सरकार बचाए रखने की मजबूरी
केन्द्र में संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल का एक वर्ष पूरा हो रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सरकार की उपलब्धियों का "रिपोर्ट कार्ड" प्रस्तुत करना है, लेकिन उनका सबसे बड़ा संकट है कि वे उपलब्धियों के रूप में गिनाएं क्या? शायद मनमोहन सिंह अब तक के सबसे मजबूर प्रधानमंत्री हैं, जो अपने सहयोगी मंत्रियों के क्रियाकलापों के कारण देश की जनता के सामने बेहद अपमान व अपयश झेल रहे हैं, लेकिन उन पर अंकुश लगाने की हैसियत उनकी नहीं है, बस कह-सुनकर सरकार चलाते रहने की सहूलियत ही उनको मिली हुई है। ऐसी स्थिति में यदि कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दे शासन व प्रशासन की उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं, उसके कारण राष्ट्रहित व लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा पर आघात हो रहा है तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति तो है ही, ऐसे में प्रधानमंत्री और सरकार की इस बेबस स्थिति का लाभ उठाकर भयादोहन के रास्ते अपने राजनीतिक स्वार्थों को साधने वाले नेता और दल भी पीछे नहीं हैं। इससे राजनीति और लोकतंत्र की नैतिकता का तो ह्मास हो ही रहा है, देश और जनता के सामने समस्याओं का अंबार भी लगा है, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं महंगाई, भ्रष्टाचार और जिहादी आतंकवाद व माओवाद से प्रेरित जघन्य हिंसा। लेकिन "जैसे-तैसे, जब जैसी जरूरत हो" के अनुसार सबको साथ लेकर चलने और सरकार बचाए रखने की जुगत में ही प्रधानमंत्री की क्षमताओं और समय का अपव्यय हो रहा है। सहयोगी मंत्रियों की मनमानी, उनका आपसी टकराव प्रधानमंत्री की सबसे बड़ी समस्या बन गई दिखती है, तिस पर सोनिया गांधी के चहेते पार्टी पदाधिकारियों की ऊल-जलूल टीका-टिप्पणियां, मानो कोढ़ में खाज जैसी स्थिति पैदा कर रही हैं। इस सबके चलते प्रधानमंत्री के लिए चिंता का सबसे बड़ा आधार बन गया है अपने एक वर्ष के कार्यकाल की उपलब्धियों का लेखा-जोखा प्रस्तुत करना। लेकिन सोनिया गांधी के "रिमोट" से चलने वाला प्रधानमंत्री, जो केवल अपयश का ही भागीदार बन सका और सोनिया गांधी के विश्वस्त व चहेते मंत्रियों व पार्टी नेताओं की कारगुजारियों से उत्पन्न विषम परिस्थितियों के "डेमेज कंट्रोल" में ही लगा रहा, उपलब्धियां गिनाए तो कहां से?
इन मंत्रियों को न राजनीतिक नैतिकता का ध्यान है और न पार्टी के नियम-संयम का, विदेश नीति के राष्ट्रहित से जुड़े स्थापित मानकों के विरुद्ध जाने में भी इन्हें कोई हिचक नहीं होती। हाल ही में वन व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने चीन की दूरसंचार उपकरण बनाने वाली कंपनियों की हिमायत करते हुए चीन में बैठकर अपने ही गृहमंत्रालय पर हमला बोल दिया, आखिर क्यों? चीन भारत के प्रति जैसा विद्वेषपूर्ण व्यवहार करता है, ऐसे संवेदनशील मामले में उस पर यकायक कैसे विश्वास किया जा सकता है। चीनी कंपनियों द्वारा निर्मित उपकरणों में यदि कोई जालसाजी की गई और सीमांत क्षेत्रों में उन उपकरणों का दुरूपयोग किया गया तो भारत की महत्वपूर्ण जानकारियां भारत विरोधियों के हाथ नहीं लगेंगी, इसकी क्या गारंटी है? चीन जब हमारे सुरक्षा तंत्र में सेंध लगाने के लिए "कम्प्यूटर हैकिंग" जैसी ओछी हरकत कर सकता है तो उस पर विश्वास कैसे किया जाए? दूसरे, क्या चिदम्बरम के खिलाफ यह सुनियोजित अभियान है? इससे पूर्व सोनिया गांधी के विशेष कृपा पात्र पार्टी महासचिव दिग्विजय सिंह भी नक्सलवादी हिंसा को लेकर चिदम्बरम पर हमला बोल चुके हैं। लेकिन मनमोहन सिंह को सरकार चलानी है तो लालू यादव, मायावती, मुलायम सिंह जैसे नेताओं को साधने के साथ-साथ आपस में टकरावग्रस्त मंत्रियों व पार्टी पदाधिकारियों को साधने में भी उन्हें अपना कौशल लगाना पड़ता है। जब सरकार में बैठे लोग ही सरकार के लिए संकट खड़े कर रहे हों तो प्रधानमंत्री की बेबसी समझी जा सकती है। आईपीएल के महाघोटाले में कई मंत्रियों की सम्बद्धता की खबरें हफ्तों छाई रहीं। तत्कालीन विदेश राज्यमंत्री शशि थरूर को तो उस कारण कुर्सी तक छोड़नी पड़ी। वे पहले भी महंगे पंचतारा होटल में रहने के दौरान और अपने कई बयानों से विवादास्पद रह चुके थे। देश की जनता को लगातार त्रस्त कर रही महंगाई के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन बने रहे कृषि मंत्री शरद पवार के जनविरोधी बयानों पर प्रधानमंत्री और उनकी सरकार ने जो फजीहत झेली है, वह सर्वविदित है, लेकिन सरकार चलाने की विवशता के चलते सहयोगी दल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी व उसके नेता शरद पवार की ऐसी "हिमाकतों" को झेलना प्रधानमंत्री की मजबूरी नहीं तो और क्या है? आईपीएल मामले में चर्चित रहे इसी पार्टी के एक और मंत्री प्रफुल्ल पटेल की तो पुत्री पर भी नागरिक उड्डयन मंत्रालय के नियमों को धता बताकर उड़ानों में फेरबदल करने के आरोप लगे। संचार मंत्री ए. राजा को दबाव की राजनीति के तहत मंत्री बनाया गया। यहां तक कहा जाता है कि मनमोहन सिंह उन्हें मंत्री न बनाने पर अड़े थे, लेकिन उनकी एक न चली। जबकि 2 जी स्पैक्ट्रम घोटाले को लेकर राजा अत्यधिक विवादास्पद रहे। रसायन व उर्वरक मंत्री एम.के. अलागिरी की संसद में अनुपस्थिति को लेकर प्रधानमंत्री को जो शर्मिंदगी झेलनी पड़ी, वह किसी से छिपी नहीं है। बाद में पता चला कि संसद सत्र के दौरान अलागिरी मालदीव में सैर कर रहे थे। जिस सरकार के मंत्री जनप्रतिनिधि होने के दायित्वों के प्रति न केवल उदासीन हों, बल्कि उनके विपरीत आचरण से उत्पन्न विवाद प्रधानमंत्री के गले की हड्डी बने रहें तो उस सरकार की कार्यशैली और उपलब्धियां उल्लेखनीय नहीं हो सकतीं। प्रधानमंत्री की इस मजबूरी को जनता समझ सकती है, लेकिन जनता को इस बारे में भी जागरूक होना होगा कि कहीं सरकार जनहित की अनदेखी कर अपने मंत्रियों के टकराव व विवादों में ही न उलझी रहे और राष्ट्रहित की बलि चढ़ती रहे।
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