी सरकार का मत जान ले तब तो कोई बात बन सकती है, वरना हठधर्मी से इस समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता।

दैनिक डॉन में प्रकाशित उक्त आलेख से इतना ही समाधान होता है कि पाकिस्तानी पंजाब सूबे में आज भी ऐसे संगठन और व्यक्ति मौजूद हैं जो अपने इतिहास के नायकों की यादों को जीवित रखना चाहते हैं। भगत सिंह जैसे शहीद न तो किसी एक देश के और किसी एक मत-पंथ के हो सकते हैं। वे तो उस आजादी की निशानी हैं जिसके लिए मानव जाति हर पल संघर्ष करती है। यदि भगत सिंह के निमित्त पाकिस्तान सरकार और वहां के कट्टरवादियों के चिंतन की बर्फ पिघलती है तो हर समझदार और राष्ट्रवादी नागरिक उसका स्वागत करेगा। पंजाबी कांग्रेस ने भारत सरकार के सम्मुख पंजाब सूबे के स्वतंत्रता सेनानियों की अवहेलना का जो वर्णन प्रस्तुत किया है उसे सही माध्यम से भारत में पहुंचाया जाएगा तो नि:संहेद भारत उसका स्वागत करेगा।द

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